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जब भगवान शिव को श्राप दिया मुनि दुर्वासा ने..

ऋषि दुर्वासा
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नमस्कार दोस्तों
                       आप यह तो जानते ही होंगे कि ऋषि दुर्वासा भगवान शिव के 11 अवतार थे, और मुनि दुर्वासा के क्रोध के बारे में कौन नहीं जानता, लेकिन शायद ही आप यह जानते हो, कि मुनि दुर्वासा ने भगवान शिव को भी श्राप दिया था,

कथानुसार :-
           जब माता सती ने अपने शरीर का त्याग किया तो फिर उन्होंने माता पार्वती के रूप में हिमाचल पुत्री बनकर जन्मी, और भगवान शिव को पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या भी किया, तब पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव विवाह के लिए राजी हुए, तो चारों तरफ खुशहाली छा गई सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए, और भगवान शिव के विवाह की तैयारी जोरों से करने लगे, जब कैलाश पर्वत पर सभी देवता और शिवगण शिवजी के विवाह का उत्सव मना रहे थे,

तभी वहां मुनि दुर्वासा अपनी माता अनुसुइया के साथ आते हैं, जिन्हें देख नारद मुनि ऋषि दुर्वासा से कहते हैं कि " हे मुनिश्रेष्ठ क्या आप अपनी माता को छोड़ कर वापस चले जाएंगे, तब दुर्वासा मुनि कहते हैं कि" क्यों भाई ऐसा क्यों कह रहे हो, मैं भी शिवजी के विवाह में जाने के लिए ही आया हूं, यह सुनकर नारद मुनि सकपकाए और विचार करते हुए बोले कि " मुनि श्रेष्ठ बाकी सब तो ठीक है लेकिन आपको क्रोध जल्दी आता है, जिससे आप श्राप भी दे देते हैं, कहीं इस विवाह के दौरान आपको क्रोध आ गया तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा,

तब मुनि दुर्वासा बोले कि " ऐसा कदापि नहीं होगा क्योंकि मैंने अपनी माता को वचन दिया है, कि ना मैं क्रोध करूंगा, और ना ही किसी को श्राप दूंगा, तभी वहां नंदी जी आए और उनकी माता को अलग कक्ष में ले जाकर ठहराया और मुनि दुर्वासा को लेकर वहां गए जहां शिवजी थे, वहां सभी देवतागण और सभी शिवगण हंसी मजाक, नाच गाना और मौज मस्ती कर रहे थे, मुनि दुर्वासा को देख कर सभी शिव गणों ने मुनि दुर्वासा से भी नाच गाने में सम्मिलित होने की बात कही और हंसी मजाक करने लगे, यह देख मुनि दुर्वासा को लगा कि सभी शिवगण मेरा अपमान कर रहे हैं,

अतः क्रोधित दुर्वासा जी ने माता को दिए वचनों को भूल कर सभी शिवगणों को श्राप दे दिया कि " तुम्हारे इस भयानक रूप को देखकर सभी कन्या पक्ष वाले मूर्छित हो जाएंगे, जब तुम उन के द्वार पर जाओगे, और भगवान शिव को श्राप दिया कि " इस रूप में तुम्हारा विवाह पार्वती के साथ नहीं होगा, जैसे ही उन्होंने श्राप दिया नारद जी बोल पड़े कि " हे मुनि आपने यह कैसा अनर्थ कर दिया, बड़ी मुश्किल से तो शिवजी इस विवाह के लिए तैयार हुए थे, और आपने श्राप देकर घोर अनर्थ कर दिया,  अरे हंसी मजाक तो शिवगणों ने किया था, फिर शिव जी को श्राप देना कितना उचित है, दुर्वासा के श्राप से वहाँ उपस्थित सभी देवता और शिवगण चिंतित हो गए, की अब क्या होगा, क्योंकि बड़ी मुश्किल से तो शिव जी को समाधि से जगाया गया था, अगर शिवजी ने दोबारा समाधि लगा ली तो पता नहीं कितने युगों बाद ध्यान तोड़ेंगे,

नारद जी की बात सुनकर दुर्वासा भी दुखी मन से सोचने लगे, कि यह मैंने कैसा अनर्थ कर दिया, मैंने तो मां को भी वचन दिया था कि मैं क्रोध नहीं करूंगा और ना ही किसी को श्राप दूंगा, अब चारों तरफ सन्नाटा फैल गया की अब क्या होगा, तभी वहां भगवान विष्णु जी आए और बोले कि "मुनिश्रेष्ठ आप तनिक भी शोक ना करें, यह सब विधि के विधान के अनुरूप हुआ है, महादेव और पार्वती का विवाह भी होना भी तय है, अतः जो कुछ हुआ उसे भूल कर विवाह में चलने की तैयारी करें, जब श्री हरि विष्णु ने यह बात कही तब जाकर सभी के चेहरे पर मुस्कान आई और पुनः सभी शिवजी के विवाह की तैयारी में जुट गए,

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