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भगवान शिव और विष्णु के अवतार वृषाकपि की कथा,,

lord vishnu
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नमस्कार दोस्तों
              भगवान शिव और श्री हरि विष्णु दोनों ने एक ही शरीर में अंशावतार लिया था, जिसका नाम वृषाकपि था, जिसका वर्णन ब्रह्म पुराण में किया गया है,

कथानुसार:-
            पूर्व काल में दैत्यराज हिरण्य का महाशनि नामक महादैत्य पुत्र हुआ जिसकी पत्नी का नाम पराजिता था एक बार उसने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को एरावत हाथी समेत बंदी बनाकर पाताल लोक ले आया, और कारागार में डाल दिया इंद्र पर विजय पाने के बाद महाशनि ने वरुण को जीतने के लिए उन पर भी आक्रमण कर दिया, लेकिन बुद्धिमान वरुण ने महाशनि से अपनी कन्या का विवाह करवा दिया इधर तीनो लोक बिना इंद्र के हो जाने से सभी देवता परेशान होकर श्री हरि विष्णु की शरण में गए और सारी बात बताई तब श्री हरि विष्णु ने कहा कि हे देवताओं दैत्य महाशनि मेरे लिए मेरे लिए अवध्य हैं,

यह कहकर श्री हरि सभी देवताओं को लेकर महाशनि के ससुर वरुणदेव के पास गए, और इंद्र के बंदी बनाये जाने की बात कहकर बोले की " हे वरुणदेव कोई ऐसा उपाय करो ताकि इंद्रदेव स्वर्गलोक वापस आ जाएं, आखिर महाशनि तुम्हारा दामाद हैं वह तुम्हारी बात नहीं टालेगा, श्री हरि की बात मानकर वरुणदेव दैत्यराज महाशनि के पास गए और बोले " हे दैत्यराज इंद्र को परास्त करके आपने बंदी तो बना ही लिया हैं, स्वर्गलोक में इंद्र के न होने से वहाँ उथल पुथल मची हुईं हैं, अतः अब तुम उन्हें मुक्त कर दो, क्योंकि अगर शत्रु को परास्त करके और बंदी बनाकर छोड़ दिया जाये, तो राजा महान यश का भागी होता हैं,

तब दैत्यराज महाशनि ने इंद्र को ऐरावत हाथी समेत मुक्त कर दिया, और बोला " इंद्र आज से तुम मेरे ससुर के शिष्य हुए, अगर इनके साथ कोई दुर्व्यहार किया तो तुम्हे मै फिर से बंदी बनाकर कारागार मे डाल दूंगा, और हँसते हुए बोला " जाओ जाओ मेरे ससुर वरुणदेव का हमेशा आदर करना, इंद्र स्वर्ग मे तो वापस आ गए, लेकिन शत्रु द्वारा अपमानित किये जाने से और शर्म से काले पड़ गए, एक दिन इंद्र अपनी पत्नी से बोले " भद्रे शत्रु द्वारा अपमानित होने से मेरे ह्रदय में आग लगी हुईं हैं, अब तुम ही बताओ मै क्या करूँ, तब शची बोली की " स्वामी दैत्यराज महाशनि ने सभी शक्तियां तपस्या से प्राप्त की हैँ, अतः तपस्या से कोई भी कार्य असंभव नहीं हैं, अतः आप भी भगवान शिव की तपस्या करके अपना इच्छित वर प्राप्त करें, उनकी कृपा से आप जरूर महाशनि को परास्त कर पाएंगे,

तब इंद्र ने भगवान शिव की बहुत कठोर तपस्या की जो हजारों वर्ष चली, तब भगवान शिव प्रगट हुए और इंद्र से बोले " बताओ तुम्हे क्या चाहिए, तब इंद्र ने कहा की " हे देवाधिदेव महादेव आपसे क्या छिपा हुआ हैं आप तो सब जानते हैं की मै किस उद्देश्य से आपकी तपस्या कर रहा हूँ, तब शिवजी बोले " वत्स अकेले मेरे द्वारा तुम्हारे शत्रु का वध नहीं किया जा सकता, अतः तुम श्री हरि विष्णु को प्रसन्न करो, तभी यह कार्य संभव हैं, तब इंद्र ने भगवान शिव के कहे अनुसार गंगाजी के दक्षिण तट पर ऋषि आपस्तम्भ के पास गए और उन्हें साथ लेकर तरह तरह के मंत्रो और तपस्या के द्वारा श्री हरि विष्णु की तपस्या प्रारम्भ कर दी,

तब इंद्र की तपस्या से प्रसन्न होकर श्री विष्णु जी ने उन्हें दर्शन दिए और बोले इंद्र बताओ तुम्हे क्या चाहिए, यह सुनकर इंद्र बोले " प्रभु मुझे एक ऐसा वीर योद्धा प्रदान करें, जो मेरे शत्रु दैत्य महाशनि का वध कर सके, तब श्री विष्णु ने कहा ठीक हैं दिया, तत्पश्चात शिवजी, गंगाजी और विष्णु जी के द्वारा जल से एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसमे भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों के अंश थे, उसने भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों देवो के स्वरूप धारण किये थे, उसके हाथ मे चक्र भी था और त्रिशूल भी, तत्पश्चात उस दिव्यपुरुष ने पाताललोक मे जाकर दैत्यराज महाशनि का वध किया, और वृषाकपि के नाम से प्रसिद्ध हुआ, 

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