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शेर कैसे बना मां दुर्गा का वाहन..

माँ दुर्गा
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नमस्कार दोस्तों
                   शेर कैसे बना मां दुर्गा का वाहन,  हमारे धर्म में सभी देवी देवताओं का अपना एक अलग ही महत्वपूर्ण स्थान है, साथ में उनसे जुड़े उनके वाहन भी अपना अलग-अलग महत्व रखते हैं, वैसे ही है मां दुर्गा जो कि तेज, शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक मानी गई है, वहीं उनके वाहन शेर को शौर्य और आक्रामकता का प्रतीक माना गया है, और शेर की दहाड़ को माता की ध्वनि का दर्जा दिया गया है, शेर कैसे बना माता की सवारी इससे संबंधित दो कथाओं का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है.. ?

पहली कथा :-
             दोस्तों आप यह तो जानते ही हैं कि माता पार्वती ने भोलेनाथ को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी जो निरंतर कई वर्षों तक चली, अंततः भगवान शिव ने प्रसन्न होकर माता को दर्शन दिए और अपनी पत्नी रूप में स्वीकार किया,  लेकिन माता के कठोर तप के कारण उनका शरीर सांवले रंग का हो गया था, एक बार शिव जी और पार्वती जी कैलाश पर विचरण (टहल) कर रहे थे, तभी मजाक में शिव जी ने माता पार्वती को काली कह दिया,

जिससे रुष्ट होकर माता पार्वती कैलाश पर्वत छोड़कर जंगल में चली गई और फिर से कठोर तप पर प्रारंभ कर दिए, तपस्या के दौरान ही एक भूखा शेर माता पार्वती के पास आया उन्हें खाने के उद्देश्य से, लेकिन माता को तपस्या में लीन देखकर और माता के प्रभाव से वह चुपचाप वहां बैठ गया, अब माता पार्वती ने ठान लिया था कि वह जब तक गोरी नहीं हो जाएगीं तब तक तपस्या ऐसे ही जारी रखेंगी, वह शेर भी माता के पास कई सालों तक बैठा रहा,

कई वर्षों बाद तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने माता को दर्शन दिए तथा गौर वर्ण का वरदान देकर माता को नदी में स्नान करने के लिए कह कर अदृश्य हो गए, तब माता ने नदी में स्नान करके गौर वर्ण प्राप्त किया, अर्थात गोरी हो गई, और देवी गौरा कहलाईं, जब माता को उस शेर के बारे में पता चला जिसमें माता के साथ बैठकर कई वर्ष बिताए थे, तब माता ने प्रसन्न होकर उस शेर को अपना वाहन बना लिया,

दूसरी कथा :-
              दूसरी कथा का वर्णन स्कंद पुराण में किया गया है जिसमें बताया गया है, कि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने देवासुर संग्राम में दानव तारक और उनके दो भाई सिंहमुखम और सुरापदमन से घोर युद्ध किया, जिसमें उन दानवों की हार हुई तब सिंहमुखम ने कार्तिके से माफी मांगी और प्राण दान मांगा, जिससे प्रसन्न होकर कार्तिकेय ने उसे शेर का स्वरूप प्रदान किया और माता दुर्गा का वाहन बनने का आशीर्वाद भी दिया,

दोस्तों कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके बताएं और कमेंट में " जय माता दी " लिखना ना भूलें,   धन्यवाद

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