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माँ गंगा देवी दरिद्रा की दुश्मन कैसे बनी,

devi daridra
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नमस्कार दोस्तों
                क्या आप जानते हैं देवी गंगा और देवी दरिद्रा दोनों एक दूसरे के शत्रु कैसे बनी, क्योंकि कहा जाता है की दरिद्र मनुष्य यदि गंगा जल का पान कर ले तो दरिद्रता उसे छोड़ देती है, इसका वर्णन ब्रम्हपुराण में भी मिलता है आइए मैं आपको बताता हूं कि देवी दरिद्र और देवी गंगा में कैसे हुई थी या शत्रुता....

कथानुसार :-
         पूर्व काल की बात है देवी लक्ष्मी और देवी दरिद्रता में संवाद (बहस ) हुआ, क्योंकि वह दोनों एक दूसरे का विरोध करती हुई ही इस संसार में आई थी, तीनों लोकों में कोई ऐसी वस्तु नहीं कि जहां इन दोनों का वास ना हो, अतः दोनों एक दूसरे से कहने लगी कि मैं बड़ी हूं, लक्ष्मी जी बोली" देहधारियों में कुल, शील और जीवन में मैं ही हूं, मेरे बिना मनुष्य जीवित होकर भी मरे हुए के समान है,

तब देवी दरिद्रता ने कहा " मैं बड़ी हूं क्योंकि मुक्ति सदा मेरे ही अधीन है जहां मैं हूं, वहां काम, क्रोध लोभ आदि दोष नहीं होते हैं उन्माद ईर्ष्या का अभाव रहता है, दरिद्रता की बात सुनकर लक्ष्मी ने कहा " मुझसे अलंकृत होकर सभी प्राणी सम्मानित होते हैं, वहीं निर्धन व्यक्ति शिव के ही समान क्यों ना हो वह सबसे तिरस्कृत ही होता रहता है, मुझे कुछ दीजिए शब्द मुंह से निकलते ही, वृद्धि, सम्मान, शर्म शांति और कीर्ति यह पांचों देवता शरीर से निकल कर चले जाते हैं, गुण और गौरव भी नहीं टिकते, प्राणियों के लिए निर्धनता सबसे बड़ा कष्ट है और पाप भी, अतः हे दरिद्रय कान खोल कर सुन ले मैं ही श्रेष्ठ हूं,

तब देवी हरिद्रा बोली "लक्ष्मी तुझे शर्म नहीं आती श्रेष्ठ पुरुषों को छोड़कर तू सदा पापियों में बसती है, जो तेरा विश्वास करता है तू उनके साथ छल करतीं है, मदिरा पीने से भी उतना भयंकर नशा नहीं होता, जितना तेरे समीप रहने से विद्वानों को भी हो जाता है, मैं योग्य और धर्मशील पुरुषों में सदा निवास करती हूं भगवान शिव और श्री विष्णु के भक्त, महात्मा, सदाचारी, शांत साधु, विद्वान तथा पवित्र बुद्धि वाले श्रेष्ठ पुरुषों में सदा मेरा निवास रहता है, सन्यासी और निर्भय पुरुषों के साथ मैं सदा रहा करती हूं, लेकिन तू हमेशा राजकर्मचारी, चुगलखोर, लालची, मित्रद्रोही दूसरे का बुरा सोचने वाले, पाप कर्म करने वाले मनुष्यों में तेरा निवास होता है,

जब यह विवाद बढ़ गया और निष्कर्ष कुछ नहीं निकल सका, तो दोनों देवियाँ ब्रह्मा जी के पास गई, तब ब्रह्मा जी बोले "हे देवियों पृथ्वी और जल यह दोनों देवियां मुझसे ही प्रकट हुई है, अतः स्त्री होने के नाते वही तुम्हारा विवाद समझ सकती हैं और कोई नहीं, तब ब्रह्मा जी के कहने से वें दोनों देवियां पृथ्वी और जल को साथ लेकर देवी गंगा के पास गई और सारा वृत्तांत सुनाया,

तब गंगा जी ने देवी दरिद्रा से कहा " तपश्री जो कुछ संसार में व्याप्त है वह सब लक्ष्मी के द्वारा ही व्याप्त है धीर, क्षमावान, साधु, विद्वान पुरुषों में जो जो रमणीय है वह सब लक्ष्मी का ही विस्तार है, लक्ष्मी से शून्य कोई वस्तु नहीं, हे दरिद्रे तुझे इन लक्ष्मी जी की स्पर्धा करते तनिक भी लज्जा नहीं आई, चली जा यहां से तू देवी लक्ष्मी की बराबरी कभी नहीं कर सकती, तभी से गंगा जी और देवी दरिद्रा में शत्रुता हो गई, और तभी से गंगा का जल दरिद्रा का दुश्मन बन गया, और इसीलिए गंगाजल का पान करने से मनुष्य की दरिद्रता का नाश हो जाता हैं, 

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