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गाय के शरीर मे कितने देवी देवता का वास है..?

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गाय माता 
नमस्कार दोस्तों
           हिंदू धर्म में गाय को बहुत ही पवित्र माना जाता है, और आस्था का आधार भी, क्योंकि गाय के शरीर में सभी 33 कोटि देवी देवताओं का वास माना जाता है, जो कि वेद पुराणों में भी वर्णित है, कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी बनाई जाती है, जिसमें गाय को घास खिलाकर पुण्य अर्जित किया जाता है, इस पर्व की शुरूआत तब हुई थी, जब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था, और जब आठवें दिन इंद्र का घमंड टूटा तो उसी दिन से गोपाष्टमी का शुभारंभ हुआ, गाय के किस अंग में किस देवता का वास है, इसका संपूर्ण वर्णन महाभारत के अश्वमेधिकपर्व इस पर्व में किया गया है, जो कुछ इस प्रकार है,

पूर्व काल में ब्रह्मा जी ने उत्तम मंत्रों से हवन अग्निकुंड से कपिला गाय को उत्पन्न किया जो तीन नेत्रों वाली थी, तथा उसका बछड़ा भी उसके साथ था, जिसे देखकर देवता बहुत प्रसन्न हुये, तब ब्रह्माजी बोले कि "हे देवताओं आप लोग भी इस दूध देने वाली गाय पर अनुग्रह करें, यह होम की सिद्धि के लिए प्रकट हुई है, और अपने हविष्य से तीनों अग्नियों को तृप्त करेगी, और जब अग्निदेव स्वयं तृप्त हो जाएंगे, तब आप लोगों को भी तृप्त करेंगे, इस गाय के दूध रूपी अमृत का पान करके तुम सभी देवता दानवों पर विजय पाओगे, तब सभी देवताओं ने गाय को वरदान दिया और वापस चले गए,

तब कपिला गाय के शरीर से नव कपिलायें और प्रकट हुई, वह सभी सब की सब जगत उद्धार के लिए पृथ्वी पर विचरण करने लगी,
दोस्तो जिस समय गाय दान की जाती है, उस समय उनके सींग के ऊपरी भाग में भगवान विष्णु और इंद्र निवास करते हैं, सींगो की जड़ में चंद्रमा और बज्रधारी इंद्र, सींगो के बीच में ब्रह्मा तथा ललाट पर भगवान शंकर का निवास होता है, दोनों कानों में अश्विन कुमार, नेत्रों में चंद्रमा और सूर्य, दातों में मरुद्गण, जीभ पर सरस्वती, रोमकूपों में मुनि, चमड़े में प्रजापति, चारों पैरों में वेद, नासिका छिद्रों में गंध और सुगंधित पुष्प, नीचे के होंठ में वसुगण, मुख में अग्नि, कक्ष में साध्य देवता, गर्दन में पार्वती, पीठ पर नक्षत्र, कुकुट के स्थान में आकाश, अपान (गुदा) में तीर्थ, मूत्र में साक्षात गंगाजी, गोबर में लक्ष्मी जी, नासिका में जेष्ठादेवी, नितंबों में पितर, पूँछ में भगवती रमा, दोनों पसलियों में विश्वदेव, छाती में शक्ति धारी कार्थिकेय, घुटनों, जांघो और उरुओं पांच वायु, खुरों के मध्य में गंधर्व, खुरों के अग्रभाग में सर्प निवास करते हैं, चारों समुद्र उनके चारों स्तन, पृष्ठ भाग में यमराज, दक्षिणपार्श्व में वरुण और कुबेर, वामपार्श्व में महाबली यक्ष, रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शांति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, प्रिया, कांति, तुष्टि, सन्तति, दिशा और प्रदिशा आदि देवियाँ सदा कपिला गाय की सेवा करती हैं, देवता, पितर, गंधर्व, अप्सराएं, लोक, द्वीप, गंगा आदि नदियां तथा अंगों और यज्ञों सहित संपूर्ण वेद तमाम प्रकार के मंत्रों से गाय की स्तुति करते हैं,

 ब्रम्हा जी ने गाय के दस प्रकार बतायें है जो इस प्रकार है,

1 :- स्वर्णकपिला,  स्वर्ण के समान पिले रंग वाली,
2 :- गौरकपिला,  गौर और पीले रंग वाली,
3 :- आरक्तपिङ्गाक्षी,  कुछ लालिमा लिए हुए पीले नेत्र वाली,
4 :- गलपिंगला,  जिसके गर्दन के बाल कुछ पीले हो,
5 :- बभ्रुवर्णाभा,  जिसका शरीर पीले रंग का हो,
6 :- श्वेतपिंगला,  कुछ सफेदी लिए हुए पीले रोम वाली,
7 :- रक्तपिङ्गाक्षी,  सुर्ख और पीली आँखों वाली,
8 :- खुरपिंगला,  जिसके खुर पीले रंग के हो,
9 :- पाटला,  जिसका हल्का लाल रंग हो,
10 :- पुच्छपिङ्गला,  जिस गाय की पूंछ के बाल पीले रंग के हो,

ये दस प्रकार की गाय बताई गयीं है,  जो सदा मनुष्यों का उध्दार करतीं है,  और सब पापों को नष्ट करतीं है, तो दोस्तों गाय के प्रति आपकी क्या भावना है हमसे जरूर साझा करें,  और आपको यह लेख कैसा लगा हमें कमेंट मे जरूर बतायें, धन्यवाद

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