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रानी पदमावती की कहानी, विक्रम - बेताल पार्ट - १

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नमस्कार दोस्तों
       आर्यावर्त के वाराणसी नामक राज्य में प्रतापमुकुट नामक राजा राज्य करता था, उसका ब्रजमुकुट नामक एक बहुत ही रूपवान पुत्र था, राजा के मंत्री का बेटा बुद्धिशरीर उस ब्रजमुकुट का परममित्र था, एक बार दोनो मित्र जंगल मे शिकार करने गए,और घने जंगल के बीच उन्हें एक सुंदर तालाब दिखाई दिया,जिसमे एक राज्यकन्या अपनी सहेलियों के साथ स्नान कर रही थी, उस सुंदर कन्या को देखकर राजकुमार ब्रजमुकुट उस पर मोहित हो गया, और कन्या भी ब्रजमुकुट को देखकर उस मोहित हो गयी, राजकुमार ब्रजमुकुट अभी उस कन्या के बारे में जानने के लिए सोच ही रहा था कि कन्या ने खेल खेल में ही उसकी तरफ इशारा करके अपना नाम और पता बता दिया, उस कन्या ने कमल के पत्ते को अपने कान से लगाया,फिर दंतपत्र से दांत को खुरचा, एक दूसरे कमल को माथे पर रखा और अपना हाथ अपने हृदय पर, लेकिन राजकुमार उसके इशारों से अंजान था,

परंतु उसके मित्र बुद्धिशरीर ने उन इशारों को समझ लिया, और हँसता हुवा राजकुमार को देखता रहा, जो उस राजकुमारी के प्यार में पड़ा राज्यकन्या और उसकी सहेलियों को जाते हुए बड़े ध्यान से देख रहा था, राजकुमार जब घर पहुँचा तो बड़ा उदास उदास रहने लगा,और खाना पीना भी छोड़ दिया उस कन्या के वियोग में, यह देखकर बुद्धिशरीर ने राजकुमार से उसकी उदासी का कारण पूंछा और कारण जानकर बोला की इसमे कौन सी बड़ी बात है, तब राजकुमार ने बड़ी बेचैनी से पूंछा कि" जिसका नाम धाम तो मालूम नही, जिसके कुल का कोई पता नही, उसको हम कैसे ढूंढेंगे, इसपर मंत्रीपुत्र बुद्धिशरीर बोला " मित्र उसने इशारों में तुमसे कुछ बताया था क्या तुम्हें याद नही है, सुनो उसने कान पर कमल रखकर बताया की वह राजा कर्णोत्पल के राज्य में रहती है, दांतो को खुरचकर बताया कि दंतवैद्य की कन्या है, कानो पर कमल रखकर उसने बताया कि उसका नाम पदमावती है, और हाथों को हृदय पर रखकर उसने बताया कि उसका हृदय तुम्हे अर्पित है, अर्थात कलिंगदेश में कर्णोत्पल नामक राजा है उसके दरबार मे दंतवैद्य की पदमावती नाम की कन्या है,

 मित्र मैने यह बातें लोंगो से सुन रखी थी इसलिए मैं उसके इशारों को समझ गया, यह सुनकर राजकुमार बड़ा खुश हुआ और अगले दिन शिकार के बहाने उससे मिलने निकल पड़ा, दोनो मित्रों ने कर्णोत्पल राज्य में उस दंतवैद्य का घर ढूंढ निकाला, और पास के ही एक घर मे ठहरने के लिए गयेे, वहां पर एक वृद्ध स्त्री रहती थी, मंत्रीपुत्र ने घोड़ो को दान पानी देकर छिपाकर बांध दिया, और बुढ़िया के पास जाकर बोले " माता आप संग्रामवर्धन नामक किसी वैद्य को जानती है, बुढ़िया ने कहा" हां जानती हूँ मैं उसी के यहां धाय हूँ, लेकिन अधिक उम्र होने के कारण उन्होंने मुझे अपनी पुत्री पदमावती की सेवा में लगा दिया है, परंतु वस्त्र न होने के कारण मैं उसके पास हमेशा नही जाती, मेरा पुत्र नालायक जुवारी है मेरे वस्त्र देखते जी उठा ले जाता है, यह सुनकर उस मंत्रीपुत्र ने उस बुढ़िया को वस्त्र और आभूषण भेंट किए, और बोला कि " आप मेरी माता जैसी हो पुत्र समझकर मेरा एक गुप्त कार्य कर दो तो हम आपके बहुत आभारी रहेंगे,

तुम बस उस पदमावती के पास जाओ और कहना कि" जिस राजकुमार को आपने तालाब के किनारे देखा था वह यहां आया हुआ है, प्रेमवश संदेश कहने के लिए उसने ही तुम्हे यहां भेज है, उपहार मिलने के लालच में वह बुढ़िया तैयार हो गयी, और पदमावती के पास जाकर वह संदेश दिया और तत्काल वापस आ गयी, और पूछने पर उसने राजकुमार से बताया कि " मैंने आपका संदेश जैसे ही उससे कहा उसने मुझे बहुत बुरा भला कहा और कपूर लगे हाथ से मेरे दोनो गालों पर थप्पड़ भी मारा, बेटा तुम खुद देखलो उसके द्वारा मारे गए थप्पड़ के निशान अभी भी मौजूद है, यह सुनकर राजकुमार बहुत उदास हो गया, लेकिन एकांत में मंत्रीपुत्र ने उसे समझाया और बोला " मित्र उदास मत हो, पदमावती ने बुढ़िया को फटकार कर कपूर से उजली दस उंगलियों के छाप द्वारा यह संदेश दिया है कि दस चाँदनी रातों तक प्रतीक्षा करो, ये रातें मिलने के लिए ठीक नही है,

यह कहकर मंत्रीपुत्र बाजार गया और पास का थोड़ा सोना बेचकर बुढ़िया के लिए उत्तम भोजन बनवाया और साथ मे भोजन ग्रहण किया, दस दिन बाद फिर मंत्रीपुत्र ने बुढ़िया को पदमावती के पास भेजा, और उत्तम भोजन के लालच में बुढ़िया चली गयी, और वापस आकर बुढ़िया ने बताया कि" आज मैं यहां से जाने के बाद चुपचाप उसके पास खड़ी थी लेकिन उसने स्वंय तुम्हारी बात करने के अपराध में मेरे हृदय पर महावर ( लाल रंग पैरों में लगाने वाला) लगी तीन उंगलियों से मारा, और मैं यहां चली आयी, यह सुनकर मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा कि " मित्र पदमावती ने महावर लगी तीन उंगलियों की छाप छोड़कर यह सूचित किया है कि वह अभी तीन दिन तक राजमहल में रहेगी, तीन दिन बीतने के बाद फिर मंत्रीपुत्र ने बुढ़िया को पदमावती के पास भेजा,


उस दिन पदमावती ने बुढ़िया को स्वादिष्ट भोजन कराया, और दिन भर उसके साथ हंसती मुस्कुराती हुई बातें करती रही, शाम को जब बुढ़िया लौटने के लिए उठी, तभी बाहर डरावना शोर सुनाई दिया कि " हाय हाय यह पागल हाथी जंजीरों को तोड़कर लोगों को कुचलता हुवा भाग जा रहा है, बाहर की चीख पुकार सुनकर पदमावती बुढ़िया से बोली कि राजमार्ग को एक हाथी ने रोक रखा है वहां से तुम्हारा जाना उचित नही है, मैं तुम्हे एक रस्सी से बंधीं पीढ़ी पर बैठाकर खिड़की से नीचे उतार दूँगी, उसके बाद तुम पेड़ के सहारे बगीचे की चारदीवारी पर चढ़ जाना, और फिर दूसरी ओर पेड़ पर चढ़कर नीचे उतार जाना, और अपने घर चली जाना, बुढ़िया ने ऐसा ही किया,

बुढ़िया ने वापस आकर सारा हाल जैसे का तैसे मंत्रीपुत्र और राजकुमार को सुनाया, तब मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा कि मित्र तुम्हारी मनोकामना पूरी हुईं, पदमावती ने जिस रास्ते से बुढ़िया को वापस भेज है उसी रास्ते से उसने तुम्हे अपने महल में बुलाया है, और शाम को राजकुमार ने वैसा ही किया और चारदीवारी पर चढ़कर पदमावती के बगीचे में पहुँच गया, और रस्सियों से बंधी पीढ़ी को देखकर ऊपर देखा तो पदमावती अपनी दासियो के साथ राजकुमार की राह देख रही थी, जैसे ही राजकुमार पीढ़ी पर बैठा दसियों ने उसे ऊपर खींच लिया, और खिड़की से होकर राजकुमार पदमावती के पास पहुच गया, अंदर पहुचकर दोनो एक दूसरे से गले मिले और गंधर्व विवाह भी किया, कई दिनों तक वह राजकुमार पदमावती के महल में गुप्तरूप से छिपा रहा,


जब कई दिन बीत गए तब एक दिन राजकुमार पदमावती से बोला, प्रिये मेरा मित्र बुद्धिशरीर भी यहां आया हुआ है और तुम्हारी धाय के यहां ठहरा हुआ है, मैं अभी उसके पास जाता हूँ और समझा बुझाकर तुम्हारे पास आता हूँ, यह सुनकर पदमावती बोली कि " राजकुमार यह तो बताओ मैंने जो इशारे किये थे वो आपने समझा था या आपके मित्र बुद्धिशरीर ने, राजकुमार बोला की " प्रिये तुम्हारे इशारों को मैं बिल्कुल भी नही समझ पाया था, वो तो बुद्धिशरीर था जिसने तुम्हारे इशारों का मतलब मुझे बताया, तब कुछ सोचकर पदमावती बोली " आपने मुझे यह बात इतने बिलम्ब से क्यों बताई आपका मित्र होने के नाते वह मेरा भाई हुवा, पान पत्तों से मुझे उसका स्वागत पहले ही करना चाहिए था,

यह कहकर पदमावती ने राजकुमार को जाने की अनुमति दी, और राजकुमार जिस रास्ते से आया था उसी रास्ते से अपने मित्र बुद्धिशरीर के पास चला गया, और मिलकर राजकुमार ने पदमावती से जो इशारे समझने वाली बात हुई वह बात भी मंत्रीपुत्र बुद्धिशरीर को बताई, और बात ही बात में कब रात गुजर गई पता ही नही चला, सवेरे सवेरे पदमावती की एक सहेली हाथ मे पान और पकवान लेकर आई वहां आयी और मंत्रीपुत्र को देकर चली गईं, तब मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा कि " आइये मैं आपको कुछ दिखता हूँ, और पदमावती द्वारा भेज गया वह पकवान कुत्ते को खाने के लिए डाल दिया, और जैसे ही कुत्ते ने उसे खाया वह तड़प तड़प कर वही मर गया,

यह देखकर राजकुमार ने कहा कि मित्र इसका क्या मतलब हुआ, तब मंत्रीपुत्र ने बताया कि " मैंने जो उसके इशारों को पहचान लिया था इसीलिए वह मेरी हत्या करना चाहती है उसे डर है कि मेरे रहते तुम उसके प्रति विशेष प्रेम नही रख पाओगे, और उसे छोड़कर अपने नगर वापस चले जाओगे, मित्र क्रोध मत करो, बल्कि पदमावती को अपने माता पिता के त्याग के लिए प्रेरित करो, और मैं जो युक्ति तुम्हे बताता हूँ तुम उसका ही पालन करो, राजकुमार ने कहा कि सचमुच तुम बहुत बुद्धिमान हो, तभी अचानक बाहर शोरगुल सुनाई दिया, जो कह रहे थे, की राजा का छोटा बेटा मर गया, यह सुनकर मंत्री का बेटा अत्यंत प्रसन्न हुआ, और राजकुमार से बोला " कि आज रात को तुम पदमावती को इतनी मदिरा पिलाना की वह बेहोश हो जाये, और जब वह बेहोश हो जाये तो त्रिशूल गर्म करके उसकी जांघ में दाग देना, और उसके गहनों की गठ्ठर बनाकर रस्सी के सहारे तुम यहाँ चले आना,

इसके बाद मैं सोच विचारकर कुछ उपाय करूँगा, जो हमारे लिए लाभकारी हो, अब राजकुमार ने पदमावती के साथ वैसा ही किया, पहले उसने पदमावती को जी भरके मदिरा पिलाई और जब वह बेहोश हो गयी तो त्रिशूल से उसकी जांघ में दाग दिया, और गहनों की गठरी बनाकर अपने साथ ले आया, सवेरे शमसान में जाकर मंत्रीपुत्र ने तपस्वी का रूप धारण कर लिया, और राजकुमार को अपना शिष्य बनाकर बोला, कि अब तुम इन गहनों में से मोतियों का हार लेकर बाजार में बेचने के लिए जाओ, लेकिन इतना अधिक दाम बताना की कोई खरीद ही न पाए, और अगर तुम्हें नगररक्षक पकड़ते है तो निःसंकोच कहना कि मेरे गुरु ने इसे बेचने के लिए कहा है,

 अब राजकुमार हार लेकर बाजार में घूमने लगा बेचने के लिए, लेकिन जो भी उसका दाम सुनता, उसे खरीदने से मना कर देता, उधर दंतवैद्य के घर चोरी की खबर पूरे राज्य में फैल गई, और चोर का पता लगाने के लिए सैनिक पूरे राज्य में फैल गए, इधर राजकुमार के हाथ मे पदमावती का हार देखकर नगर रक्षको उसे पकड़ लिया, और पूंछा की तपस्वी यह हार तूूु मिला, क्योकि दंतवैद्य की कन्या से गहने चोरी हुए है और यह हर उसी कन्या है, इस पर तपस्वी भेषधारी राजकुमार ने बताया कि " यह हार उसे उसके गुरु ने बेचने के लिए दिया है, आप उन्ही से पूंछ लीजिये, और नगरपाल सहित सभी तपस्वी रूपी मंत्रीपुत्र के पास गए,

 और पूंछा की तपस्वी आपको यह हार कहाँ से प्राप्त हुआ, तब तपस्वी रूपी मंत्रीपुत्र बोला, " मैं तो तपस्वी हूँ, सदा जंगलो में घूमता रहता हूँ संयोग से कल रात्रि मैं यहां के शमसान में आकर रुका था, यहां मैन इधर उधर से आई हुई योगनियों को देखा, उनमे से एक योगिनी राजपुत्र को ले आयी और उसने उस राजपुत्र का हृदय निकालकर भैरव को अर्पित कर दिया, और मदिरा के मद में चूर वह मुझे चिढ़ाने लगी, जब उसने मुझे बहुत परेशान कर दिया, तब मैंने मंत्रशक्ति से अग्नि जलाकर उसमे अपना त्रिशूल तपाकर उसकी जांघ में दाग दिया, उसी समय मैंने उसके गले से यह मोती की माला खींची थी, अब मैं ठहरा तपस्वी यह हर मेरे किस काम का इसलिए मैंने इसे बेचने के लिए भेज दिया,


यह सुनकर नगरपाल राजा के पास गया , और सारा वृतांत सुनाया, राजा ने भी वह हर पहचान लिया क्योकि वह हार दंतवैद्य की कन्या को खुद राजा ने दिया था,तब राजा ने अपनी विस्वाशपात्र दासी को इसकी जांच करने के लिए दंतवैद्य के घर भेज की वह पदमावती के शरीर का परीक्षण करे कि उसकी जांघ पर त्रिशूल का चिन्ह है या नही, वृद्ध दासी ने जांच करके राजा को बताया कि पदमावती की जांघ पर वैसा ही निशान है जैसा यह तपस्वी कह रहा है, इसपर राजा को विस्वास हो गया कि पदमावती ने ही उसके बच्चे की हत्या की है, तब राजा खुद तपस्वी भेषधारी मंत्रीपुत्र के पास गए और पूंछा की पदमावती को क्या दंड दिया जाए, और मंत्रीपुत्र के कहने पर राजा ने पदमावती को नग्नावस्था में अपने राज्य से निष्कासित कर दिया, नग्न करके निष्कासित होने पर पदमावती ने आत्महत्या नही क्योकि वह जानती थी कि यह मंत्रीपुत्र कि चाल है, शाम होने पर मंत्रीपुत्र और राजकुमार उस जगह पर गए जहां पदमावती नग्न अवस्था मे बैठी हुई थी, और समझा बुझा कर अपने साथ ले गए, और सुखपूर्वक रहने लगे,

बेताल ने इतनी कथा सुनाकर राजा से पूछा कि " राजन आपतो श्रेष्ठ है इसलिए आप मुझे यह बताइये, की यदि राजा क्रोधवश पद्मावती को राज्य निष्कासन की जगह मृत्यदंड देता, या फिर पहचान जाने पर राजकुमार को मरवा देता,तो इस पति पत्नी की हत्या का पाप किसे लगता, राजन यदि तुम जानते हुए भी ठीक-2 नही बताओगे तो मेरा विस्वास करो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे, अब राजा विक्रमादित्य चक्कर मे पड़ गए कि अगर मैने कुछ बोल तो यह फिर उसी पेड़ पर वापस चला जायेगा, और नही बताया तो मृत्यु को प्राप्त करूँगा, इसलिए बोले कि योगेश्वर इसमे न जानने योग्य क्या है, इसमे इन तीनो का कोई पाप नही है, जो पाप है राजा कर्णोत्पल का है, बेताल बोलै इसमे राजा का क्या पाप है, जो कुछ किया उन तीनों ने किया, क्योकि हंस यदि चावल कहा जाए तो कौव्वे का क्या दोष,


तब विक्रमादित्य बोले कि " उन तीनों का कोई दोष नही है, राजकुमार और पदमावती काम की आग में जल रहे थे, वे बस अपना स्वार्थ साधन में लगे थे,इसलिए वें भी निर्दोष हैं, लेकिन राजा कर्णोत्पल अवश्य पाप का भागीदार है क्योंकि उसने अपने गुप्तचरों और प्रजा के द्वारा सच झूठ का पता नही किया, वह नीतिशास्त्र नही जानता था, और धूर्तों के चरित्र को भी नही जानता था, इसलिए वह पाप का भागीदार बना, यह सुनकर बैताल बोलै राजन अपने अपना मौन तोड़ दिया अतः मैं वापस चला, और बेताल राजा के कंधे उतारकर वापस उसी पेड़ पर जाकर लटक गया, जहां से राजा ने उसे उतारा था, लेकिन राजा घबराया नही और वापस पेड़ की तरफ लौट पड़ा,

आगे की कहानी अगले भाग में तो बने रहिये हमारे साथ धन्यवाद

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