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अरणी से जन्मे थे महर्षि शुकदेव..?

महार्षि शुकदेव
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नमस्कार दोस्तों
                    महार्षि शुकदेव जी का जन्म बिना माता और पिता के हुआ था,अरणी से जन्मे थे शुकदेव, इन्होने ही राजा परीक्षित को श्रीमद्भगवद सुनाया था, जिसके प्रभाव से राजा ने मृत्यु के भय पर विजय पायी थी, महाभारत ग्रन्थ की माने तो शुकदेव जी बिना माता पिता के जन्मे थे, और अगर जनमानस मे प्रचलित कथा की माने तो कथा कुछ और ही है, मै आपको दोनों कथाओं के बारे मे बताऊंगा, पहली कथा जोकि महाभारत के शांतिपर्व मे उल्लेखित है,

 पहली कथानुसार :-
               एक बार महार्षि व्यास जी ने भगवान शिव की बहुत कठोर तपस्या की जोकि 100 वर्ष तक चली, उस दौरान केवल वायु का भक्षण किया करते थे, उद्देश्य था, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त करना, ज़ब तपस्या के सौ वर्ष बीत गए, तब भगवान शिव ने व्यास जी को दर्शन दिए, और वरदान दिया की तुम जिस प्रकार का पुत्र चाहते हो जल्दी ही प्राप्त होगा, जो भागवत भाव मे रंगा होगा, और उसका यश तीनों लोकों में व्याप्त होगा, अब शिव जी द्वारा वरदान प्राप्त करके व्यास जी आश्रम वापस आ गए,

उसी के कुछ समय पश्चात् ज़ब व्यास जी अग्नि जलाने के लिए अरणिमंथन कर रहे थे, तो उसी समय उनकी नजर घृताची अप्सरा पर पड़ी, जिससे उनका वीर्य अरणी मे गिर पड़ा, उसी वीर्य के अरणी मे गिरने से शुकदेव जी का जन्म हुआ, उसी समय गंगा जी मेरुपर्वत पर आयीं और शुकदेव जी का अपने जल से अभिषेक किया, तथा आकाश से शुकदेव जी के लिए दण्ड और कृष्णमृगचर्म गिरा धारण करने के लिए,

दूसरी कथा के अनुसार :-
               एक बार भगवान शिव माता पार्वती के कहने पर अमरकथा सुनाने को राजी हुए, और शर्त रखी की ज़ब तक वह हुंकारी भरेगीं तभी तक मै अमरकथा सुनाऊंगा, तब इस गुप्त रहस्य को सुनने के लिए माता ने एक गुफा चुनी, ताकि कोई और यह रहस्य न जान पाए, लेकिन कथा सुनते सुनते माता पार्वती को नींद आ गयी, गुफा मे तोते का एक घोंसला भी था, जिसमे तोते का बच्चा भी वह कथा सुन रहा था, कथा सुनकर उस तोते मे भी दिव्य शक्ति आ गयीं, और माता पार्वती की जगह वह तोता हुंकारी भरने लगा, लेकिन ज़ब यह बात भगवान शिव को पता चली, तो भगवान शिव ने तोते को मरने के लिए अपना त्रिशूल छोड़ दिया,

अब वह तोता अपनी जान बचाने के लिए तीनों लोकों मे भागा लेकिन त्रिशूल ने उसका पीछा न छोड़ा,  तब वह तोता भागते भागते व्यास जी के आश्रम मे पंहुचा, और शूक्ष्मरूप धारण करके उनकी पत्नी के मुख के रास्ते उनके गर्भ मे घुस गया, व्यास जी की शरण मे गया देख, शिव जी ने उस तोते को मारने का विचार त्याग दिया, उस गर्भ मे वह तोता 12 वर्ष तक रहा, ज़ब व्यास जी ने तोते को बाहर आने के लिए कहा, तो उसने मना कर दिया यह कहकर की उसे इस सांसारिक मोह माया मे नहीं पड़ना, तब भगवान श्री कृष्ण ने स्यंम आकर उस तोते को आश्वाशन दिया और बोले की " वत्स बाहर आ जाओ मेरी कृपा से तुम पर मोह माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा,

तब वह तोता गर्भ से बाहर निकला, और व्यास जी के पुत्र कहलाये, लेकिन जन्म लेते ही वह तपस्या करने जंगल मे चले गए, व्यास जी ने लाख रोका लेकिन वें नहीं माने, तब व्यास जी ने योजना बनाई और कृष्ण लीला का एक श्लोक तैयार किया, तथा आधा श्लोक शिष्यों को रटाकर जहां शुकदेव जी ध्यान लगाते थे वहाँ भेजा, ज़ब शुकदेव जी ने वह अधूरा श्लोक सुना तो आकर्षण से खींचे अपने पिता के पास आ पहुंचे, तब व्यास जी ने शुकदेव जी को श्रीमद्भगवद के 18000 श्लोकों का ज्ञान दिया, उसी भगवद का ज्ञान शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को दिया, जिसके कारण परीक्षित ने मृत्यु के भय पर विजय पायी,

 कौन सी कहानी आपको ज्यादा सटीक लगी कमेंट मे हमें जरूर बताये, धन्यवाद 

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