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नेवला और युधिष्ठिर की कथा

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नमस्कार दोस्तों
                           नेवले और युधिष्ठिर की कथा उस समय की है, जब महाभारत का युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ कराया, लेकिन यज्ञ पूरा होने के बाद एक नेवले ने उस यज्ञ को निरर्थक बता दिया, इस कथा का संपूर्ण वर्णन महाभारत के अश्वमेधिकपर्व में किया गया है जो इस प्रकार है,

जब युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ समाप्त हुआ, तो चारों तरफ उनकी दान वीरता के चर्चे होने लगे, लेकिन तभी वहां एक नेवला आया जिसके शरीर का एक तरफ का भाग सोने का था, और मनुष्य की आवाज में बोला कि " राजाओं तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्र निवासी उच्छवृत्तिधारी ब्राम्हण के शेर भर सत्तू के बराबर भी नहीं है, यह सुनकर सभी ब्राह्मणों को बड़ा आश्चर्य हुआ, और सभी ब्राम्हण नेवले से पूछने लगे कि "तुम कौन हो" तुम्हें कितना शास्त्र ज्ञान है, और किस आधार पर यह बात कह रहे हो, तब नेवले ने हंसकर कहा कि" मैंने जो आप लोगों से कहा है उसका कारण जानने के लिए यह सत्य घटना सुनिए,

एक बार बड़ा भयंकर अकाल पड़ा, उस समय उच्छवृत्तिधारी ब्राम्हण के खेत का सारा अन्न सूख गया तथा ब्राह्मण के पास अन्य का संग्रह ना होने की वजह से वह कई कई दिन भूखे ही रहते, एक दिन वह ब्राम्हण अन्न की खोज में निकला तो उसे शेरभर जौ मिला जिसका उन्होंने सत्तू तैयार कर लिया, और थोड़ा थोड़ा सत्तू बराबर बांट कर खाने बैठे, लेकिन तभी उनके यहां एक ब्राह्मण अतिथि आ पहुंचा, तब ब्राह्मण परिवार ने उस अतिथि का स्वागत सत्कार किया और उस ब्राम्हण ने अतिथि ब्राम्हण को अपने हिस्से का सत्तू खाने को दे दिया, लेकिन उतने से अतिथि ब्राह्मण की भूख शांत नहीं हुई, तब ब्राह्मण की पत्नी बोली " हे नाथ आप अतिथि को मेरे हिस्से का सत्तू भी दे दो, यह सुन ब्राम्हण ने सोचा कि यह खुद भूख से तड़प रही है शरीर पर चमड़ी से ढकी हुई हड्डियों का ढांचा मात्र ही रह गया है इसके हिस्से का सत्तू लेना उचित नहीं होगा, इसलिए उसने अपनी पत्नी से कहा की " कल्याणी जो पुरुष स्त्री की रक्षा करने में असमर्थ है वह संसार में अपयश का भागी होता है और परलोक में जाने के बाद उसे नर्क में गिरना पड़ता है,  तब ब्राह्मणी बोली कि " हे नाथ हम दोनों का धर्म एक ही है, अतः आप मुझ पर प्रसन्न होकर मेरे हिस्से का सत्तू अतिथि को देकर संतुष्ट करें, क्योंकि जैसे आप पीड़ा सह रहे हैं वैसे मैं भी सह लूंगी, पत्नी के कहने पर उसने अतिथि से कहा कि" बुजुर्ग यह सत्तू भी ग्रहण करें,

 अब अतिथि वह सत्तू भी खा गया लेकिन उसे संतोष ना हुआ, यह देख ब्राह्मण की चिंता बढ़ गई तब उसके पुत्र ने कहा कि" पिताजी मेरा सत्तू भी आप अतिथि को दे दीजिए क्योंकि मैं इसी में पुण्य समझता हूं अन्यथा विचार ना करें, तब ब्राह्मण बोला कि" पुत्र मैं जानता हूं कि बच्चों की भूख प्रबल होती है, तो बूढ़ा हूं और तपस्या कर चुका हूं, मुझे मरने का भय नहीं है लेकिन तुम अभी बालक हो इसलिए तुम यह सत्तू खा कर अपने प्राणों की रक्षा करो, पुत्र बोला " पिताजी पुरुष का त्राण करने के कारण ही संतान को पुत्र कहा जाता है, इसके सिवा पुत्र पिता का अपना ही आत्मा माना गया है, अतः आप निशन्देह यह सत्तू अतिथि को दे दीजिए,

ब्राह्मण ने प्रसन्नता पूर्वक वह सत्तू अतिथि को दे दिया, लेकिन वह सत्तू खाने के बाद भी वह संतुष्ट नहीं हुआ, जिससे ब्राह्मण बड़े संकोच में पड़ गया और सोचने लगा कि अब क्या करूँ, तब अपने ससुर को परेशान देख बहू बोली की" पिताजी मेरे हिस्से का सत्तू भी अतिथि देवता को दे दीजिए, यह सुनकर ससुर ने कहा कि " पुत्री भूख से तुम्हारा मन व्याकुल हो गया है, तुम्हें ऐसी अवस्था में देखकर भी मैं कैसे तुम्हारे हिस्से का सत्तू ले सकता हूं, आज अन्न ना मिलने की वजह से तुम्हें उपवास करता कैसे देख सकूंगा,  तब पुत्रवधू बोली की " पिताजी आप तो मेरे देवता के भी देवता है, मेरा शरीर प्राण धर्म सब बड़ों की सेवा के लिए है इसी से मुझे उत्तम लोग की प्राप्ति होगी, इसलिए मेरा यह सत्तू स्वीकार करें, यह सुनकर ब्राह्मण ने अपनी बहू के हिस्से का सत्तू भी अतिथि को परोस दिया, ब्राम्हण तथा उसके परिवार का अद्भुत त्याग देखकर वह अतिथि बहुत प्रसन्न हुआ,

वास्तव में वह अतिथि रूप में धर्म राज थे उन्होंने ब्राह्मण से कहा " तुमने शेरभर सत्तू का दान करके अक्षय ब्रह्मलोक पर विजय पाई है, बहुत से अश्वमेघ यज्ञ भी तुम्हारे दान की समानता नहीं कर सकते, अतः द्विज श्रेष्ठ तुम रजोगुण से रहित ब्रह्मा धाम में सुख पूर्वक पधारो, तुम सभी के लिए दिव्य रथ उपस्थित है, क्योंकि मैं स्वयं धर्म हूँ, तुमने अपने शरीर का उद्धार कर लिया है, संसार में तुम्हारा यह यश सदा ही कायम रहेगा, धर्मराज के ऐसा कहने पर वह सभी विमान पर बैठकर ब्रम्हलोक चले गए,

उनके जाने के बाद मैं अपने बिल से निकला और जहां अतिथि ने भोजन किया था, वहां लोटने लगा उस समय उस सत्तू की गंध सूँघने वहां गिरे हुए जल की कीच से संपर्क होने से मेरा मस्तक सहित आधा शरीर सोने का हो गया, आप लोग ख़ुद देख लीजिये जब मेरा शरीर आधा सोने का हो गया, तो मैं सोचने लगा कि बाकी का आधा शरीर ऐसा ही कैसे किया जाए, इसी उद्देश्य से मै हर यज्ञ अनुष्ठान में भ्रमण करता हूं इस यज्ञ का बहुत शोर सुना था, इसलिए मैं बड़ी आशा से यहां आया था किंतु मेरा शरीर पूरा सोने का नहीं हुआ, इसलिए मैंने हंसकर कहा था कि यह यज्ञ ब्राम्हण के दिए शेरभर सत्तू के बराबर भी नहीं है, क्योंकि शेरभर सत्तू के गिरे हुए कुछ कणों के प्रभाव से मेरा शरीर सोने का हो गया था, और यह महान यज्ञ मुझे वैसा ना बना सका उसके साथ इस यज्ञ की तुलना नहीं हो सकती, यह कहकर वह नेवला गायब हो गया और सभी ब्राह्मण भी अपने घर वापस लौट आए,

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