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क्यों लगा मुनि दधीचि को घोड़े का सिर

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नमस्कार दोस्तों
          यह वही मुनि दधीचि है जिनकी हड्डियों से बज्र बना था, लेकिन क्या आप जानते हैं उस घटना से पहले एक अद्भुत घटना घटित हुई थी जिसमें ऋषि दधीचि का सिर काटकर घोड़े का सिर लगाया गया था, कैसे पुनः लगा मुनि दधीचि जी को मनुष्य का सिर और क्यों लगाया था घोड़े का सिर आइये जानते हैं विस्तार से..

कथानुसार :-
             एक बार दोनों अश्विनकुमार महर्षि दधीचि के आश्रम में आए और ऋषि दधीचि से निवेदन किया कि वह उन्हें ब्रह्म विद्या का ज्ञान प्रदान करें, क्योंकि अश्विन कुमार जानते थे कि महर्षि दधीचि के पास ही शुद्ध ब्रह्म विद्या का ज्ञान है, लेकिन उस समय दधीचि जी ने अश्विनी कुमारों को यह कह कर वापस भेज दिया कि अभी उनके पास समय नहीं है, तब दोनों अश्विन कुमार वापस लौट आये, लेकिन जब इस घटना का ज्ञान देवराज इंद्र को हुआ तो वें सीधा महर्षि दधीचि के पास गए और बोले कि "मुनिश्रेष्ठ अश्विनकुमार देववैद्य है इसलिए आप उन्हें ब्रम्ह विद्या का ज्ञान नहीं दे सकते, और अगर आपने अश्विनी कुमारों को ब्रह्म विद्या का ज्ञान दिया तो आपका सिर फट जाएगा, यह कहकर देवराज इंद्र स्वर्गलोक वापस आ गए,

उसके कुछ समय पश्चात दोनों अश्विनकुमार मुनि  के पास गए और उनसे ब्रह्म विद्या सीखने की बात कही, तब महर्षि दधीचि ने इंद्र के  श्राप वाली बात अश्विनकुमारों को बताई जिसे सुनकर वें दोनों बहुत परेशान हो गए और सोचने लगे कि यह तो बहुत बड़ी परेशानी है क्योंकि शुद्ध ब्रह्म विद्या का ज्ञान पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ दधीचि मुनि के पास ही है और किसी के पास नहीं, तभी उन्हें एक युक्ति सूझी दोनों अश्विनकुमार बोले कि हे महर्षि हम तो देववैद्य है ही अतः हम पहले ही आपका सिर काटकर उसकी जगह घोड़े का सिर लगा देंगे फिर आप मुझे घोड़े के सिर से ही ब्रह्म विद्या का ज्ञान दीजिएगा और जब इंद्र के श्राप के अनुसार आपका सिर फट जाएगा तो हम फिर से आपका असली सिर जोड़ देंगे,

यह उपाय महर्षि दधीचि को भी ठीक लगा और ब्रह्म विद्या का ज्ञान देने के लिए तैयार हो गए तब दोनों अश्विनी कुमारों ने महर्षि दधीचि का सिर काटकर घोड़े का सिर लगा दिया तब मुनि दधीचि जी ने उसी घोड़े के सिर से दोनों अश्विनी कुमारों को ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया और जैसे ही उपदेश संपन्न हुआ वैसे ही महर्षि दधीचि के अश्व सिर के कई टुकड़े हो गए इसके बाद दोनों अश्विनी कुमारों ने महर्षि दधीचि का असली सिर जोड़ दिया इसलिए महर्षि दधीचि को अश्वसिर भी कहा जाता है इसी प्रकार घोड़े के मुख से उपदेश देने के कारण ब्रह्म विद्या को ब्रह्मशिरा कहा गया है

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