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शकुनि के पुत्र और अर्जुन का युद्ध

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नमस्कार दोस्तों
          शकुनी मामा को कौन नहीं जानता इन्हीं को महाभारत का सूत्रधार माना जाता है, क्या आपको पता है कि शकुनी मामा का एक पुत्र भी था, जिसने महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ कराया उस दौरान अर्जुन से युद्ध किया था,

कथानुसार :-
             जब पांडवों ने महाभारत का युद्ध जीतकर राज्य प्राप्त कर लिया, तो युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने की ठानी, तथा अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा गया, अश्वमेघ यज्ञ का यह नियम होता है, कि जो भी योद्धा इस याज्ञिक घोड़े को रोकता है, उसे याज्ञिक राजा के साथ युद्ध करना पड़ता है, इसी क्रम में जब वह याज्ञिक घोड़ा शकुनि के पुत्र गांधार राज के राज्य में पहुँचा, तो गांधार राज ने उस घोड़े को रोक लिया, अब शकुनि का पुत्र समस्त गांधारों में सबसे महान और शक्तिशाली था, अतः वह अपनी सेना सहित अर्जुन का सामना करने के लिए निकल पड़ा,

गांधार राज तथा उसके सैनिक मामा शकुनि के वध से क्रोधित तो थे ही, अतः मन में आक्रोश लिए सभी गांधार सैनिक अर्जुन की सेना पर टूट पड़े, लेकिन अर्जुन ने उन्हें शांतिपूर्वक समझाया और लड़ने से रोका, किन्तु क्रोध से भरे होने के कारण किसी ने अर्जुन की ना सुनी, जब अर्जुन ने देखा कि अब तो युद्ध निश्चित है, तो वह भी धनुष बाण लेकर युद्ध में कूद पड़े, और अपने बाणों की वर्षा से गांधारों का सिर काटने लगे, चारों और गान्धारों का संघार होने लगा, तब शकुनी के पुत्र ने आगे बढ़कर अर्जुन को रोका और अर्जुन तथा शकुनी पुत्र एक दूसरे पर अस्त्र शस्त्रों की बौछार करने लगे,

थोड़ी देर बाद अर्जुन ने शकुनी पुत्र पर अपना एक अर्धचंद्राकार बाण चलाया, और उसके मुकुट को काट डाला, यह देख गांधारों को बड़ा आश्चर्य हुआ, वह समझ गए कि अर्जुन ने जानबूझकर शकुनी पुत्र को जीवित छोड़ा है, यह देखकर शकुनी पुत्र समेत सभी गांधार भाग खड़े हुए, जब यह सूचना गांधार राज की माता को मिली, तो वह भयभीत होकर मंत्रियों को साथ लेकर युद्ध भूमि में अर्जुन के पास गई, और अपने पुत्र को युद्ध करने से रोका तथा अर्जुन से भी युद्ध विराम की विनती की, अर्जुन ने सम्मान सहित शकुनि पुत्र को सांत्वना देते हुए कहा कि " हे महाबाहु जो हुआ उसे भूल जाओ, आखिर हो तो हमारे भाई ही, हमारा आपस का बैर शांत कर देना ही उचित है, आगामी चैत्र की पूर्णिमा को महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ होने वाला है, उसमें आप अपनी माता सहित जरूर पधारें,, यह कहकर अर्जुन फिर उस यज्ञ घोड़े के पीछे पीछे चल पड़े तो,

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