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शुक सारिका की कहानी, तीसरी बेताल कथा

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नमस्कार दोस्तों,
                  जब राजा विक्रमादित्य उस शव को शीशम के पेड़ से फिर उतार कर उसे कंधे पर लादकर चलें, तो वह बेताल फिर बोला, राजन इस भयानक रात में तुम्हे डर नही लग रहा बड़ी हैरानी की बात है इसलिए मैं तुम्हे एक कहानी और सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो, विक्रमकेशरी पाटलिपुत्र के राजा थे, जो सर्व सम्पन्न थे, उनके पास एक तोता था जिसने श्राप के कारण यह जन्म पाया था, उस तोते का नाम विदग्धचूड़ामरिन था, जो शास्त्रज्ञाता और दिव्यज्ञान युक्त था, उस तोते की सलाह से ही राजा ने मगध राजकुमारी चंद्रप्रभा से विवाह किया था, उस राजकुमारी के पास सारिका नामक एक मैना थी जो विज्ञान की जानने वाली थीं, वें दोनो तोता मैना अपने स्वामियों की तन मन से सेवा करते थे, और एक ही पिंजरे में रहा करते थे, एक दिन तोता मैना से बोला कि" हम दोनों एक साथ एक पिंजरे में रहते है अतः तुम मेरे साथ भोजन करो, मेरे साथ बैठो, मेरे साथ सोओ, और मेरी बनकर रहो,

यह सुन मैना बोली कि " मैं परुष जाति का साथ नही करना चाहती क्योकि वें दुष्ट और मक्कार होते हैं, मैना की बात सुन तोते को बड़ा कष्ट हुआ और बोला कि " तुमने जो बात पुरुषों के लिए कहा है वह बिल्कुल असत्य है, असल मे मक्कार और धूर्त औरत होती है, इसी बात को लेकर तोता और मैना में झगड़ा उत्पन्न हो गया, तब मैना बोली कि ठीक है यदि तुम्हारी बात सत्य हुई तो मैं तुमसे विवाह कर लूंगी और यदि मेरी बात सत्य हुई तो तुम मेरे दास बनकर रहोगे, और निष्कर्ष के लिए दोनों राजा के पुत्र के पास गए, और जब राजपुत्र ने दोनों के झगड़े के बारे में सुना तो बोला की सारिका पहले तुम बताओ कि पुरुष किस प्रकार से दुष्ट होते हैं, तो मैना ने कहा कि सुनिए मैं आपको इससे संबंधित एक कहानी सुनाती हूँ,

सारिका मैना की कथा:-
                अर्थदत्त नामक धनी व्यापारी कामंदिका नामक नगर में रह करता था, उनका एक पुत्र था जिसका नाम था धनदत्त, जब धनदत्त के पिता की मृत्यु हुई, तो धनदत्त बुरे लोंगो के साथ उठने बैठने लगा, जिस कारण उसे जुएं और शराब की बुरी लत लग गयी, थोड़े ही दिनों में उसने जुएं और शराब  में सारे पैसे उड़ा दिए, और शर्मवश अपना देश छोड़कर विदेश घूमने लगे, एक दिन चलते चलते वह चंदनपुर गांव में पहुंचा, तथा भोजन के लिए एक व्यापारी के घर मे गया, तब व्यापारी ने उसका कुल वंश पूंछ कर उसे अपने घर मे ठहरा लिया, कुछ दिनों बाद वह व्यापारी धनदत्त के आचार विचार और व्यवहार से बड़ा प्रभावित हुआ, और अपनी पुत्री रत्नावली से धनदत्त का विवाह करवा दिया, और धनदत्त को अपने घर का जमाई, धनदत्त कुछ दिन तो ठीक ठाक रहा,

 लेकिन फिर धन आने की वजह से वह फिर जुएं और शराब का आदी हो गया, और अपने देश जाने को उतावला हुआ, लेकिन रत्नावली व्यापारी की इकलौती संतान थी, इसलिए व्यापारी उसे दूर नही भेजना चाहता था, लेकिन बहुत कहने सुनने पर वह व्यापारी राजी हो गया, और एक बुढ़िया के साथ धनदत्त अपनी पत्नी सहित अपने देश के लिए निकल पड़ा, चलते चलते वह एक जंगल मे पहुंचे जहां चोरो का भय दिखाकर धनदत्त ने अपनी पत्नी के सारे गहने उतरवा कर अपने पास रख लिए, और धन के लालच में उसने अपनी पत्नी और बुढ़िया को एक खांई में धकेल दिया, और अपने देश चला गया, खांई में गिरने से बुढ़िया की मृत्यु हो गईं, लेकिन झाड़ में अटकने के कारण रत्नावली बच गई और किसी तरह खांई से निकलकर रोते विलखते अपने पिता के पास पहुँची,
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अपनी पुत्री को इस हालत में देखकर उसके माता पिता ने इस हालत का कारण पूंछा, तो रत्नावली बोली कि " पिता जी रास्ते मे हमे डाकुओं ने लूट लिया और मेरे पति को बंधक बनाकर अपने साथ ले गए, और मुझे और उस बुढ़िया को खांई में धकेल दिया, बुढ़िया तो मर गई लेकिन मैं किसी तरह बचकर आपके पास पहुंची हूँ, यह जानकर उसके माता पिता ने उसे धीरज बँधाया, लेकिन फिर भी वह स्त्री अपने पति का ध्यान करती हुई अपने पिता के यहां रहने लगी, उधर धनदत्त अपने देश पहुचकर, थोड़े ही दिनों में अपने साथ लाया सारा धन जुएं में हार गया, तब उसने सोचा कि क्यो न वह अपने ससुर के पास जाए और फिर से थोड़ा धन लेकर आये, और पूछने पर कह दूंगा की उनकी पुत्री उसके घर मे मजे से है, ऐसा विचार करके वह अपने ससुराल की ओर निकल पड़ा, और जैसे ही वह अपने ससुर के घर के पास पहुंचा, छत पर खड़ी उसकी पत्नी ने अपने पति को आता देख पहचान लिया,

और दौड़कर वह उस पापी के चरणों मे गिर पड़ी, पत्नी को जीवित देख धनदत्त डर गया, लेकिन उसकी पत्नी ने उसे बताया कि कैसे उसने डाकुओं से लूटने की झूठी कहानी अपने माता पिता को सुनाई थी, तब धनदत्त निश्चिंत होकर अपने ससुर से मिला, इस प्रकार दामाद के जीवित लौटने से खुश ससुर ने भी अपने इष्ट मित्र और सगे संबंधियों को बुलाकर सबको भोजन कराया, और धनदत्त फिर अपने ससुराल में मौज से रहने लगा, लेकिन थोड़े समय बाद वह दुष्ट धनदत्त फिर धन के लालच में अपनी पत्नी की हत्या कर दी और ससुर के घर की सारी धन संपत्ति लेकर अपने देश लौट आया, है राजन मैं इसीलिए पुरुष को दुष्ट और दुराचारी मानती हूँ, यह कहानी सुनकर राजपुत्र बोला कि तोते मैना ने अपनी बात कह दी अतः तुम्हे जो कहना है तुम भी कहो, तोता बोला कि " हे राजन स्त्रियां अदम्य सहसवाली दुष्ट चरित्र वाली तथा कठोर हृदय वाली होती है इनसे संबंधित यह कहानी ध्यान से सुनो,

तोते द्वारा कही गयी कहानी :-
                हर्षवती नगर में एक धनवान बनिया रहा करता था, उसकी एक सुंदर कन्या थी वसुदत्ता, इकलौती पुत्री होने के नाते बनिया उसे बहुत प्रेम करता था, बनिया ने अपनी कन्या का विवाह अत्यंत रूपवान समुद्रदत्त से किया जो ताम्रलिपि नगर में रहा करता था, एक बार वसुदत्ता का पति जब अपने देश मे था और वसुदत्ता अपने पिता के घर आयी हुई थी, तो उसने एक पुरुष को देखा और उसे देखकर उसकी कामवासना जाग उठी, तब उसने गुप्तरूप से उस पुरुष को बुलाया और उसके साथ संभोग किया, और बार बार उससे मिलने जुलने लगी, उसका यह राज उसकी केवल एक सहेली जानती थी और कोई नही,

एक बार जब उसका पति ससुराल आया तो उसके सास ससुर से उसकी बहुत सेवा की, और रात्रि के समय वसुदत्ता की माता ने वसुदत्ता को सजा संवार कर उसके पति के पास भेजा, किन्तु साथ मे सोते हुए भी वसुदत्ता अपने प्रेमी के बारे में ही सोंचती रही, इसलिए नींद का बहाना करके एक तरफ लेट गयी, और थका मांदा पति भी मदिरा के नशे में सो गया, लेकिन वसुदत्ता को नींद कहाँ आने वाली वह अपने प्रेमी के विचारों में खोई रही, तभी उसके महल में एक चोर घुसा लेकिन वसुदत्ता को जागते हुए देख वह एक अंधेरे कोने में खड़ा हो गया, वसुदत्ता अपने प्रेमी से मिलने को बेचैन हो रही थीं, क्योकि उसने अपने प्रेमी से मिलने की जगह और समय दिन में ही तय कर लिया था, अतः वह चुपचाप उठी और सजधजकर अपने प्रेमी से मिलने निकल पड़ी,
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यह देखकर चोर ने सोचा कि मैं जिन गहनों के लिए यह आया हूँ, उन गहनों के साथ तो यह बाहर जा रही है, इसका पीछा करके देखूं तो सही यह कहाँ जा रही है, मौका मिलते ही रास्ते मे इसे लूट लूंगा, अतः चोर भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा, कुछ दूर चलने पर वसुदत्ता की सहेली मिली और दोनों पास के ही एक बगीचे में घुसीं जहाँ प्रेमी को मिलने के लिए बुलाया था, लेकिन जब वसुदत्ता उस जगह पहुँची तो उसने देखा कि उसका प्रेमी मरा हुआ पेड़ से टंगा हुवा है, असल मे जब वह युवक बगीचे में चोरी छिपे घुस रहा था तब नगर रक्षको ने उसे देख लिया और चोर समझकर पीट पीटकर मार डाला, और फांसी का फंदा डालकर पेड़ से लटका दिया,

प्रेमी को ऐसी अवस्था मे देखकर वह बेहोश हो गयी और जब होश आया तो किसी तरह शव को पेड़ से उतारा और फूल माला चढ़ाकर लिपटकर विलाप करने लगीं, अत्यधिक प्रेम के कारण उसने अपने प्रेमी के मृत शरीर का आलिंगन किया और जैसे ही उसे उठाकर उसे चूमना चाहा, वैसे ही उसके प्रेमी के शरीर मे बेताल घुस गया, और अपने दांतों से वसुदत्ता की नाक काट ली, दर्द से कराहती वसुदत्ता उससे दूर हट गई, लेकिन जीवित समझकर फिर उसके पास गई तो उसे पता चला कि इनके शरीर मे बेताल घुस गया है, तब डर के मारे वह घर लौट आयी, उस चोर ने छिपकर यह सारा माजरा देखा, और सोंचने लगा इस स्त्रीं का हृदय कितना कठोर है, कि इतने भयानक अंधेरें में अकेले इतनी दूर चली गयी,
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चलकर देखता हूँ अब यह क्या करती है, अब वसुदत्ता उस कोठरी में गयी जहाँ उसका पति सोया हुआ था, और रोती हुई जोर जोर से चिल्लाने कि बचाओ बचाओ इस दुष्ट ने मेरी नाक काट ली, इस प्रकार वसुदत्ता को चिल्लाता हुआ सुन उसके माता पिता उसके शयनकक्ष में पहुँचे, और वहां पहुंचकर देखा कि वसुदत्ता की नाक काटी हुई है और उससे खून बह रहा है, तब उसके पिता ने अपने दामाद को दुष्ट समझकर रस्सी से बांध दिया, और सुबह समुद्रदत्त का ससुर आपकी नाक कटी पुत्री के साथ राजा के दरबार मे पहुँचा, और सारा हाल जानकर राजा ने समुद्रदत्त को प्राणदंड की सजा दे दीं, जब राजा के कर्मचारी समुद्रदत्त को मारने के लिए ले जा रहे थे, तो वह चोर उन कर्मचारियों के पास गया और बोला कि" हे कर्मचारियों यह व्यक्ति निर्दोष है मैं सारी बात जानता हूँ अतः मुझे राजा के ले चलो, मैं उन्हें सारी सच्चाई बताऊंगा,

तब वें कर्मचारी उस चोर को राजा के पास ले गए, वहां अभयदान लेकर उस चोर ने उस रात की सारी घटना राजा को बताई, और बोला कि महाराज यदि आपको भरोसा न हो तो स्यंम इसकी जांच करवा लीजिये, इसकी कटी हुई नाक अभी भी उस शव के मुंह के अंदर है, तब राजा ने अपने सेवक को उस बगीचे में भेजा, और सारा सच जानकर समुद्रदत्त को रिहा कर दिया, और उसकी पत्नी के कान कटवाकर राज्य से निकाल दिया, और उसके ससुर की सारी संपत्ति जब्त कर ली, उस चोर को राज्य का नगर अध्यक्ष नियुक्त किया, इतनी कहानी कहकर तोता बोला कि " राजन इस प्रकार इस संसार मे असंख्य स्त्रियां है, इतना कहते ही तोता इंद्र के श्राप से मुक्त हो गया, और चित्ररथ नामक गंधर्व बनकर स्वर्ग चला गया, इसी तरह मैना भी श्राप से मुक्त होकर तिलोत्तमा अप्सरा बनकर स्वर्ग चली गयी,

यह कहानी सुनकर बेताल राजा विक्रमादित्य से बोला कि" राजन इस प्रकार तोता मैना अपने श्राप से मुक्त हो गए, अतः तुम बताओ कि स्त्रियाँ बुरी होती है या पुरुष, यदि तो इसका उत्तर जानते हुए भी नही बताओगे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा, यह सुनकर राजा विक्रमादित्य बोले " पुरुष शायद हो कोई कोई दुष्ट होता है, लेकिन स्त्रियां ज्यादातर दुष्ट और कुटिल बुद्धि की होती है, राजा के ऐसा कहने पर बेताल फिर अपने स्थान पर चल गया, और राजा फिर उसे लेने पेड़ की तरफ लौट पड़ा,

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१:- बेताल पच्चीसी प्रारम्भ कथा ..?
२:- विक्रम बेताल प्रथम कहानी , रानी पद्मावती
३:- विक्रम बेताल दूसरी कथा, तीन ब्राम्हण

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