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पाँचवी बेताल कथा- सोमप्रभा की कहानी

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नमस्कार दोस्तों
                 राजा ने फिर उस शव को से उतारा और शांत मन से आप के रास्ते चल पड़ा, लेकिन आदत से मजबूर बेताल फिर बोला कि " राजन त निःस्वार्थ इतना कष्टदायी कार्य कर रहे हो , इसलिए तुम मेरे भी प्रिय हो गए हो, इसलिए यह कहानी सुनो,
      उज्जयिनी नगर में हरिस्वामी नामक ब्राम्हण रहता था, वह राजा पुष्यसेन का प्रिय सेवक और मंत्री था, उसकी दो संताने थीं, बड़ा पुत्र देवस्वामी तथा छोटी पुत्री सोमप्रभा, सोमप्रभा अत्यंत सुंदर थी, जब सोमप्रभा के विवाह का समय आया तो सोमप्रभा अपने पिता से बोली कि " पिताजी यदि आप मेरे विवाह के इक्छुक है तो आप मेरा विवाह किसी वीरपुरुष, ज्ञानी पुरुष, या किसी अलौकिक शक्तियों के स्वामी से ही करना, अन्यथा आप मेरे विवाह की इच्छा त्याग दें, यह सुनकर हरिस्वामी उसी के अनुसार वर ढूंढने लगा, लेकिन उसी समय राजा ने हरिस्वामी को दूत बनाकर संधि के लिए दक्षिण के राजा के पास भेजा, क्योकि वह राजा से युद्ध की तैयारी कर रहा था,

जब हरिस्वामी ने वहां जाकर अपना कार्य सम्पन्न कर लिया, तो उसके पास एक ब्राम्हण आया, उसने हरिस्वामी की रूपवती कन्या के बारे में सुन रखा था, अतः उसने हरिस्वामी से उसकी कन्या मांग ली, लेकिन हरिस्वामी बोला कि " मेरी पुत्री किसी वीरपुरुष, ज्ञानीपुरुष, या अलौकिक शक्तियों के स्वामी को ही अपना वर चुनेंगी, अब आप ही बताएं आपमे इनमे से कौन सी विशेषता है, वह ब्राम्हण बोला कि " हे ब्राम्हण श्रेष्ठ मैं अलौकिक विद्याओं को जानने वाला हूँ, तब हरिस्वामी ने उसे कुछ चमत्कार दिखाने को कहा, और उस ब्राम्हण ने तुरंत आकाशगामी रथ तैयार कर दिया और हरिस्वामी को बैठाकर स्वर्गलोक दिख लाया, इसके बाद संतुष्ट हरिस्वामी को दक्षिण के राजा के पास छोड़ दिया, जहाँ वह कुछ कम से आया हुआ था, तब हरिस्वामी ने उस अलौकिक विद्या जानने वाले से अपनी कन्या का विवाह करने का वचन दे दिया, और सातवें दिन विवाह की तिथि रखी गयी,
उसी समय एक दूसरे ब्राम्हण ने हरिस्वामी के पुत्र देवस्वामी से आकर उसकी बहन से विवाह को बात की, और जब देवस्वामी ने अपनी बहन की शर्त बताई तो वह ब्राम्हण अपने अस्त्र शस्त्र का प्रदर्शन करने लगा,जिसे देखकर देवस्वामी ने अपनी बहन का विवाह उसी ब्राम्हण से करने का निश्चय कर लिया और माता पिता की अनुपस्थिति में ज्योतिषाचार्य के कहे अनुसार सातवें दिन विवाह का दिन निश्चित किया, उसी समय सोमप्रभा की माता से तीसरे ब्राम्हण ने खुद को ज्ञानी बताकर उसकी पुत्री से विवाह की याचना की, और अपने ज्ञानी होने का प्रमाण भी दिया, जिससे प्रभावित होकर सोमप्रभा की माता ने भी सातवें दिन विवाह का वचन दे दिया,

अब अगले दिन हरिस्वामी वापस अपने घर पहुंचा, और अपनी पत्नी तथा बेटे से सोमप्रभा के विवाह की बात बताई, इस उन दोनों ने भी बताया कि कैसे उन्होंने ने भी सोमप्रभा के विवाह का वचन दिया हुआ है, तथा वें भी वीर और ज्ञानी है, यह सुनकर हरिस्वामी परेशान हो गया कि मेरी एक पुत्री तीन पुरुषों से कैसे विवाह करेगी, आखिर जैसे तैसे सात दिन बीते, और सातवें दिन वें तीनों ब्राम्हण युवक हरिस्वामी के यहां विवाह के उद्देश्य से आये, लेकिन उसी समय एक विचित्र घटना हो गयी, ब्राम्हण की कन्या सोमप्रभा अचानक ही कहीं गायब हो गयी, और जब बहुत ढूढने पर भी जब नही मिली, तो हरिस्वामी भागता हुआ, ज्ञानी ब्राम्हण के पास गया और बोला की " है ज्ञानी आप जल्दी बताइये मेरी कन्या सोमप्रभा कहाँ है,
यह सुनकर ज्ञानी पुरुष ने ध्यान लगाकर बताया कि " तुम्हारी कन्या को धूमसिख नामक राक्षस उठाकर विंध्याचल वन में स्थित अपने घर ले गया है, जब ज्ञानी ने ऐसा बताया तो हरिस्वामी दुखी हो गया और रोते हुए कहने लगा कि अब मेरी पुत्री का क्या होगा, अब उसका विवाह कैसे होगा, तब अलौकिक शक्तियों वाले ब्राम्हण ने कहा कि " आप चिंता मत करे ज्ञानी के कहे अनुसार मैं अभी आपको उसके पास ले चलता हूँ, यह कहकर तुरंत उसने शस्त्रों से सजा एक यान बनाया, और हरिस्वामी , ज्ञानी पुरुष और वीर पुरुष को चढ़ाकर विंध्याचल वन ले गया जहां ज्ञानी ने राक्षस का मकान बताया था, जब राक्षस को यह बात पता चली तो वह क्रोधित लाल आंखों के साथ गरजता हुवा अपने मकान से बाहर आया,

तब हरिस्वामी कहने पर वीर पुरुष ने उस राक्षस के साथ युद्ध किया, तथा तरह तरह के अस्त्रों शस्त्रों से लड़ा गया यह युद्ध बड़ा ही आश्चर्यजनक था, लेकिन थोड़ी ही देर में उस वीर युवक ने उस राक्षस का खात्मा कर दिया, और राक्षस के मारे जाने पर वें सभी अलौकिक विद्या को जानने वाले के रथ में बैठकर वापस आ गए, हरिस्वामी के घर पहुचते ही तीनो युवकों में झगड़ा उत्पन्न हो गया, ज्ञानी ने कहा कि " यदि मैं न बताता की सोमप्रभा को कहा छिपकर रखा है तो उसका पता कैसे चलता, इसलिए सोमप्रभा का विवाह मेरे साथ होना चाहिए, यह सुनकर वीर युवक बोला कि " यदि मैन उस राक्षस के साथ युद्ध करके उसे न मारा होता तो आप लोंगो के लाख प्रयत्न करने पर भी सोमप्रभा वापस नही आती, इसलिए इस कन्या पर मेरा अधिकार है, यह कन्या मुझे मिलनी चाहिए, इस प्रकार से झगड़ते देख हरि स्वामी अपना सिर पकड़कर बैठ गया,
 इतनी कथा सुनाकर बेताल बोला कि " राजन अब तुम हो बताओ की, वह कन्या किसको मिलनी चाहिये, ज्ञानी युवक को, अलौकिक विद्या वाले युवक को, या फिर वीर युवक को, यदि जानबूझकर उत्तर नही बताया, तुम्हारा सिर फट जाएगा,

तब मौन तोड़ते हुए राजा बोला, है बेताल वह कन्या अवश्य ही वीर पुरुष को मिलनी चाहिए, क्योकि उसने अपने बाहुबल से उस राक्षस को मारा, विधाता ने ज्ञानी युवक और अलौकिक विद्या वाले युवक को तो सिर्फ उस कार्य के लिए माध्यम बनाया था, राजा के मौन तोड़ते ही बेताल फिर वापस उसी पेड़ पर लटक गया, और राजा फिर उसी पेड़ के पास उसे वापस लेने पहुंच गया,

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी जरूर बताएं धन्यवाद

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