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नारायण की जांघ से उत्पन्न हुईं थी यह अप्सरा

अप्सरा उर्वशी
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नमस्कार दोस्तों
          आपने पुराणों में तमाम ऐसी कथाएं सुनी होंगी जिनमें स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का वर्णन आता है, जिनका उपयोग करके देवराज इंद्र ने पता नहीं कितने तपस्वियों की तपस्या भंग करवाई और उनकी कामवासना जागृत करके गृहस्थ जीवन में लिप्त करवा दिया, माना जाता है कि स्वर्ग की अप्सराओं का यवन कभी नहीं ढलता, मतलब वह कभी बूढी नहीं होती उनका सौंदर्य कभी फीका नहीं पड़ता, वहीं अप्सराएं स्वर्ग में उपस्थित सभी देवताओं और ऋषियों के मनोरंजन का साधन भी है, उन तमाम अप्सराओं में सबसे अधिक खूबसूरत अप्सरा का दर्जा उर्वशी को प्राप्त है, लेकिन क्या आप जानते हैं की अप्सरा उर्वशी का जन्म भी बिना माता के हुआ था,

कथानुसार :-
                  परमपिता ब्रह्मा के हृदय से महाराज धर्म का जन्म हुआ, और महाराज धर्म से नर और नारायण रूप में भगवान विष्णु ने जन्म लिया, जन्म के कुछ वर्ष पश्चात ही नर और नारायण तपस्या करने के लिए गंधमादन पर्वत पर गए जहां उन्होंने घोर तपस्या प्रारंभ कर दी जो कई वर्षों तक चलती रही, दूसरी तरफ उस घोर तपस्या को देखकर देवराज इंद्र डर गए, उन्होंने सोचा कि नर और नारायण स्वर्ग का सिंहासन प्राप्त करने के लिए ही यह घोर तपस्या कर रहे हैं, अतः उन्होंने स्वर्ग की सभी सुंदर अप्सराओं को बुलाया और आदेश दिया कि जाओ और अपने इस सुंदर यौवन के प्रदर्शन से नर और नारायण में कामवासना उत्पन्न करके उनका यह घोर तप नष्ट कर दो,

तब वह सभी अप्सराएं नर और नारायण जहां तपस्या कर रहे थे वहां गई और तमाम प्रकार के नृत्य और अपने यौवन के प्रदर्शन से नर नारायण की तपस्या भंग करनी चाही, नर और नारायण ने भी उनके तमाम प्रदर्शनों को देखा, लेकिन फिर भी उनके मन में तनिक भी विकार उत्पन्न ना हुआ, जब सभी अप्सराओं के प्रयास विफल हो गए तब नारायण ने अपनी दायीं जंघा के उरु भाग(ऊपरी भाग) से एक अप्सरा उत्पन्न की, अतः दायीं जंघा के उरु भाग से उत्पन्न होने के कारण नारायण ने उसे उर्वशी कहकर पुकारा,

और इंद्र द्वारा भेजी गयीं अप्सराओं से बोले की " हे कन्याओं स्वर्ग के सुख का तनिक भी लालच हमारे मन मे नहीं है, क्योंकि स्वर्ग के सारे सुख मेरी जंघाओं के नीचे ही छिपे हुए है, स्वर्ग के सारे सुख नश्वर हैँ आज है कल नहीं, जैसे इंद्र के पद पर हमेशा एक ही इंद्र नहीं रहता, उसी प्रकार वहाँ के सुख क्षणभंगुरी हैँ, हम लोग जिस आनंद के सहारे यहाँ बैठे है, उसका पता इंद्र को कैसे लग सकता है, इसलिए मेरी दायीं जंघा से उत्पन्न इस उर्वशी नामक अप्सरा को अपने साथ ले जाओ, और इंद्र से कहना कि यह मेरी तरफ से उनके लिए भेंट है,  

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