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सातवीं बेताल कथा, सत्वशील की कहानी

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विक्रम बेताल 
नमस्कार दोस्तों
               राजा विक्रमादित्य ने बेताल को फिर से पेड़ से उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े, तभी बेताल फिर बोला कि राजन तुम्हारी निस्वार्थ सेवा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं अतः एक कथा और सुनो,

प्राचीन काल में चंद्रसेन नामक राजा हुआ, जो शत्रुओं का धन तो छीन लेता था, लेकिन पराये धन को हाथ नहीं लगाता था, स्त्रियों से मुंह फेर लेता था लेकिन शत्रु पर दया नहीं दिखाता था, एक बार एक सत्वशील नामक राजकुमार राजा के पास आया और दरिद्रता दिखाने के लिए अपने कपड़े फाड़ लिए, वह नौकर बनकर राजा की सेवा करता रहा, लेकिन राजा ने उसे कभी कोई उपहार नहीं दिया, तब उसने सोचा कि राज कुल में जन्म लेने के बाद भी मैं दरिद्र क्यों..? मेरे दरिद्र होने पर भी भगवान ने इतनी महत्वकांक्षा मुझे क्यों दी, मैं अपने साथियों के साथ इस राजा की सेवा कर रहा हूं फिर भी इतना कष्ट उठाता हूं, सोच ही रहा था कि एक दिन राजा शिकार पर जाते वक्त उसे अपने साथ ले गए,  शिकार करते समय राजा एक विशाल सूअर का पीछा करते हुए अकेले ही दूर जा पहुंचा, जहां वह सूअर कहीं छिप गया, उस जंगल में अकेले राजा को दिशा भ्रम हो गया,

 वहीं भूखा प्यासा सत्वशील किसी तरह अकेले ही राजा के पास पहुंचा, तब राजा ने उससे पूछा कि "सत्य शील क्या तुम वह रास्ता जानते हो जहां से हम आए थे,  तब सत्य शील ने कहा कि " हाँ महाराज मुझे पता है लेकिन क्यों ना हम थोड़ी देर आराम कर ले' राजा ने कहा "ठीक है लेकिन देखो अगर कहीं पानी मिल जाता है तो और अच्छी बात है, तब सब तो सील एक पेड़ पर चढ़ गया जहां से उसे एक नदी दिखाई दी तब वह पेड़ से उतरकर राजा को वहां ले गया और उसकी प्यास बुझाई राजा के पानी पीने के बाद सत्य शील ने राजा को कुछ आंवले खाने के लिए दिए जिसे देखकर राजा ने पूछा कि "यह तुम्हे कहां से मिला, तब घुटने के बल बैठकर सत्य शील बोला कि "हे राजन मैं पिछले 10 साल से यही आंवला खाकर जीवित हूं और बौद्ध मुनि का व्रत धारण करके आप की आराधना करता हूं, इसमें संदेह नहीं कि तुम सच्चे अर्थों में तुम्हारा नाम सत्य शील है ऐसा कहकर राजा ने सोचा कि धिक्कार है जो अपने सेवकों की स्थिति नहीं जानता उनके मंत्रियों को भी धिक्कार है जो अपने सेवकों की स्थिति राजा को नहीं बताते,
यह सोचकर राजा ने दो आंवले खाए और विश्राम किया बाद में सत्य शील ने राजा को घोड़े पर सवार कराया और खुद आगे आगे चलने पर चलने लगा राजा के कहने पर भी वह घोड़े के पीछे नहीं बैठा रास्ते में बिछड़े हुए सैनिक भी मिल गए, राजधानी पहुंचकर राजा ने उसे भरपूर दान दिया लेकिन अब भी राजा सत्य शील का उपकार मानता था तथा सेवक का रूप छोड़कर सत्यशील अब राजा चंद्रसेन के निकट रहने लगा एक बार राजा ने उसे अपने लिए सिंगल नरेश की कन्या मांगने के लिए सिंगल राज्य भेजा तथा राजआज्ञा से सत्यशील कुछ ब्राह्मणों को साथ लेकर जहाज पर सवार हुआ जहाज अब आधे रास्ते में था तभी समुद्र के बीच में एक ध्वजा ऊपर उठने लगी जो ऊपर उठता ही गया अचानक काले बादल घिर गए और वर्षा होने लगी तेज हवा चलने लगी सारे ब्राम्हण चिल्लाने लगे यह देख सत्य शील समुद्र में कूद पड़ा उस ध्वजा को काटने के लिए तभी हवा के तेज झोंकों ने उसके जहाज को दूर फेंक दिया,

जब सत्यशील ने समुद्र में डुबकी लगाई तो उसे समुद्र के बदले सुंदर नगरी दिखाई पड़ी जहां देवी कात्यायनी का मंदिर देखा वह देवी को प्रणाम करके वहां बैठ गया और सोचने लगा कि यह कैसा इंद्रजाल है उसी समय दरवाजा खोलकर एक कन्या अपनी सहेलियों के साथ मंदिर के प्रकोष्ठ से बाहर आई और प्रभा मंडल के भीतर चली गई सत्य शील भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा प्रभा मंडल में घुसते ही उसने एक दूसरा नगर देखा जहां वह कन्या एक मणि पर्वत पर बैठी थी सत्यशील उस कन्या को देखते ही रह गया सत्यशील को कामातुर देख कन्या ने अपनी सहेली की तरफ देखा उसका इशारा समझ कर सखी बोली कि हे श्रीमंत आप हमारे यहां अतिथि हैं इसलिए हमारी स्वामिनी का आतिथ्य ग्रहण करें उठिए चलकर स्नान करके भोजन ग्रहण कीजिए यह सुनकर सत्यशील ने राहत की सांस ली और स्नान करने सरोवर में चला गया लेकिन जैसे ही सरोवर मे डुबकी लगाकर बाहर आया वह कन्या सहेलियों सहित गायब हो चुकी थी और वह स्वयं राजा चंद्रसेन के बगीचे के एक तालाब में आ पहुंचा था,

यह देख वह सोचने लगा कि यह कैसा असर है उस सरोवर में नहाने गया और यहां पहुंचा कन्या भी गायब है यह सोचता हुआ वह विलाप करता पागलों की तरह बगीचे में घूमने लगा, सत्यशील का ऐसा हाल देखकर माली ने जाकर सारा हाल राजा को बताया इस पर राजा चंद्रसेन सत्यशील से मिले और इस पागलपन का कारण पूछा तो सत्यशील ने सारा हाल सुनाया तब राजा बोला कि मित्र तुम चिंता मत करो मैं तुम्हें उस कन्या से मिलवाऊंगा, अगले दिन राजा मंत्री को सारा कार्यभार सौंप पर सत्यशील के साथ चल पड़ा जहाज ज़ब समुद्र मे उस स्थान पर पहुंचा तो सत्यशील ने पहले की तरह पताका के साथ ध्वजा को उठता देखा और राजा से बोला कि यही वह दिव्य महाध्वज है जब मैं इस ध्वज के पास कूद पडूँ तो आप भी कूद जाइएगा राजा ने वैसा ही किया और डुबकी लगाने के बाद दोनों उसी दिव्य नगर में जा पहुंचे आश्चर्य पूर्वक देखते हुए राजा ने देवी पार्वती को प्रणाम किया और सत्यशील के पास बैठ गया,
 उसी समय प्रभामंडल से वही कन्या अपनी सहेलियों के साथ बाहर आई जिसे देख सत्यशील बोला कि राजन यही वह सुंदरी है जिसे मैं प्रेम करता हूं तब राजा ने उस दिव्य कन्या को देखा वह कन्या जब देवी कात्यायनी के मंदिर में पूजा करने लगी तो राजा सत्वशील को लेकर बगीचे में चला गया और जब कन्या पूजा करने के बाद बाहर आई तो अपनी सहेली से बोली कि जाकर देखो दिव्य पुरुष कहां है जो अभी यहां उपस्थित थे उनको हमारा आतिथ्य स्वीकार करने की बात कहो तब सहेली राजा चंद्रसेन और सत्यशील के पास गई और संदेश कहा तब राजा ने कहा कि हमारा इतना ही आतिथ्य सत्कार बहुत है इससे ज्यादा कोई आवश्यकता नहीं है जब सहेली ने आकर यह बात कन्या को बताइ तो वह स्वयं उन दोनों के पास गई और उनसे आथित्य ग्रहण करने की बात कही तब राजा ने सत्यशील की तरफ इशारा करते हुए कन्या से कहा कि मैं इनके कहने से देवी कात्यायनी के दर्शन के लिए आया था अतः मैंने माता के दर्शन कर लिए हैं और तुमको भी देख लिया अब हमें किसी आतिथ्य की जरूरत नहीं है,

तब कन्या बोली कि आप लोग मेरे साथ नगर भ्रमण पर चले कन्या के ऐसा कहने पर राजा हंस कर बोले कि सत्यशील ने मुझे बताया है कि यहां एक सरोवर भी है तब कन्या बोली कि राजन आप ऐसी बात ना करें मैं ऐसे ही आप लोगों को धोखा नहीं देने वाली हूं, मैं आपकी वीरता से आपकी अनुचरी (दासी) हो गई हूं अतः आपको मेरी प्रार्थना आस्वीकार नहीं करना चाहिए ऐसा आग्रह सुनकर राजा मान गया और प्रभा मंडल के निकट जा पहुंचा तब कन्या उन्हें खुले दरवाजे से अंदर लेकर गयीं वह सचमुच एक विलक्षण नगर था जो स्वर्ग से बना हुआ था कन्या उन्हें एक कक्ष में ले गई और सिंहासन पर बैठाया और बोली कि मैं असुरराज कालनेमि की पुत्री हूं मेरे पिता को भगवान विष्णु ने मारा था यहां बुढ़ापा मृत्यु की बाधा नहीं बनती और सभी मनोकामना अपने आप ही पूरी हो जाती है फिर उस कन्या ने राजा चंद्रसेन से प्रार्थना की कि अब आप ही मेरे पिता है इन दोनों नगरों के साथ मैं भी आपके अधीन हूं अतः मेरी प्रार्थना स्वीकार करके मुझे अनुग्रहित करें,
 इस प्रकार जब कन्या ने सब कुछ राजा को सौंप दिया तब राजा कन्या से बोले कि बेटी यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हें सत्वशील के साथ विवाह बंधन में बांधा हूं यह मेरा मित्र भी है और संबंधी भी, सत्वशील के साथ विवाह कर लिया और विदाई के समय राजा सत्वशील से बोला मित्र मैंने तुम्हारे दो आंवले खाए थे एक का ऋण तो मैंने चुका दिया एक का अभी बाकी रहता है फिर असुरकन्या से बोला की पुत्री अब मुझे तुम मार्ग दिखाओ मैं अपने नगर वापस जाना चाहता हूं तब कन्या ने राजा को अपराजित नामक खड़ग और ऐसा फल दिया जिससे राजा को ना तो बुढ़ापा आये और ना ही मृत्यु का भय सताए उन दोनों चीजों के साथ कन्या के बताए सरोवर में डुबकी लगाकर राजा अपने प्रदेश वापस लौट आया,
यह कथा कहकर बेताल बोला कि राजन अब यह बताओ कि समुद्र में डुबकी लगाने में उन दोनों में किसमें अधिक साहस लगाया यदि जानते हुए भी नहीं बताया तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है,

तब राजा बोला कि है बेताल उन दोनों में सत्यशील ही अधिक साहसी था क्योंकि सत्य ना जानते हुए भी वह बिना स्वार्थ के समुद्र में कूद पड़ा जबकि राजा चंद्रसेन को सब बातें पहले ही पता थी और असुर कन्या का भी पता था यह भी जानता था कि वह चाहकर भी कन्या को नहीं पा सकता यह सुनकर बेताल बोला कि राजन आपने उत्तर तो बिल्कुल सही दिया लेकिन मौन व्रत तोड़ दिया यह कहकर वह बेताल फिर उसी पेड़ पर लटका जहां से राजा विक्रमादित्य ने उसे उतारा था II

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