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तीन तरुण ब्राम्हण, द्वितीय बेताल कथा

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नमस्कार दोस्तों
                    पहली कथा का उत्तर पाने के बाद जब वह बेताल वापस चला गया तो राजा विक्रमादित्य फिर उस पेड़ के पास पहुँचे, तो देखा कि वह शव जमीन पर पड़ा दर्द से कराह रहा था, तब राजा ने फिर उसे कंधे पर उठाया और तेज गति से अपने रास्ते पर चल पड़े, थोड़ी दूर चलने पर फिर लाश से बेताल की आवक आयी कि " राजन तुम बिन वजह इस क्लेश में पड़े हो अतः मैं तुम्हे एक और कहानी सुनाता हूँ, सुनों,

 यमुना किनारे ब्रम्हस्थल नामक गाँव ब्राम्हणो को दान में मिला था, वहां वेदज्ञाता अग्निस्वामी नामंक ब्राम्हण रहा करता था जिसकी एक अत्यंत रूपवती मंदारवती नामक कन्या थी, जब वह विवाह योग्य हुई, तो उसके घर तीन ब्राम्हण कुमार आये जो समान भाव और समान गुण वाले थे, उन तीनों ने ही उससे विवाह की बात अग्निस्वामी से की, लेकिन अग्निस्वामी ने अपनी कन्या का विवाह उनसे करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा करने से वें तीनो आपस मे ही कट मर जायेंगे, इसलिए वह कन्या कुंवारी ही रही, उन तीनो ब्राम्हण कुमारों ने भी वही डेरा जमा लिया, यह सोचकर कि कभी न कभी यह कन्या विवाह के लिए राजी हो ही जाएगी,

लेकिन कुछ समय बिताने पर अचानक ही एक दिन मंदारवती को ज्वर (बुखार) हो गया, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी, मंदारवती की मृत्यु से तीनों ब्राम्हण कुमारों को बहुत दुख हुआ, और उसके शव को सजा कर वें श्मशान ले गए और उसका अंतिम संस्कार कर दिया, उनमे से एक ब्राम्हण ने वही अपनी कुटिया बनाई और मंदारवती कि भस्म सिरहाने रखकर भींख मांगकर अपना जीवन यापन करने लगा, दूसरा उसकी अस्तियों को लेकर गंगा तट पर चल गया, अस्ति विसर्जन के लिए, तथा तीसरा ब्राम्हण कुमार योगी बनकर एक देश से दूसरे देश भ्रमण करने लगा, जो ब्राम्हण योगी बनकर भ्रमण कर रहा था ,

 वह एक दिन घूमते घूमते वत्रोलक नामक गाँव पहुंचा, जहां उसे एक ब्राम्हण ने भोजन के लिए अपने घर आमन्त्रित किया, जब वह योगी भोजन के लिए बैठा, तो उसी समय एक बालक ने जोर जोर से रोना प्रारम्भ कर दिया, और बहुत समझाने और पुचकारने से भी जब वह बच्चा चुप न हुआ तो गृहस्वामिनी ने उसे जलती हुई आग में फेंक दिया, जिससे वह बच्चा जलकर भस्म हो गया, यह देखकर उस योगी को बहुत क्रोध आया और परोसी हुई थाली छोड़कर बोला कि " रे दुर्बुद्धि नीच कुकर्मी ब्राम्हण, अब मैं तेरे यहां भोजन तो क्या एक दाना भी ग्रहण नही करूँगा, धिक्कार है तुझपर,
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यह सुनकर गृहस्वामी बोला की" है योगी आप क्रोधित मत हो, मैं इस बच्चे को फिर से जीवित कर लूंगा, मेरे पास एक ऐसा मंत्र है, जिससे मृत व्यक्ति को भी जीवित किया जा सकता है, यह कहकर वह एक पुस्तक ले आया, और मंत्र पढ़कर अभिमंत्रित धूल आग में दाल दी, आग में धूल पड़ते ही वह बच्चा पहले के जैसा ही जीवित बाहर आ गया, और उस घर मालिक ने वह पुस्तक थैले में डालकर खूंटी में तांग दी, यह देखकर योगी को बड़ा आश्चर्य हुआ और शांत भाव से भोजन ग्रहण किया, जब घर मालिक सो गया, तो योगी चुपचाप उठा और पुस्तक का थैला लेकर वहां से  रफूचक्कर हो गया, यह सोचते हुए की अब वह मंदारवती को जीवित करके मजे से उसके साथ जीवन निर्वाह करेगा,

यही सोचते हुए वह कई दिन कई रात चलकर वहाँ पँहुचा जहाँ मंदारवती का दाह संस्कार हुवा था, वहां पहुचकर उसने उस ब्राम्हण को देखा जो मंदारवती कि अस्तियों को लेकर गंगा में डालने के लिए गया था, तब उस योगी ने उस ब्राम्हण और जिसने वहां कुटिया बनाई थी और चिताभस्म से सेज सजाई थी बोला कि" भाई मैं अपनी मंत्रशक्ति से मंदारवती को फिर से जीवित करना चाहता हूँ, अतः यह कुटिया यहां से हटा लो, मंदारवती के जीवित होने की खबर से वें अत्यंत प्रसन्न हुए, और अपनी कुटिया तुरंत वहां से उजाड़ दी, तब योगी पुस्तक खोलकर मंत्र पढ़ने लगा, और अभिमंत्रित धूल चिता के भस्म पर डाली, जिससे मंदारवती उस भस्म से जीवित होकर बाहर आ गयी,
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वह सुंदरी पहले से भी अधिक सुंदर लग रही थी, इस प्रकार उसे जीवित देखकर तीनो ब्राम्हण काम वासना से पीड़ित हो गए, और उसे पाने के लिए, आपस मे झगड़ने लगे, तब जिस योगी ने उसे मंत्र से जीवित किया था वह बोला कि" मैंने इसे अपने तंत्र मंत्र से जीवित किया है अतः यह मेरी है, लेकिन दूसरा ब्राम्हण बोला कि" यह तीर्थो के प्रभाव से जीवित हुई इसलिए यह मेरी पत्नी हुई, तभी तीस्ता बोला कि " भस्म को रखकर मैन अपनी तपस्या से इसे जीवित किया है , अतः इस पर मेरा अधिकार है,

इतनी कहानी सुनाकर बेताल विक्रमादित्य से बोला कि राजन अब आप ही ठीक ठीक बताइये, वह स्त्री किसकी होनी चाहिए, क्योकि अगर आपने जानते हुए भी नही बताया तो तुम्हारा सिर तुम्हारे धड़ से अलग हो जाएगा, और तुम मृत्यु को प्राप्त करोगे, फिर से ऐसा सवाल सुनकर राजा विक्रमादित्य बोले कि " हे बेताल जिस योवी ने इतने कष्ट उठाकर उसे जीवित किया, वह तो उसका पिता हुवा, इसलिए वह पति नही हो सकता, और जो ब्राम्हण उसकी अस्तियों को गंगा में डाल कर आया था, वह उसका पुत्र हुआ,
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इसलिए वह भी योग्य नही है, अतः जो उसकी भस्म की शैय्या पर आलिंगन करते हुए तपस्या करता रहा, और श्मशान में ही रहता था, उसे ही उसका पति होना चाहिए, क्योकि उसी ब्राम्हण ने पति के समान आचरण किया है, यह सुनकर बेताल बोलै की " राजन तुमने अपना मौन तोड़ दिया, इसलियें मैं चला अपने स्थान पर , और बेताल फिर वही पहुँच गया जहां से राजा ने उसे उठाया था, लेकिन राजा भी वचनबद्ध था इसलिए वह फिर बेताल के पास पहुच गया, उसे योगी के पास ले जाने के लिए,

दोस्तों आपको कथा कैसी लगी मुझे कामेट में जरूर बताएं, धन्यवाद

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