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मां गंगा को क्यों निगल गए जहानु मुनि

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नमस्कार दोस्तों               
                  जहानु मुनि ने संपूर्ण गंगा को क्यों पी लिया इसका उत्तर जानने के लिए, हम आपको गंगा के पृथ्वी पर आने का कारण क्या था पहले यह बताएंगे, इक्ष्वाकु वंश राजा सगर की दो पत्नियां थी सुमति और केशनी, महर्षि और्व के वरदान दिए जाने पर केशनी से एक पुत्र असमंजस उत्पन्न हुआ, जो कि बड़ा होने पर बड़ा दुराचारी हुआ, जिस कारण राजा ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया,


उसी का पुत्र था अंशुमान जो कि अपने पिता के बिल्कुल विपरीत स्वभाव का था, तथा सुमति से साठ हजार पुत्रों उत्पन्न हुए थे, कुछ समय बाद राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया, जिसमें सफेद रंग का घोड़ा छोड़ा, और उसकी रक्षा हेतु अंशुमान को सेना सहित नियुक्त किया, लेकिन ईर्ष्या वश देवराज इंद्र ने राक्षस का वेश धारण कर घोड़े को चुरा लिया, और उसे ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया, तब राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को घोड़े की तलाश में भेजा, तथा जब सगर के साठ हजार पुत्रों ने घोड़े को कपिलमुनि के आश्रम में बाधा पाया,


तो वें कपिल मुनि को मारने के लिए दौड़े, लेकिन कपिल मुनि ने ६०००० सगर पुत्रों को अपनी क्रोध की अग्नि से जलाकर भस्म कर डाला, तब महाराज सागर ने अपने पौत्र अंशुमान को उस घोड़े को लाने के लिए भेजा, और अंशुमान भी कपिल मुनि के पास पहुंचे, और विनम्र भाव से मुनि की स्तुति की, और स्तुति से प्रसन्न होकर मुनि ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा, तब अंशुमान ने कहा कि " हे मुनि आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि आप की क्रोध अग्नि से भस्म हुए मेरे पितरगण को स्वर्ग की प्राप्ति हो, यह सुनकर कपिल मुनि बोले कि तेरा पौत्र गंगा जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाएगा,  उनके जल से इनके भस्म आस्तियों का स्पर्श होते ही वह स्वर्ग की प्राप्ति करेंगे,  क्योंकि गंगा श्री हरि विष्णु के नख(नाख़ून) से निकली है,

उसी अंशुमान से दिलीप नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, तथा दिलीप से भागीरथी उत्पन्न हुए, अतः भागीरथी ने अपने पितरगणों को मोक्ष दिलाने का प्रण किया, और मंत्रियों को सारा राजकाज सौंपकर तपस्या करने गोकर्ण तीर्थ पर चले गए, और कई वर्षों बाद जब ब्रह्मा जी ने उनसे प्रसन्न होकर दर्शन दिए, तब भागीरथी ने उनसे दो वरदान मांगे, पहला वर उन्होंने पितरों की मुक्ति के लिए मांगा, तथा दूसरा वर वंश को बढ़ाने के लिए पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए, तब ब्रह्मा जी ने उन्हें दोनों वरदान दिए और बोले कि " गंगा का वेग इतना अधिक है कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती,  अतः तुम्हें महादेव की सहायता लेनी चाहिए, तब भागीरथ ने पैर के अंगूठे पर खड़े होकर महादेव की कठोर तपस्या प्रारंभ कर दी,

और प्रसन्न भगवान शिव ने भागीरथ को वरदान स्वरूप गंगा को अपने मस्तक पर धारण करने का वरदान दिया, लेकिन जब यह सूचना गंगा जी को मिली तो वह बिचलित हो गई, क्योंकि वह स्वर्ग लोक छोड़कर कहीं और जाना नहीं चाहती थी, इसलिए उन्होंने योजना बनाई, कि वह अपने वेग से भोलेनाथ को ही बहाकर पाताल लोक ले जायेंगी, अतः भगवान शिव ने गंगा की मंशा जानते हुए, गंगा जी को अपनी जटाओं में ही समाहित कर लिया, शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं से निकलने का मार्ग ही नहीं दिया, यह देखकर कि शिवजी ने गंगा को अपनी जटाओं में समाहित कर लिया है, और गंगा जी को अपनी जटाओं से निकलने का मार्ग ही नहीं दे रहे हैं,

तब भागीरथ ने भगवान शिव की फिर से तपस्या की, और तपस्या से प्रसन्न होकर तथा गंगा का घमंड चूर चूर करने पर, शिव जी ने गंगा को बिंदुसार की ओर छोड़ा, वहां से गंगाजी सात दिशाओं में प्रवाहित हुई, ह्लादिनी, पावनी, नलिनी पूर्व दिशा की ओर, तथा सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु पश्चिम की ओर और सातवीं धारा राजा भगीरथ के पीछे पीछे चलने लगी, रास्ते में जहानु मुनि का आश्रम था, जिससे गंगा जी के जल धारा से जहानु मुनि की पूरी यज्ञशाला बह गई, जिससे क्रोधित जहानु मुनि ने गंगा जी का संपूर्ण जल ही पी लिया,

लेकिन सभी देवताओं के बहुत कहने पर तथा क्षमा याचना करने पर जहानु मुनि ने गंगा जी को अपने कानों के मार्ग से बाहर निकाला, तभी से गंगा जी को जान्हवी भी कहा गया, इसके बाद भागीरथ ने गंगा जी को कपिल मुनि के आश्रम में ले आए, और गंगा के जल से पितरों की भस्म को स्पर्श कराकर मोक्ष दिलाया, जिससे प्रसन्न ब्रह्मा जी ने भगीरथ को वरदान दिया कि " जब तक समुद्र रहेंगे तुम्हारे पितर देवता समान होंगे, और गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाएगी, तथा तीन धाराओं में बहने के कारण गंगा जी को त्रिपथा भी कहा गया है,

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