Breaking News

सूर्य देव को क्यों मारना चाहते थे मुनि जमदग्नि

www.rahulguru.com
www.rahulguru.com
नमस्कार दोस्तों
                           एक बार जमदग्नि मुनि अपनी प्रिय पत्नी के कहने पर सूर्य देव को अपने धनुष बाण से मारने जा रहे थे, लेकिन ऐसा कौन सा अपराध किया था सूर्य देव ने, इसके लिए मैं आपको महाभारत के अनुशासन पर्व में उल्लेखित एक कथा सुनाता हूं, जो बहुत ही रोचक है,


कथानुसार :-
           एक दिन महार्षि जमदग्नि जी धनुष चलाने की क्रीड़ा कर रहे थे मतलब खेल रहे थे, वह बार-बार धनुष पर बाण चढ़ाते और चला देते, उनकी पत्नी वह बाण ला कर वापस मुनि को देती, इसी प्रकार खेलते खेलते दोपहर हो गई, सूर्य भगवान अपने प्रचंड रूप में थे मानो आग बरसा रहे हों, मुनि ने पुनः धनुष बाण चलाया और चला दिया बाण दूर जा गिरा, महार्षि रेणुका से बोले जाओ और जल्दी उस बाण को लेकर आओ, पति की आज्ञा पाकर रेणुका चल पड़ी भयंकर धूप से उनका सिर गर्म हो गया, और तपी हुई भूमि के कारण उनका पैर जलने लगा, अतः वह एक पेड़ की छाया में जाकर खड़ी हो गई लेकिन मुनि के श्राप के डर से अधिक देर तक ना ठहर सकी, अतः वह जब बाण लेकर वापस आई तो थकान से मुरझाई हुई थी, और पैरों के जलने के कारण काँपती हुई मुनि के पास पहुंची,


तब क्रोधित मुनि ने पूछा कि " रेणुके तुम्हें इतनी देर क्यों लगी, तब रेणुका बोली कि" स्वामी भयंकर धूप के कारण मेरा सिर तप रहा था, पैरों में जलन होने लगी थी, सूर्य के इस प्रचंड तेज में आगे बढ़ने का साहस ना हुआ, इसलिए क्षण भर के लिए पेड़ की छाया में विश्राम करने लगी थी, यही कारण है जो मुझे इतना विलंब हुआ, यह सुनकर मुनि जमदग्नि ने कहा कि" प्रिय जिसने तुम्हें इतना कष्ट पहुंचाया है, उस सूर्य को आज मैं अपने बाणों से मार गिराऊंगा, और जैसे ही महर्षि जमदग्नि ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया, घबराए हुए सूर्य देव ब्राह्मण का वेश बनाकर मुनि के पास आए और बोले कि" है मुनि सूर्यदेव का वध करके आपको क्या लाभ होगा, वह तो आकाश में स्थित होकर वसुंधरा का रस खींचते हैं, और बरसात में पुनः उसे बरसा देते हैं, जिससे अन्न उपजता है, उसी से फल फूल घास पात आदि उत्पन्न होते हैं, यह आप भी जानते हैं कि सूर्य के ना होने से समस्त संसार अंधकारमय हो जाएगा, और भला सूर्य को मार गिराने में आपका क्या लाभ, आप सूर्य को नष्ट करने का संकल्प त्याग दें,

इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी मुनि का क्रोध शांत नहीं हुआ, और बोले कि" सूर्यदेव मैंने अपनी ज्ञान दृष्टि से तुम्हें पहचान लिया था, और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आज मैं तुम्हें अपने बाणों से टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा, यह सुनकर थरथर कांपते हुए सूर्य बोले कि" हे महर्षि आप निश्चित ही मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने में समर्थ है, लेकिन फिर भी अगर मैं आपका अपराधी हूं, तो भी इस समय मैं आपकी शरण में आया हूं, ऐसा समझकर ही मेरी रक्षा करें, यह सुनकर मुनि हस पड़े और सूर्य को अभय दान दिया, तथा बोले कि" हे महात्मा इस समय तुम्हारे द्वारा जो अपराध हुआ है इसका कोई उपाय तो बताओ ", तब सूर्य ने उन्हें एक क्षत्र और चमड़े के बने एक जोड़ी जूते दिए और बोले कि " है मुनि ये क्षत्र आपको मेरी किरणों से बचाएगा, और यह जूता आपके पैरों को जलने से बचाएगा, इस प्रकार सूर्य देव की जान बची,,

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी कमेंट के माध्यम से हमें जरूर बताएं और अच्छी लगी है तो शेयर भी करें और बने रहे हमारे साथ

कोई टिप्पणी नहीं