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मुनि अष्टावक्र की कहानी

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नमस्कार दोस्तों :- ऋषि अष्टावक्र प्रसिद्ध हिंदू धर्म के वैदिक ऋषियों में से एक हैं अष्टावक्र नाम आठ शारीरिक विकृतियों को दर्शाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है आठ चक्र, मुनि अष्टावक्र के जन्म की कथा का वर्णन महाभारत के वनपर्व मे किया गया है,

कथानुसार :-
              उद्दालक मुनि के कहोड नामक शिष्य हुए, जिनकी सेवा से प्रसन्न होकर गुरु उद्दालक ने कहोड़ को सभी वेद पुराण बहुत जल्दी पढ़ा दिए, और अपनी कन्या सुजाता से विवाह भी करवा दिया, कुछ समय बाद जब सुजाता गर्भवती हुई तब एक दिन कहोड़ वेद पाठ कर रहे थे, उसी समय गर्भ से आवाज आई कि पिताजी आप रात भर वेद पाठ क्यों करते हैं यह उचित नहीं है, यह सुनकर कहोड़ क्रोधित हो गए, और उस गर्भ को श्राप दे दिया कि "तू पेट में ही ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करता है, इसलिए तू आठ जगह से टेढ़ा उत्पन्न होगा" कुछ समय बाद सुजाता के पेट में पीड़ा हुई, तो उसने कहोड़ से धन लाने के लिए कहा और कहोड़ धन लाने के लिए राजा जनक के पास गए, किंतु वहां शास्त्रार्थ में कुशल बंदी ने उन्हें शास्त्रार्थ में हरा दिया, और शास्त्रार्थ के नियमानुसार उन्हें जल में डुबो दिया गया,

जब यह बात उद्दालक को पता चली तो सुजाता से सारी बात कह कर बोले कि" पुत्री अष्टावक्र से इस बारे में कुछ मत कहना, इसलिए उत्पन्न होने के बाद भी अष्टावक्र उद्दालक को ही अपना पिता जानते थे, और उनके पुत्र श्वेतकेतु को अपना भाई, जब अष्टावक्र 12 वर्ष का था, तो एक दिन वह उद्दालक की गोद में बैठा था, तभी श्वेतकेतु वहां आया और अष्टावक्र को खींचकर उद्दालक की गोद से उतार दिया, और बोला कि "यह तेरे बाप की गोद नहीं है, तब अष्टावक्र ने घर जाकर अपनी माता से पूछा कि" मेरे पिताजी कहां है माता, तब सुजाता ने सारी सच्चाई अष्टावक्र को बता दी, और सच जानकर अष्टावक्र व्याकुल हो गया, तथा अपने मामा स्वेतकेतु के साथ सलाह करके राजा जनक के यहां जाने की तैयारी कर बैठा,
जब यज्ञशाला के दरवाजे पर दोनों मामा भांजे पहुंचे, तो द्वारपाल ने उन्हें रोक लिया यह कह कर कि" यहां बच्चों का जाना वर्जित है यहां केवल वृद्ध और विद्वान व्यक्ति ही जा सकता है, तब अष्टावक्र बोला कि" हे द्वारपाल अधिक उम्र होने से या बाल के पकने से ही कोई बड़ा या ज्ञानी नहीं होता, जो वेदों का ज्ञाता होता है वही श्रेष्ठ है, इसलिए मैं बंदी से मिलना चाहता हूं, आप मेरा संदेश महाराज तब पहुंचाए, आज तुम हमें विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ करते देखोगे, और बंदी को परास्त हुआ पाओगे, द्वारपाल बोला कि "ठीक है मैं आपको राज सभा में ले जाऊंगा, लेकिन वहां पहुंचकर विद्वानों के योग्य कार्य करके दिखाना पड़ेगा,

ऐसा कहकर द्वारपाल उन्हें राजा के पास ले गया वहां पहुंचकर अष्टावक्र ने कहा कि" राजन आप ही श्रेष्ठ और चक्रवर्ती राजा है, मैंने सुना है कि आपके यहां बंदी नाम का कोई विद्वान है, जो शास्त्रार्थ में ब्राह्मणों को परास्त कर उन्हें जल में डाल देता है, यह सुनकर ही मैं उदैवत ब्रह्म विषय पर उससे शास्त्रार्थ करने आया हूं, कहां है वह बंदी, तब राजा जनक ने कहा कि "बालक पहले कितने वेद वेदांता ब्राम्हण आए, लेकिन कोई भी बंदी के सामने शास्त्रार्थ में टिक ना सका, तुम तो सिर्फ एक बालक हो, इस पर अष्टावक्र ने कहा कि "महाराज पहले ब्राह्मणों का तो पता नहीं, लेकिन उनका पाला आज तक मेरे जैसों से नहीं पड़ा, आज मैं उसे परास्त करके यह साबित कर दूंगा कि यह धरती विद्वानों से भरी पड़ी है,
तब राजा ने अष्टावक्र की परीक्षा के विचार से बोले कि "जो पुरुष 30 अवयव 12 अंश 24 पर्व और 308 आरोवाले वाले पदार्थ को जानता है, वह बड़ा विद्वान है, अष्टावक्र बोला कि जिसने पक्ष रूप 24 पर्व, नमृतु रूप 6 नाभि, मांस रूप 12 अंश, और दिन रूप 308 आरे हैं, वह निरंतर घूमने वाला संवत्स रूप कालचक्र आपकी रक्षा करें, उत्तर सुन राजा ने फिर प्रश्न किया कि "सोने के समय कौन आंख नहीं मूँदता, जन्म लेने के बाद किसकी गति नहीं होती, ह्रदय किसके पास नहीं होता, और वेग में कौन बढ़ता है, अष्टावक्र बोला कि "मछली सोने के बाद आंख नहीं मूंदती, अंडा उत्पन्न होने के बाद चेष्टा नहीं करता, पत्थर में ह्रदय नहीं, नदी वेग से बढ़ती है,

 यह सुन राजा आश्चर्यचकित रह गए और बोले कि वाद-विवाद में आप जैसा कोई नहीं, इसलिए मैं आपको मंडप का द्वार सौंपता हूं और यही वह बंदी है, तब अष्टावक्र ने बंदी को घूरकर देखा और बोला कि "अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले बंदी तुमने ही जल में डूबाने का नियम बनाया है, लेकिन तुम आज मेरे सामने बोल नहीं सकोगे, तुम्हारी तर्क शक्ति नष्ट हो जाएगी, अतः तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर दो और मैं तुम्हारे, जब भरी सभा में क्रोध के साथ अष्टावक्र ने ललकारा, तो क्रोधित बंदी बोला कि" अष्टावक्र एक ही अग्नि अनेक प्रकार से प्रकाशित होती है, एक सूर्य सारे जगत को प्रकाशित कर रहा है, शत्रुओं का नाश करने वाला इंद्र एक ही वीर है, तथा पितरों मे ईश्वर यमराज भी एक ही है, अष्टावरक बोला कि" इंद्र और अग्नि दो देवता, नारद और पर्वत दो देवर्षि, दो अश्विनी कुमार, रथ के दो पहिए तथा विधाता ने पति पत्नी रूप में सहचर भी दो ही बनाए हैं,
इस प्रकार कई सारे सवाल जवाब बंदी और अष्टावक्र के मध्य हुये, और अंत में अष्टावक्र ने कहा कि" 1 वर्ष में महीने 12 होते हैं, जगती छंद में अक्षर भी 12 होते हैं, प्राकृत यज्ञ 12 दिन का कहा जाता है, और धीर पुरुष के आदित्य भी 12 ही कहे गए हैं, बंदी बोला तिथियों में त्रयोदशी को उत्तम कहा गया है, और पृथ्वी भी 13 द्वीपों वाली बताई गई है, इस प्रकार बंदी के आधा श्लोक कह कर चुप हो जाने पर, अष्टचक्र श्लोक को पूरा करते हुए बोला की "अग्नि, सूर्य और वायु यह 13 दिनों में यज्ञ के व्यापक है, वेदों में भी तेरह आदि अक्षरों वाले छंद कहे गए हैं, इतना सुनकर बंदी का मुंह नीचा हो गया, लेकिन अष्टावक्र के मुंह से वाणी की झड़ी लगी रही, जिसे देख वहां उपस्थित सभी श्रेष्ठजन हर्षित हो रहे थे,

 तभी अष्टावक्र बोला कि "यह बंदी शास्त्रार्थ में पराजित कर अनेक विद्वानों को जल में डूबा चुका है, इसलिए इसकी भी वही गति की जाय, बंदी ने कहा कि "राजन मैं जलाधीश का पुत्र हूं मेरे पिता के यहां भी आपकी तरह ही 12 वर्ष में पूर्ण होने वाला यज्ञ चल रहा है, उसी के लिए मैंने जल में डूबाने के बहाने चुने हुए श्रेष्ठ विद्वानों को वरुण लोके भेज दिया है, वह सब अभी लौट आएंगे, अष्टावक्र मेरे पूज्य हैं इनकी कृपा से जल में डूबकर मैं भी शीघ्र अपने पिता वरुण देव से मिलूंगा, तब अष्टावक्र राजा जनक को फटकारते हुए बोला कि "राजन आप इसे मतवाले हाथी की तरह क्यों सुन रहे हैं, कहीं आप इस चापलूस की बातों में तो नहीं आ गए,
तब राजा जनक ने कहा कि" आप तो साक्षात दिव्य पुरुष हैं मैं आपकी इच्छा अनुसार अभी इनके दंड की व्यवस्था करता हूं, बंदी ने कहा कि" राजन वरुण का पुत्र होने के नाते मुझे जल में डूबने का तनिक भी भय नहीं है, यह अष्टावक्र भी बहुत दिनों से डूबे अपने पिता कहोड का अभी दर्शन करेंगे, सभा में बात हो ही रही थी कि समुद्र में डूबे सभी विद्वान जल से बाहर आ गए, तब जल से बाहर कहोड ने कहा कि "मनुष्य ऐसे ही कर्मों के लिए पुत्र उत्पन्न करते हैं, कि जिस कार्य को मैं नहीं कर सका, वह कार्य मेरे पुत्र ने कर दिखाया, इसके पश्चात बंदी भी समुद्र में कूद पड़े,

तत्पश्चात सभी ब्राह्मणों ने अष्टावक्र समेत उनके पिता का भी पूजन किया, और फिर स्वेत मुनि समेत वह अपने आश्रम में आ गए, आश्रम पहुंचकर मुनि कहोड़ मधुबिला नदी के तट पर गए, और अष्टावक्र से बोले की" पुत्र इस समगंगा नदी मे प्रवेश करो, और जैसे ही अष्टावक्र ने उस नदी मे डुबकी लगाई, उनके सभी अंग सीधे हो गए, और उनके संसर्ग से वह नदी भी पवित्र हो गयीं, इसी मधुबिला नदी मे वृत्तासुर के वध से राज्यलक्ष्मी से भ्रष्ट इंद्र ने स्नान किया था और अपने समस्त पापों से छुटकारा पाया था, अष्टावक्र संहिता या अष्टावक्र गीता जो कि 20 अध्याय की है जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक का संवाद मिलता है हिंदू धर्म ग्रंथों में से एक है l

तो दोस्तो आप को यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताइएगा और बने रहिए हमारे साथ ऐसी रोचक कथाओं के लिए धन्यवाद

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