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देवताओं के अस्त्रों को पी गए मनी दधीचि

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नमस्कार दोस्तों
                   मुनि दधीचि को कौन नहीं जानता जिन्होंने अपने शरीर का त्याग करके देवताओं और तीनों लोकों की रक्षा की, जिनकी हड्डी से बज्र बनवा कर इंद्र ने वृत्रासुर नामक दैत्य का वध किया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक बार महर्षि दधीचि ने सभी देवताओं के अस्त्रों और शास्त्रों को पी लिया था जिसका वर्णन ब्रह्म पुराण में किया गया है,

कथानुसार :- एक बार महर्षि दधीचि के आश्रम में यमराज और इंद्र सहित सभी देवतागण आते हैं, वह दैत्यों और असुरों को परास्त करके वहां आए थे जिस कारण सभी देवता बहुत प्रसन्न थे, मुनि दधीचि ने भी सभी देवताओं का उचित आदर सत्कार किया और आश्रम में आने का कारण पूछा, तब सभी देवता बोले कि मुनिवर हमने सभी बड़े राक्षसों और दैत्यों को जीत लिया है अब हमें उनसे किसी भी प्रकार का भय नहीं है हम बहुत सुखी है, अतः हमें अपने अस्त्र-शस्त्र रखने का कोई लाभ दिखाई नहीं देता हम इन अस्त्रों का बोझ भी नहीं ढो सकते, हम इन अस्त्रों को जब स्वर्ग में रखते हैं तो दैत्य इनका पता लगाकर चुरा ले जाते हैं इसलिए हम इन अस्त्रों को आप के पवित्र आश्रम में रख देते हैं,

यहां दानवों और राक्षसों से थोड़ा भी भय नहीं है आपके जप और तप से यह सारा प्रदेश पवित्र और सुरक्षित है और तपस्या में आप की समानता करने वाला भी कोई नहीं है, तब मुनि दधीचि ने कहा कि ठीक है जैसा आप सब उचित समझे, लेकिन तभी मुनि की पत्नी बोली कि" इसमें आपको पडने की क्या आवश्यकता है यदि आपने इन अस्त्रों को आश्रम में स्थान दे दिया तो इन देवताओं के शत्रु भी आपसे ईर्ष्या रखेंगे, और यदि कोई अस्त्र शास्त्र चोरी या नष्ट हो गया तो यह देवता भी आप पर कुपित हो जाएंगे अतः आपका यह कार्य मुझे उचित नहीं लगता, पत्नी की बात सुनकर दधीचि मुनि बोले कि" मैं देवताओं की प्रार्थना पर पहले ही हां कर चुका हूं इसलिए वचन देकर विमुख होना महापाप है,

यह सुनकर सभी देवताओं ने अपने तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र मुनि के आश्रम में रख दिए और अपने अपने लोक वापस चले गए, देवताओं के जाने के बाद मुनि दधीचि अपनी पत्नी के साथ आश्रम में रहकर तपस्या करने लगे, इस प्रकार 1000 दिव्य वर्ष बीत गए लेकिन कोई भी देवताओं अपने अस्त्र शस्त्र वापस लेने नहीं आया, तब मुनि दधीचि बोले कि" देवी देवता अपने अस्त्र-शस्त्र यहां से ले जाना ही नहीं चाहते और दैत्य मुझसे ईर्ष्या करते हैं अब तुम ही बताओ क्या करना चाहिए, तब मुनि की पत्नी बोली की स्वामी मैंने तो पहले ही कहा था, की यह कार्य उचित नहीं है अब आपको जो उचित लगे वह करें,

क्योंकि दैत्यों के जो बड़े बड़े वीर और तपस्वी योद्धा हैं निश्चित ही आज नहीं तो कल इसे हड़प लेंगे, तब दधीचि मुनि ने उन अस्त्रों की रक्षा के लिए पवित्र मंत्र पढ़ते हुए उन अस्त्रों को जल से नहलाया, फिर सर्वस्त्रमय परम पवित्र और तेज युक्त जल को स्वयं पी गए तेज निकल जाने से वें सभी अस्त्र सस्त्र तेज हीन और शक्ति हीन हो गए और समय अनुसार एक एक करके अपने आप ही नष्ट हो गए यही, यही कारण था जिसके लिए महर्षि दधीचि की हड्डियों की जरूरत पड़ी वृत्रासुर का वध करने के लिए, 

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