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भगवान शिव के वाहन नंदी जन्मे थे पसीने से,

नंदी और शिव जी
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नमस्कार दोस्तों
                    नंदी शब्द का संस्कृत में अर्थ होता है प्रसन्नता या आनंद, नंदी भगवान शिव के वाहन कैसे बने या नंदी ने भगवान शिव के गणों में सर्वोच्च स्थान कैसे प्राप्त किया, उनके माता पिता कौन थे, इसके संबंध में दो कथाएं प्रचलित है पहली कथा जनमानस में प्रचलित है और दूसरी कथा का वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में किया गया है,

पहली कथानुसार :-
          प्राचीन काल में महर्षि सिलाद हुई जो बाल ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तपस्वी का जीवन व्यतीत कर रहे थे, एक दिन उनके मन में ख्याल आया कि उन्हें भी अपना वंश बढ़ाना चाहिए, क्योंकि वंश आगे न बढ़ा तो पितरों का क्या होगा, अब दुविधा यह थी कि वह बाल ब्रह्मचारी थे और बिना विवाह के वंश को बढ़ाना असंभव था, इसलिए वह भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे, कुछ वर्षों बाद तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महार्षि शिलाद को दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा, तब महार्षि शिलाद ने कहा की " हे प्रभु यदि आप मुझपर सचमुच प्रसन्न है तो आप मुझे अपने ही समान मृत्युहीन अयोनिज पुत्र प्रदान करें,

तब भगवान शिव बोले की " ठीक है मै ही तुम्हारे अयोनिज पुत्ररूप मे अवतार लूंगा, और अंतर्ध्यान हो गए, उसके कुछ समय बाद ज़ब मुनि शिलाद यज्ञ करने के लिए यञक्षेत्र जोत रहे थे, तो उसी समय उनके पसीने की एक बूँद से एक जटाधारी त्रिशूल लिए हुए पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे देख मुनि बहुत प्रसन्न हुए और उसे अपने आश्रम ले आये, और जातकर्म करके नंदी नाम रखा, पांच वर्ष की अल्पआयु मे ही नंदी सभी वेद शास्त्रों का ज्ञाता हो गया था, उसी के दो वर्ष पश्चात् मुनि शिलाद के आश्रम मे मित्र और वरुण आये, नंदी को देखकर मित्र और वरुण ने मुनि शिलाद को बताया की इस बालक के पास मात्र एक वर्ष का ही जीवन बचा है,

जिसे सुन मुनि शिलाद चिंतित हो गए,  लेकिन ज़ब यह बात नंदी से बताई तो वे हंसाने लगे, और बोले की पिता जी मै महाकाल की कृपा से उत्पन्न हुआ था तो काल मेरा क्या बिगाड़ लेगा, अतः मै शिव आराधना करूँगा और मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करूँगा, यह कहकर सात वर्षीय नंदी वन मे जाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या प्रारम्भ कर दी, कुछ समय बाद शिवजी और माता पार्वती नंदी के सामने प्रगट हुए और वर मांगने के लिए कहा,

लेकिन भगवान शिवजी का अनुपम मुख देखकर नंदी भूल गया की वह किस उद्देश्य हेतु यह तपस्या कर रहा था, और बोला की " हे प्रभु यदि आप सचमुच मुझपर प्रसन्न है तो आप मुझे हमेशा के लिए अपने चरणों मे स्थान प्रदान करें, और अपने साथ रखे,  तब भगवान शिव बोले की " वत्स तुम अजय अमर और अक्षय होकर मेरे गणनायक बनोगे, मेरी कृपा से जन्म मृत्यु जैसे विकार तुम्हे स्पर्श भी नहीं पाएंगे, ऐसा कहकर भगवान शिव ने नंदी को बैल रूप प्रदान किया और वाहन रूप मे नंदी को स्वीकार किया,  नंदी को शक्ति संपन्नता और आक्रामकता का प्रतीक भी माना जाता है, वही शैव परंपरा में नंदी नाथ संप्रदाय का मुख्य गुरु भी नंदी को ही माना गया है,

दूसरी कथानुसार :-
        एक बार भगवान शिव पृथ्वी पर विचरण (टहलना) कर रहे थे, उसी समय सुरभि गाय के बछड़े के मुख से झाग निकल कर भगवान शिव के मस्तक पर जा गिरा, जिस कारण वह कुपित हो गए और ललाट अग्नि की ज्वाला से मानव समस्त गायो को भस्म कर डालेंगे, इस तरह से उन सभी गायों को देखने लगे, रुद्र का वह भयंकर तेज जिन जिन गायों पर पड़ा, उनका रंग अलग अलग प्रकार का हो गया, लेकिन जो गायें वहां से भागकर चंद्रमा की शरण में चली गई, उनका रंग नहीं बदला वह चंद्रमा के समान उज्जवल ही बनी रही,

 तब रूद्र को कुपित देखकर प्रजापति जी वहां आए और बोले कि " प्रभु आपके ऊपर तो अमृत का छींटा पड़ा है, क्योंकि रोहिणी गायों का दूध बच्चों के पीने से जूठा नहीं होता, और वहीं रोहिणी गाय अमृत से उत्पन्न दूध देती है, जैसे वायु अग्नि समुद्र तथा देवताओं का पिया हुआ अमृत जूठ से दोष रहित होता है,वैसे ही बछड़ों को दूध पिलाती गाय भी दूषित नहीं मानी जाती, अर्थात दूध पीते समय बछड़ों के मुंह से गिरा झाग अशुद्ध नहीं माना जाता, यह गाय ही अपने दूध और घी से संपूर्ण जगत का पालन करती हैं, ऐसा कहकर प्रजापति दक्ष ने महादेव को बहुत सारी गाय दी और एक बैल भी भेंट किया, तब जाकर भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ, और प्रसन्न भगवान शिव ने उसी बैल को अपना वाहन बनाया, और उसी के चिन्ह से अपनी ध्वजा सुशोभित की,इसी कारण उनका नाम वृषभ राज भी पड़ा,

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट में जरूर बताएं धन्यवाद

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