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छठवीं बेताल कथा, मनसुन्दरी की कहानी..?

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बैताल पच्चीसी 
नमस्कार दोस्तों :-
              राजा विक्रमादित्य ने फिर बेताल को पेड़ से उतारा और अपने रास्ते चल पड़े, लेकिन फिर बेताल बोला कि " राजन तुम बहुत वीर और बहादुर हो, इसलियें मुझे बहुत प्रिय हो, अतः तुम्हारे रास्ते का भय खत्म करने के लिए एक और कथा सुनता हूँ सुनो :-
           
यशकेतू नामक राजा शोभानगरी पर राज करता था, और राज्य की राजधानी में देवी गौरा का एक भव्य मंदिर था, जिसके दक्षिण की तरफ एक गौरी तीर्थ नाम का सरोवर (तालाब) था, वहां हर वर्ष आषाढ़ की शुक्ल चतुर्दशी को मेला लगता था, एक बार ब्रम्हस्थल गांव का धवल नाम का धोबी युवक वहाँ स्नान करने गया, और उसी तीर्थ पर स्नान करने आई हुई शुद्धपट कि पुत्री मदनसुन्दरी को देखकर उसपर मोहित हो गया, तथा घर पंहुचकर वह बेचैन रहने लगा, और खाना पानी भी छोड़ दिया,

 जब उसकी माता ने कारण पूछा तो उसने अपने मन की बात बतायी, तो उसके पिता ने कहा कि " पुत्र तुम दुखी मत हो, शुद्धपट मुझे जनता है वह अपनी कन्या तुम्हे अवश्य दे देगा, क्योंकि हम कुल में , धन में, और कर्म में उसी के समान है, इस तरह खाने पीने के लिए उसे राजी कर लिया, और अगले दिन पिता धवल को लेकर शुद्धपट के पास गए, और शुद्धपट से उसकी कन्या मांगी, शुद्धपट ने भी कन्या उन्हें देने का वचन दे दिया, और अगले दिन शुभ मुहूर्त देखकर दोनो का विवाह करवा दिया, ऐसी सुंदरी से विवाह करके धवल अगले दिन अपनी पत्नी और पिता समेत घर वापस आ गया, और दोनों सुखपूर्वक रहने लगे,

कुछ समय बीतने के बाद एक दिन धवल का साला अर्थात मदनसुन्दरी का भाई वहां आया और सभी  से मिलकर अपनी बहन का हाल चाल पूंछा, और बोला कि पिताजी ने मुझे जीजाजी और मदनसुन्दरी को निमंत्रित करने के लिए भेज है, क्योकि कल देवी का पूजन है, घरवालों ने भी उसकी बात मान ली, और अगले दिन धवल अपनी पत्नी और साले के साथ अपनी ससुराल के लिए निकल पड़ा, जब धवल गौरा मंदिर के पास पंहुचा तो बोला कि " चलो हम माता गौरा के दर्शन कर लें, लेकिन साला रोकते हुए बोला कि, " अभी नही पहले हम माता के लिए भेंट ले लें फिर चलेंगे, तब धवल बोला कि " जो माता समस्त जग को देने वाली है उन्हें हम तुच्छ प्राणी क्या देंगे, माता तो केवल श्रद्धा की भूखी है, भेट की नही,

 यह कहकर धवल अकेला ही मंदिर में चल गया, मंदिर में जाकर उसने माता को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और सोचने लगा कि " लोग तरह तरह के जीवों की बलि देकर माता को प्रसन्न करते है, क्यों न मैं सिद्धि के लिए अपनी ही बलि दे दूं, यह सोचकर वह मंदिर के गर्भगृह से एक तलवार लाया, जो किसी भक्त ने माता को अर्पित की थी, और मंदिर के घंटे की जंजीर में अपने बाल बांध दिए, तथा तलवार से अपना सिर काटकर माता को अर्पित कर दिया, गर्दन कटते ही उसका धड़ जमीन पर गिर पड़ा, जब बहुत समय बीत जाने पर भी धवल लौटकर नही आया, तो उसका साला मंदिर में गया, और बहनोई का मस्तक कटा देखकर वह घबरा गया, और उसने अपना भी सिर काट डाला,

इस प्रकार जब वह भी नही लौटकर आया तो मदनसुन्दरी घबरा गई और खुद मंदिर में गयी, और जब मंदिर में उसने अपने भाई और पति का सिर कटा हुआ देखा, तो विलाप करती हुई, जमीन पर गिर पड़ी, कुछ समय बाद उसने सोचा की अब मैं जीवित रहकर क्या करूँगी, अतः वह भी अपने प्राण लेने के लिए देवी की स्तुति करने लगी और बोली कि " हे माँ तुम तो सौभाग्य और सतीत्व की अधिष्ठात्री हो, अर्धनारीश्वर हो, दुखो का नाश करने वाली हो, मैंने तो सदा तुम्हारी भक्ति की है, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया, क्यो मेरे पति और भाई को मुझसे छीन लिया, मैं भी तुम्हरी शरण मे आ रही हूँ, अगले जन्म में मैं चाहे जहां भी जन्म लू, यही मेरे भाई और मेरे पति हों,

यह कहकर देवी को प्रणाम किया और लताओं द्वारा अशोक वृक्ष पर फंदा तैयार और जैसे ही फंदा अपने गले मे डाला, वैसे ही आकाशवाणी हुई कि " ठहर जा बेटी इतनी कम उम्र में तुमने जो साहस दिखाया है, मैं उससे प्रसन्न हूँ, तुम अपने भाई और पति का सिर उनके धड़ से जोड़ दो वें जीवित हो जाएंगे, तुम्हारा कल्याण हो, यह सुनकर मदनसुन्दरी प्रसन्न मन से अपने गले का फंदा हटाया और घबराहट में बिना विचारे उसने अपने पति का सिर भाई के शरीर मे, और भाई का सिर पति के शरीर मे जोड़ दिया, अतः देवी के वरदान से वें दोनो जीवित हो गए, इसके बाद दोनों ने अपनी अपनी कथा सुनाई और प्रसन्न मन से देवी को प्रणाम करके अपने रास्ते चल पड़े, लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद मदनसुन्दरी ने देखा कि उन दोनों के सिर तो बदल गए है, यह देखकर वह घबरा गई, लेेेकिन उसे कुछ समझ नही आ रहा था,

इतनी कथा सुनकर बेताल बोला कि " राजन अब तुम बताओ कि इस तरह दोनो के शरीर बदल जाने से कौन उसका भाई, और कौन उसका पति हुआ, यदि जानते हुए भी तुमने नही बताया तो तुम्हे पहले वाला श्राप लगेगा, तब राजा सोंचते हुए बोले कि " हे बैताल उन दोनों में जिस शरीर पर उसके पति का सिर लगाया है वही उसका पति होगा, क्योकि सिर ही शरीर का मुख्य अंग है, और उसी से मनुष्य की पहचान भी होती है, इस प्रकार उत्तर देने से वह बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा अपनी गलती मानते हुए, फिर उसे वापस लाने उसी पेड़ के पास पहुँचे,

तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी हमे कमेंट में जरूर बताएं, धन्यवाद

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