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तीतर, गौरैय्या और पपीहा का जन्म कैसे हुआ,

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दोस्तों नमस्कार
                  तीतर गौरैया और पपीहा की उत्पत्ति कैसे हुई, इस विषय में देवता और दानव से संबंधित एक बहुत ही रोचक कथा है, जिसका संपूर्ण वर्णन श्रीमद् भागवत पुराण के छठे स्कंध के 9 वें अध्याय में किया गया है,

कथानुसार :-
          एक बार त्रिलोकी इंद्र को घमंड हो गया कि मैं ही देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हूं, अतः वें नित्य सदाचार का उल्लंघन करने लगे, एक दिन इंद्र भरी सभा में अपनी पत्नी शशि के साथ बैठे हुए थे, वहां सभी देवता उनकी सेवा में उपस्थित थे तभी वहां देवताओं के आचार्य बृहस्पति जी का आगमन होता है, वहां उपस्थित सभी देवताओं ने बृहस्पति जी को नमस्कार किया लेकिन बृहस्पति को देखते हुए भी इंद्र ने ना ही नमस्कार किया, और ना ही आसन ग्रहण करने के लिए कहा, यह सब देख बृहस्पति जी को समझने में देर ना लगी कि इंद्र पर घमंड हावी हो गया है, अतः बिना कुछ बोले वह वहां से चुपचाप घर चले आए,

बृहस्पति जी के घर आने के बाद इंद्र को एहसास हुआ, कि गुरु बृहस्पति का अनादर करके उन्होंने ठीक नहीं किया चाहे मुझे उनके चरणों में ही क्यों न गिरना पड़े, लेकिन बिना उन्हें मनाए मैं वापस नहीं आऊंगा इधर देवराज इंद्र यह सोच ही रहे थे, कि उधर बृहस्पति जी घर से निकल कर अंतर्ध्यान हो गए, देवराज इंद्र ने उन्हें बहुत ढूंढा पर नहीं मिले, उधर दैत्यों को भी इंद्र और आचार्य बृहस्पति की अनबन का पता चल गया, अतः सभी असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया, तब देवराज इंद्र अपने आप को असुरक्षित समझ कर ब्रह्मा जी की शरण में गए, और सारी बात बताई,

 तब ब्रह्मा जी बोले कि " वत्स सच में तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है तुम्हारे शत्रु भी शुक्राचार्य का अपमान करने के कारण निर्बल हो गए थे, परंतु भक्तिभाव से उनकी आराधना करने पर फिर से में संपन्न हो गए, अतः बिना गुरु कृपा के तुम अपना खोया ऐश्वर्य प्राप्त नहीं कर सकते, इसलिए तुम शीघ्र ही तो त्वेष्टा के पुत्र विश्वरूप के पास जाओ, वें बड़े तपस्वी और संयमी है, और 3 सिर वाले होने के कारण उहे त्रिशरा भी कहा जाता हैं, वें एक मुँह से सोमरस तथा दूसरे मुँह से सुरापान करते हैं तथा तीसरे मुख से अन्न ग्रहण करते हैं उनके पिता 12 आदित्यों में देवता है, इसलिए यज्ञ के समय प्रत्यक्ष रूप में ऊंचे स्वर में बोलकर देवताओं को आहुति देते हैं, लेकिन यदि तुम उनके असुर प्रेम को क्षमा कर सको, तो वह तुम्हारा काम बना सकते हैं,

तब ब्रह्मा जी की सलाह से सभी देवता विश्वरूप के पास आए और बोले कि " हे विश्वरूप हम पर भारी विपत्ति आन पड़ी है हम सभी आप को आचार्य रूप में स्वीकार करते हैं अतः तुम अपने तपोबल से हमारे दुखों का नाश करो, देवताओं की प्रार्थना सुनकर विश्वरूप प्रसन्न होकर बोले कि " हे देवगण पुरोहिती का कार्य ब्रह्मतेज को क्षीण करने वाला है,इसलिए धर्मशील महात्माओं ने इसकी निंदा की है, किंतु आप हमारे स्वामी होकर प्रार्थना कर रहे हैं तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ, मैं आपका मनोरथ तन मन से पूरा करूंगा, तब विश्वरूप ने इंद्र को नारायण कवच दिया और युद्ध में जाने की अनुमति दी,

 तब इंद्र के पास नारायण कवच होने से देवताओं में नए उत्साह का संचार हुआ, वह पूरी शक्ति के साथ युद्ध लड़े और दैत्यों को पराजित किया, तथा विश्वरूप के वैष्णवी विद्या के प्रभाव से देवराज इंद्र का खोया हुआ ऐश्वर्या वापस मिला, विश्वरूप के पिता 12 आदित्य में से एक थे लेकिन उनकी माता राक्षस कुल की थी इसलिए विश्वरूप राक्षसों को भी चोरी छिपे यज्ञ का भाग दिया करते थे, अतः जब इंद्र ने देखा कि धर्म की आड़ में विश्वरूप कपट कर रहे हैं, तो देवराज इंद्र डर गए और क्रोधित होकर विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले, विश्वरूप का सोमरस पीने वाला सिर पपीहा बना और सुरापान करने वाला सिर गौरैया बना तथा अन्न खाने वाला सिर तीतर बन गया, तभी से इस पृथ्वी पर पपीहा गौरैया और तीतर का जन्म होने लगा, 

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