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धृतराष्ट्र की मृत्यु कैसे हुईं,

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नमस्कार दोस्तों
                  धृतराष्ट्र की मृत्यु कैसे हुईं, क्या उन्होंने आत्महत्या की थी, या फिर किसी ने उनकी हत्या की थी, यदि आप नहीं जानते तो यह पोस्ट अंतिम तक पढियेगा, साथ मे कुंती गान्धारी की मृत्यु कैसे हुईं थी यह भी,
कथानुसार :-
   ज़ब महाभारत के युद्ध समाप्त हुआ और पाण्डव विजयी हुए, तो युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र ने सभी कौरव पाण्डवों तथा अन्य महारथियों का श्राद्ध किया, उसके साथ धृतराष्ट्र ने स्वयं अपना भी श्राद्ध कर दिया, और गान्धारी, कुंती, विदुर तथा संजय के साथ वन चले गए तपस्या करने के लिए, उसके 16 वर्ष के बाद युधिष्ठिर उनसे मिलने उनके आश्रम गए, जहां विदुर की मृत्यु हुईं, और उनके प्राण युधिष्ठिर मे समां गए, क्योंकि वे दोनों ही यमराज के अवतार थे,

वही पर व्यास जी ने गान्धारी के कहने पर महाभारत युद्ध मे मारे गए समस्त कौरव पाण्डव को एक रात्रि के लिए जीवित भी किया, इसी घटना के कुछ वर्ष बाद एक दिन धृतराष्ट्र गंगा मे स्नान करने गए, और स्नान करके वह अपने आश्रम की ओर लौट रहे थे, कि भयंकर तूफ़ान आया जिससे अग्नि प्रज्जवलित हो उठी, जो देखते ही देखते संपूर्ण जंगल मे फ़ैल गयीं, अब धृतराष्ट्र, कुंती और गान्धारी तपस्वी तो थे ही, अतः उग्र तप और उपवास के कारण सभी बहुत दुर्बल हो गए थे, जिस कारण वें वहाँ से भागने मे असमर्थ थे,

इसलिए अग्नि का यह रौद्र रूप देखकर धृतराष्ट्र संजय से बोले कि " वत्स तुम किसी ऐसे स्थान पर चले जाओ जहां यह अग्नि तुम्हारा अहित न कर सके, यह सुन संजय बोले कि " महराज इस अग्नि से आपकी मृत्यु होना उचित नहीं है, आपके शरीर का तो अवाहनीय अग्नि से दाह संस्कार होना चाहिए, किन्तु इस समय इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं दिख रहा है, तब धृतराष्ट्र बोले कि " संजय हमने अपनी स्वेच्छा से गृहस्थाश्रम का परित्याग किया है, इसलिए यह अग्नि हमारे लिए अनिष्टकारी नहीं है, जल, वायु तथा अग्नि के संयोग से अथवा उपवास करके प्राण त्यागना, तपस्वियों के लिए अत्यंत प्रसंसनीय माना जाता है,

 अतः तुम शीघ्र यहां से प्रस्थान करो, हमारी चिंता मत करो, तब संजय ने धृतराष्ट्र समेत कुंती, और गान्धारी कि परिक्रमा की और बोले की " महाराज अब आप अपनेआप को योगयुक्त कीजिये, तब धृतराष्ट्र ने इनके कहे अनुसार समाधि लगा ली और इन्द्रियों को रोककर काष्ठ की भांति निश्चेष्ट हो गए, तथा संजय के वहाँ से जाने के पश्चात् उस रौद्ररूपी अग्नि ने धृतराष्ट्र समेत कुंती और गान्धारी को जलाकर भस्म कर डाला, इसका सारा वर्णन नारद जी ने जाकर युधिष्ठिर को सुनाया, जिससे युधिष्ठिर अत्यंत दुखी हुए, लेकिन विधि का विधान कौन बदल सकता है,

 तो दोस्तों कथा के बारे मे कमेंट के माध्यम से मुझे जरूर बतायें, ताकि मै भी आपके लिए ऐसी कथा लेकर आता रहूँ,  धन्यवाद

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