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वीरवर की कथा, चौथी बेताल कथा

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नमस्कार दोस्तों
                  ज़ब दूसरी कथा का जबाब पाने पर बेताल फिर शीशम के पेड़ पर जा लटका, तो फिर राजा विक्रमादित्य वहाँ पहुँचे, और फिर बेताल को पेड़ से उतारकर कंधे पर लादकर चल पड़े, लेकिन फिर बेताल बोला की " हे राजन तुम निःश्वार्थ साधु की सेवा मे लगे हो इसलिए एक कथा और सुनो,
 शूद्रक नामक राजा हुआ, जो शोभावती नगरी मे राज्य करता था, प्रजा को उसपर अटूट प्रेम था, एक बार राजा शूद्रक के पास वीरवर नामक व्यक्ति नौकरी के लिए गया, उसके परिवार मे उसकी गर्भवती पत्नी धर्मवती, पुत्र सत्य वर और कन्या सतबीर वती यह तीनों ही उसकी सहायता के लिए कमर में कृपाल, एक हाथ में तलवार और दूसरे में ढाल लिए हुए सदा ही सेवा में तत्पर रहा करते थे, राजा ने वीरवर को नौकरी पर तो रख लिया, लेकिन जब वीरवर ने 500 स्वर्ण मुद्राएं प्रतिदिन का पारिश्रमिक मांगा तो राजा कुछ हिचकिचाहट में पड़ गया, लेकिन नौकरी तो दे दी थी, अतः गुप्त रूप से राजा ने अपने गुप्तचरों को आदेश दिया कि इसके परिवार में कितने लोग हैं पता करो, और यह स्वर्ण मुद्राएं कहां खर्च करता है वहां भी पता लगाओ,
वीरवर रोज राजा के सिंहद्वार पर शाम तक खड़ा रहता, और फिर जो 500 स्वर्ण मुद्राएं मिलती उसमें से सौ मुद्रा तो वह अपनी पत्नी को घर खर्च के लिए देता, सौ स्वर्ण मुद्रा से वस्त्र आभूषण आदि खरीदता, सौ मुद्राओं से स्नान करके पूजा में खर्च करता, तथा दो सौ मुद्रा वह गरीब दरिद्र में दान कर देता, इन नित्य कर्मों से निपट कर भोजन करके रात्रि को वह फिर राजा के सिंहव्दार पर पहरा दिया करता, यह सारी बात जब राजा को पता चली, तो राजा ने उन गुप्त चारों को वीरवार के पीछे से हटा दिया, इसी तरह दिन बीता गया चाहे कठोर ठंड हो भीषण बारिश हो या भयानक धूप हो वह अटल होकर सिंह द्वार पर ही बिताता था, एक बार जब राजा रात के समय महल से बाहर निकल रहे थे तो दूर से किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनी, तब राजा ने सोचा कि मेरे राज्य में कोई दीन दुखी या दरिद्र तो है नहीं, तो फिर यह स्त्री इस घनघोर बारिश में क्यों रो रही है, दया बस राजा ने वीरवर से कहा कि " सुनो वीरवर तुम जाकर पता लगाओ कि यह स्त्री क्यों रो रही है,
 वीरवर जो आज्ञा कह कर तुरंत निकल पड़ा, इस घनघोर वर्षा में राज आज्ञा का पालन करते देख राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ, अतः खुद भी छिपकर वीरवर के पीछे चल पड़े, उधर स्त्री के पास पहुंच कर देखा कि वह स्त्री हे कृपालु, हे स्वामी, हे त्यागी मैं तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहूंगी, यह कहकर विलाप कर रही थी, तब वीरवर ने पूछा कि हे देवी तुम कौन हो, और आधी रात में इस प्रकार क्यों रो रही हो, तब वह स्त्री बोली की " हे वीरवर इस समय जो मेरे धर्मात्मा राजा शूद्रक हैं, आज से 3 दिन बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी, यही सोच कर मुझे बहुत रोना आ रहा है, यही मेरे विलाप करने का कारण है,  तब वीरवर बोला कि " हे देवी क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे महाराज की मृत्यु को रोका जा सके,

तब स्त्री के रूप में धरती बोली कि " हां ऐसा उपाय है लेकिन यह उपाय सिर्फ तुम ही कर सकते हो, और कोई नहीं, वीरवर बोला कि हे देवी शीघ्र बताओ वह उपाय, नहीं तो मेरे जीवन का क्या अर्थ, पृथ्वी बोली की हे वीरवर यहां से कुछ दूर जाकर देवी चंडिका का मंदिर है, यदि तुम अपने पुत्र की बलि देवी चंडिका को दे दो, तो राजा की मृत्यु नहीं होगी अन्यथा उनकी मृत्यु निश्चित है,  इस पर वीरवर बोला कि " है देवी मैं महाराज के जीवन की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता हूं अतः मैं यहां कार्य अवश्य करूंगा, पास में ही छिपे राजा यह सब देख रहे थे, और आगे क्या होता है इसकी प्रतीक्षा करने लगे,
अब वीरवर अपने घर पहुंचा, और धरती ने जो कुछ भी कहा था सारा वृत्तांत अपनी पत्नी को सुनाया, यह सुनकर उनकी पत्नी बोली की " हे नाथ महाराज का जीवन अमूल्य है, हमें अवश्य ही उसे बचाना चाहिए, इसलिए वह अपने पुत्र को बुला कर लायी और सारा हाल बताया और बोली कि " पुत्र चंडिका देवी को तुम्हारी बलि देने से ही महाराज का जीवन बचाया जा सकता है, अन्यथा वह आज से 3 दिन बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे, यह सुनकर उस निर्भीक बालक ने कहा कि " पिताजी यदि मेरे प्राण के बदले महाराज का जीवन बचाया जा सकता है, तो मैं तैयार हूं, आप तुरंत मेरी बली की तैयारी कीजिए, सत्य वर के ऐसा कहने पर वीरवर बोला कि " बेटा तुम धन्य हो मुझे तुम पर गर्व है, तुम सचमुच में मेरे ही पुत्र हो,

वीरवर के पीछे आए हुए राजा ने भी यह सब बातें सुनी, और सोचने लगे कि " यह तो सचमुच में सभी एक जैसे ही वीर है,  इसके बाद वीरवर अपनी पत्नी बेटे और पुत्री समेत देवी चंडिका के मंदिर पहुंचा, राजा भी उनके पीछे पीछे वहां पहुंच गया,  मंदिर पहुंचकर सत्यवर ने बड़े भक्ति भाव से देवी को प्रणाम किया, और बोला कि " हे देवी मेरे मस्तक का उपहार स्वीकार करें,  जिससे हमारे राजा अगले 100 वर्षों तक राज कर सकें,  वीरवर ने पुत्र के ऐसा कहते ही धन्य है धन्य है कहते हुए अपनी तलवार से पुत्र का मस्तक काटकर देवी को अर्पण कर दिया, तभी आकाशवाणी हुई की हे वीरवर तुम धन्य हो, तुम्हारे समान स्वामी भक्त और कोई नहीं है, जिसने अपने एकमात्र पुत्र की बलि देकर राजा शूद्रक को जीवनदान दिया, तभी वीरवर की कन्या वीरवती अपने मरे भाई का मस्तक लिए विलाप करने लगी, और उसके शोक में उसने भी अपने प्राण त्याग दिए,

यह देखकर वीरवर की पत्नी बोली कि " हे नाथ राजा का कल्याण तो हो गया अब मैं भी आपसे कुछ मांगना चाहती हूं, हमारे पुत्र और पुत्री तो चले गए अब मैं जी कर क्या करूंगी, इसलिए आप मुझे आज्ञा दें कि मैं अपने बच्चों के शरीर के साथ अग्नि में प्रवेश करूं, पत्नी का यह आग्रह सुनकर वीरवर बोला कि " हे देवी है तुम ऐसा ही करो लेकिन थोड़ी देर ठहरो तब तक मैं तुम्हारी चिता के लिए कुछ लकड़िया इकट्ठा कर देता हूं, यह कहकर बीरबल ने लकड़ी इकट्ठा करके चिता तैयार की, और दोनों बच्चों के शव को रखकर उसमें आग लगा दी, तभी उसकी पत्नी उसके चरणों में जा गिरी और देवी को प्रणाम करके कहने लगी कि " हे देवी मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं अगले जन्म में भी यही मेरे वीर पति हो और यही राजा मेरे स्वामी हो, यह कहकर वह भयानक आग की लपटों में कूद पड़ी,

 तब वीरवर ने सोचा कि आकाशवाणी के अनुसार राजा का कार्य पूरा हो गया, मैंने जो राजा का नमक खाया था वह भी अदा हो गया, अकेले में ही जी कर क्या करूंगा, अतः क्यों ना मैं भी अपनी बलि चढ़ा दूं, तब भी वीरवर ने देवी की स्तुति की और बोला की " है देवी मेरे मस्तक का उपहार स्वीकार करो, और राजा शूद्रक पर प्रसन्न हो, और तत्काल अपना मस्तक अपनी तलवार से काट डाला, छिप कर देख रहे राजा शूद्रक सोचने लगे कि" हे भगवान मेरे लिए इस सज्जन पुरुष और इसके परिवार ने यह कैसा कार्य कर डाला, ऐसा तो मैंने ना कभी सुना था और ना ही देखा था, यदि मैं इनके उपकार का प्रति उपकार न कर सका तो मेरे राजा होने पर धिक्कार है, ऐसा सोचकर राजा ने भी अपनी तलवार निकाली और देवी से प्रार्थना की कि " हे देवी मैं भी आपकी शरण में आ रहा हूं अतः मेरे मस्तक का उपहार लेकर प्रसन्न हो, अपने नाम के अनुरूप आचरण करने वाले वीरवर ने मेरे लिए अपने प्राणों का त्याग किया,

 इसलिए मेरे प्राण लेकर आप प्रसन्न हो और वीरवर तथा उनकी पुत्र पत्नी पुत्री सहित पुनर्जीवन प्रदान करें, यह कहकर राजा ने जैसे ही अपनी तलवार उठाई, वैसे ही आकाशवाणी हुई कि " हे राजन तुम ऐसा दुस्साहस मत करो मैं तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हूं, मेरा आशीर्वाद है कि वीरवर और इसके पुत्र पुत्री तथा पत्नी पूरा परिवार जीवित हो जायेगा, इतना कहकर आकाशवाणी मौन हो गई, वीरवर अपनी पत्नी पुत्र पुत्री समेत शरीर जीवित हो गया, यह दृश्य राजा भी छुप कर देख रहा था, वीरवर अपने बच्चों सहित अपनी पत्नी को जीवित देखकर हैरान हो गया, और अकेले अकेले में ले जाकर पूछा कि तुम लोग तो आग में जल गए थे,

फिर जीवित कैसे हो गए मैं भी जीवित बचा हूं, कहीं यह भ्रम तो नहीं है, या देवी ने सचमुच मुझ पर कृपा की है, वीरवर के ऐसा पूछने पर बच्चों और पत्नी ने कहा कि" पिताश्री हम सचमुच जीवित हो गए हैं, यह देवी की कृपा है, यद्यपि हम यह बात अब तक जान नहीं पाए, तब वीरवर अपनी पत्नी और बच्चों सहित वापस घर लौट आए, और पहले की तरह ही राजा के दरवाजे पर पहरा देने लगे, यह देख राजा शूद्रक भी सबसे छुपकर छत पर चढ़ गया, वहां से राजा ने पुकार कर कहा कि" दरवाजे पर कौन पहरा दे रहा है, तब वीरवर बोला" कि महाराज मैं हूं वीरवर आपकी आज्ञा अनुसार मैं स्त्री के पास गया था, लेकिन वह देखते ही देखते गायब हो गई, राजा सोच में पड़ गए कि यह कैसा मनुष्य है, इतना सब कुछ हो गया, लेकिन एक शब्द भी इसकी जुबान पर नहीं आया, धन्य है बीरबर ऐसे पुरुष सौभाग्य से ही प्राप्त होते हैं, यह बात सोचते हुए राजा ने सारी रात बिता दी, और सुबह जब बीरबल राज दरबार में राजा के दर्शन करने गया, तो उसके कार्यों से प्रसन्न हो राजा ने पिछली रात का सारा विवरण मंत्रियों को कह सुनाया, राजा ने प्रसन्न होकर वीरवार और उसके पुत्र को कर्नाक का राज्य देे दिया,इस प्रकार राजा शूद्रक और राजा वीरवर दोनों ही सुख पूर्वक राज्य करने लगे,

 कथा सुना कर फिर बेताल राजा से बोला कि "राजन यह बताओ कि उन दोनों में वीर कौन था, यदि जानते हुए भी तुमने नहीं बताया तो तुम जरूर मृत्यु को प्राप्त होगे, तब राजा बोला कि " है बेताब उन दोनों में बड़ा वीर राजा शूद्रक ही था, बेताल बोला कि राजन क्या सबसे बड़ा वीर वीरवर नहीं था, क्योंकि उसने खुद का मस्तक काट दिया था, या फिर उसने अपने पुत्र पुत्री और पत्नी का भी बलिदान किया था, क्या उसका पुत्र वीर नहीं था, और तुम शूद्रक को सबसे बड़ा वीर किस आधार पर कह रहे हो, राजा विक्रमादित्य बोले कि" हे वेताल ऐसी बात नहीं है वीरवर का जन्म ऐसे कुल में हुआ था, जिसमें मानव अपने प्राण अपने स्त्री और बच्चों के प्राणों की बलि देकर भी अपने स्वामी के प्राणों की रक्षा करता है, और अपना परम कर्तव्य समझता है, उसी कुल में उत्पन्न सत्यवर भी वैसा ही था, लेकिन जिन नौकरों से राजा लोग अपने जीवन की रक्षा करवाते हैं, राजा शूद्रक उन्हीं के लिए अपने प्राण त्यागने जा रहा था अतः राजा शूद्रक ही सबसे बड़ा वीर था, राजा ने जैसेेे ही अपना मौन तोड़ा, बेताल फिर शीशम के पेड़ पर जाकर वापस लटक गया,

 यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा धन्यवाद

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