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महार्षि दुर्वासा को सुदर्शन चक्र क्यों मरना चाहता था..?

क्यों भागे ऋषि दुर्वासा
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नमस्कार दोस्तों
              भारतीय वेद पुराणों में तमाम ऐसे ऋषि-मुनियों का उल्लेख मिलता है जो अपने तपोबल की शक्ति से किसी को भी संपन्न या भस्म कर सकते थे, ऐसे ही एक मुनि हुए महर्षि दुर्वासा जो कि भगवान शिव के अवतार माने गए भगवान शिव जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं, दुर्वासा मुनि उससे दोगुनी गति से क्रोधित होते थे, छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित होना उनका स्वभाव बन गया था छोटी-छोटी बातों पर वें श्राप दे दिया करते थे, लेकिन क्रोध से हर बार दूसरे का ही नुकसान हो जरूरी नहीं है और यही हुआ मुनि दुर्वासा के साथ, जब उनका क्रोध उन्हीं पर भारी पड़ गया और बात जान पर बन आई, सुदर्शन चक्र उन्हें मारने के लिए उनके पीछे पड़ गया, आइए जानते हैं इस कथा के बारे में विस्तार से.. ?

कथानुसार :-
           प्राचीन काल में राजा अंबरीष हुये जोकि बहुत ही न्याय प्रिय थे, समस्त प्रजा को अपनी संतान समझकर उनका पालन पोषण किया करते थे, उनके शासनकाल में चारों तरफ खुशहाली थी प्रजा भी उन्हें बहुत प्रेम करती थी, राजा अंबरीष भगवान विष्णु के परम भक्त थे और काम क्रोध लोभ आदि से दूर रहकर भक्ति भाव से जीवन व्यतीत किया करते थे, क्योंकि वें मानते थे कि एक दिन समस्त सांसारिक वस्तु का नाश तय हैं मरने के बाद भक्ति तपस्या ही उनके साथ जाएगी, अपने भक्त की श्रद्धा भक्ति और त्याग को देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने भक्त अंबरीश की रक्षा के लिए उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र को तैनात कर दिया,

उसी के कुछ समय पश्चात राजा अंबरीष ने एक वर्ष तक द्वादशी व्रत रखने का प्रण लिया और प्रत्येक द्वादशी को व्रत रखना और दान पुण्य करना नियम बना लिया शाम को अन्न जल ग्रहण करके व्रत पूर्ण करते थे ऐसे ही विधि विधान से वें हर द्वादशी व्रत पूरा करने लगे जब वर्ष की अंतिम द्वादशी आई तो पूरे विधि विधान से पूजा-पाठ दान पुण्य कर के राजा अंबरीष ने पुरोहित से व्रत पूर्ण करने की आज्ञा मांगी लेकिन जैसे ही राजा भोजन के लिए बैठे वैसे ही महर्षि दुर्वासा वहां आ पहुंचे राजा ने भोजन छोड़कर मुनि दुर्वासा का आदर सत्कार किया और उनसे भी भोजन करने का आग्रह किया,

तब दुर्वासा मुनि बोले कि ठीक है राजन परंतु मैं पहले नदी में स्नान करना चाहता हूं उसके पश्चात भोजन ग्रहण कर लूंगा इतना कहकर वें स्नान करने चले गए लेकिन स्नान और ध्यान करने में इतने लीन हो गए कि वें भूल गए कि राजा अंबरीष का व्रत मेरे भोजन ना करने से रुका हुआ है उधर द्वादशी तिथि समाप्त हो रही थी यदि उसी दिन व्रत का पारण ना होता तो अंबरीश का व्रत खंडित हो जाता  समय भी बहुत कम रह गया था तभी पुरोहितों ने सलाह दी कि राजा आप अपने व्रत का पारण जल पीकर ही कर दे व्रत भी पूरा हो जाएगा और ऋषि से पहले भोजन करने का दोष भी नहीं लगेगा यह सलाह राजा को उचित लगी,

लेकिन वें जल पी ही रहे थे तभी वहां मुनि दुर्वासा पहुंचे और जल पीते हुये राजा को देखकर वह क्रोधित हो गए उन्हें लगा कि राजा ने मुझे भोजन कराए बिना ही अपना व्रत तोड़ दिया, यही सोच कर वह राजा अंबरीष को श्राप देने के लिए तैयार हो गए लेकिन तभी अमरीश बोले कि हे महात्मा द्वादशी तिथि समाप्त हो रही थी पूरे वर्ष का व्रत खंडित ना हो जाए यही सोच कर मैंने व्रत का जल पीकर पारण किया इसके अलावा मैंने अभी तक कुछ भी ग्रहण नहीं किया है लेकिन मुनि दुर्वासा कहां मानने वाले उन्होंने अपनी जटा का एक बाल उखाड़ा और धरती पर फेंकते हुए बोले की दुष्ट मुझे भोजन कराए बगैर तूने व्रत का पारण किया मेरा अनादर किया परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा,

तभी उस फेंके हुए बाल से एक कृत्या उत्पन्न हुई जिसे मुनि दुर्वासा ने आदेश दिया कि इस दुष्ट राजा का भक्षण कर लो, तब वह कृत्या ठहाका मारकर अंबरीश की तरफ खाने के लिए दौडी,  भक्तों को संकट में पड़ा देख विष्णु जी का सुदर्शन चक्र तुरंत वहां प्रकट हुआ, और कृत्या को कई टुकड़ों में काट डाला,  फिर वही चक्र मुनि दुर्वासा के तरफ दौड़ा,  अब सुदर्शन चक्र को अपनी ओर आते देख मुनि दुर्वासा घबरा गए और वहां से भागे लेकिन चक्र ने उनका पीछा नहीं छोड़ा, थक हारकर मुनि दुर्वासा ब्रह्मा जी की शरण में गए और ब्रह्मा जी से सुदर्शन चक्र से रक्षा करने की बात कही,

लेकिन ब्रह्मा जी बोले कि "वत्स मैं तो सृष्टि की रचना करता हूं मृत्यु का कार्य मेरे हाथ में नहीं है, आप महाकाल की शरण में जाएं अब वही आपकी मदद कर सकते हैं, अब ब्रह्मलोक से भागते हुए दुर्वासा भगवान भोलेनाथ के पास गए और अपनी सारी व्यथा सुनाई,  जिसे सुनकर भोलेनाथ मुस्कुराए और बोले कि "वत्स क्रोध में आकर हमेशा अपना तपोबल नष्ट करते हो इसलिए इस चक्र से बचाना मेरे हाथ में नहीं है, अब तुम उन्हीं के पास जाओ जिनका सुदर्शन चक्र है,  जब मुनि दुर्वासा ने यह बात सुनी तो उनकी हालत और भी खराब वहां से भी भागे और हाँफते हुए भगवान नारायण के पास पहुंचे,  चक्र वहां भी पीछा करते हुए पहुंच गया,

दुर्वासा भगवान विष्णु से बोले कि" हे प्रभु इस सुदर्शन चक्र से मेरी रक्षा करें अन्यथा है यहां मेरे प्राण ले लेगा,  तब श्री हरि विष्णु बोले कि "दुर्वासा तुम्हारे अकारण क्रोध और श्राप के कारण तुम्हारी सारी तपो शक्ति नष्ट हो गई,  एक ऋषि का क्षमा और शील ही सबसे बड़ा धर्म होता है,  थोड़ी अपनी बुद्धि से सोचो जिस भूल के लिए तुमने राजा अंबरीष को श्राप दिया,  वह भूल तो उसने की ही नहीं, इस चक्र को मैंने ही राजा अंबरीष की सुरक्षा के लिए लगाया था, अतः जब बिना किसी बात के राजा अंबरीष पर संकट आया तो यहां सक्रिय हो गया, अब तो एक ही उपाय शेष है तुम उनकी ही शरण में जाओ जिन की सुरक्षा के लिए यह चक्र तुम्हें मारना चाहता है,

ज़ब भगवान विष्णु ने हाथ खड़े कर दिए,  तब मुनि दुर्वासा राजा अंबरीष के पास पहुंचे, राजा अंबरीष अभी तक मुनि दुर्वासा के प्रतीक्षा कर रहे थे भोजन करने के लिए, अतः दुर्वासा को देखते ही अंबरीष बोले " कि हे मुनि श्रेष्ठ आप कहां चले गए मैं आपकी कब से प्रतीक्षा कर रहा हूं, घबराए हुए मुनि दुर्वासा बोले कि "राजन त्रिदेव में से मेरी किसी ने सहायता नहीं की, अब आप ही मेरे प्राणों की रक्षा कर सकते हैं इस सुदर्शन चक्र से, तब राजा अंबरीष बोले कि मुनिवर आप अपना क्रोध शांत करें, आप जैसे ही मुझे क्षमा करोगे यह चक्र भी आपको क्षमा कर देगा, अतः जैसे ही बीती सभी बातों को भूलकर मुनि दुर्वासा ने अपना क्रोध शांत किया, वैसे ही वह चक्र भी अदृश्य हो गया, इस तरह महर्षि दुर्वासा के प्राण बचे l

दोस्तों बड़े बुजुर्गों ने कहा भी है कि क्रोध से बढ़कर मनुष्य का कोई दुश्मन नहीं है अतः परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हो क्रोध मे किये कर्म से पछतावा ही हाथ लगता है, 

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