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ज़ब पृथ्वी पर हुआ स्वर्ग का निर्माण,

स्वर्गलोक की रचना कैसे हुईं
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नमस्कार दोस्तों
                पृथ्वी पर स्वर्ग का निर्माण, यह बात सुनने मे जरूर अटपटी हैं लेकिन यह सत्य हैं, इसका वर्णन ब्रम्हपुराण मे किया गया हैं, जिसमे बताया गया हैं की कैसे ऋषि आत्रेय ने पृथ्वी पर किया स्वर्ग का निर्माण, आइये जानते हैं कैसे और क्यों घटी यह घटना, और क्या हुआ उसके बाद,

कथानुसार :-
                  ज़ब महार्षि आत्रेय ने सभी वेद पुराण पढ़कर ज्ञान अर्जित कर लिया, यज्ञ अनुष्ठान और तपस्या से सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया, तो उन्हें तीनों लोकों मे आने जाने की शक्ति भी मिल गयीं, अतः वें एक बार स्वर्गलोक गए, जहां उन्होंने देवताओं से घिरे देवराज इंद्र और उनकी पत्नी शची को देखा, जो अप्सराओं का नृत्य देख रहे थे, औऱ सिद्ध मुनिगण देवराज इंद्र की स्तुति कर रहे थे, यह सब देखकर ज़ब मुनि आत्रेय अपने आश्रम वापस आये तो सोचने लगे कि कहां पवित्र गुणों वाली रत्नो से भारी अत्यंत रमणीक इंद्रपुरी, औऱ कहां यह साधारण आश्रम,

अतः मुनि आत्रेय के मन मे इंद्रपुरी प्राप्त करने की लालसा जाग उठी, और अपनी पत्नी से बोले " हे देवी अब मै उत्तम से उत्तम फल मूल नहीं खा सकता, मुझे तो स्वर्गलोक का अमृत, पवित्र भोजन, सुंदर सभा, अस्त्र सस्त्र, मनोहर वस्त्र औऱ नंदनवन की याद आती हैं, ऐसा कहकर ऋषि आत्रेय ने अपनी तपस्या के प्रभाव से विश्वकर्मा को बुलाया औऱ बोले " हे महात्मा मै इन्द्रपद चाहता हूँ, इसलिए आप इस पृथ्वी पर ही स्वर्गलोक का निर्माण करें, और यदि तुमने इंकार किया तो मै निश्चित ही तुम्हे जलाकर भस्म कर डालूंगा, अब श्राप के डर से विश्वकर्मा ने तत्काल वहाँ मेरुपर्वत, देवपुरी, कल्पवृक्ष, कल्पलता, कामधेनु सहित सुन्दर महल बनाये औऱ इंद्र कि पत्नी शची के समान ही एक स्त्री का भी निर्माण किया, सुधर्मा सभा, अप्सराएं, उच्चैश्वा घोड़ा, ऐरावत हाथी, बज्र औऱ संपूर्ण देवताओं का निर्माण किया,

ऋषि कि पत्नी के मना करने पर भी आत्रेय ने शची के जैसी रूपवाली स्त्री को अपनी पत्नी बना लिया, बज्र औऱ तमाम अस्त्रों और शस्त्रों को भी धारण कर लिया, नृत्य संगीत उसी तरह होने लगा जैसा इंद्रपुरी मे होता था, स्वर्ग के तमाम सुख पाकर आत्रेय मुनि बड़े प्रसन्न हुए, अब स्वर्गलोक का सुख कौन नहीं भोगना चाहता, अतः ज़ब दैत्यों औऱ दानवों ने स्वर्ग का वैभव पृथ्वी पर उतरा सुना, तो सोचने लगे कि इंद्र स्वर्गलोक का सुख पृथ्वी पर भोगने के लिए क्यों आया हैं, यही सोचकर सभी दैत्यों और दानवों ने आत्रेय द्वारा निर्मित स्वर्ग को चारों तरफ से घेर लिया, और बड़े बड़े अस्त्रों शस्त्रों से प्रहार करना शुरू कर दिया,

यह सब देख मुनि आत्रेय डर गए, और दैत्यों के सामने जाकर बोले कि " हे दैत्यगण मै इंद्र नहीं हूँ, न ही यह शची हैं और न ही यह स्वर्गलोक हैं, बज्रधारी इंद्र तो स्वर्गलोक मे हैं, मै तो ब्राम्हण आत्रेय हूँ, तब दैत्य बोले कि " मुनिवर आत्रेय इंद्र जैसा यह स्वरूप छोड़कर, यहाँ का सारा वैभव समेट लो, तभी हम तुम्हे कुशल से रहने देंगे, अन्यथा नहीं, तब मुनि आत्रेय ने कहा " मै अग्नि कि शपथ खाकर कहता हूँ, आप लोग जैसा कहोगे मै वैसा ही करूँगा, तब आत्रेय मुनि ने तुरंत विश्वकर्मा जी को बुलाया और बोले कि " हे महात्मा आप तुरंत इन सभी वस्तुओं को नष्ट करके मुझ ब्राम्हण कि रक्षा करें, मुझे इन दिव्य भोगों कि कोई आवश्यकता नहीं हैं,

तब विश्वकर्मा जी ने तुरंत उस स्वर्गलोक को समेट लिया, और हँसते हुए आपने धाम वापस लौट आये, दैत्य भी पाताललोक वापस लौट गए, और मुनि आत्रेय भी सबक सीखने के बाद अपने शिष्यों और पत्नी के साथ फिर से आश्रम मे रहने लगे,  

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