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माता का पेट फाड़कर बाहर आया था यह महान ऋषि..?

ऋषि पिप्पलाद
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नमस्कार दोस्त
            महर्षि दधीचि को तो सभी जानते हैं लेकिन उनकी पत्नी गभस्तिनी और उनके पुत्र पिप्पलाद के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, जहां गभस्तिनी ने चिता में प्रवेश करके अपने प्राण त्यागे थे तो वहीं दधीचि पुत्र पिप्पलाद ने सभी देवताओं के वध की प्रतिज्ञा की थी आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से...

कथानुसार :- जब वृत्रासुर को मारने में सभी देवता असफल हुए तब सभी देवता श्री हरि विष्णु के पास गए, और विष्णु देव ने सभी देवताओं को महर्षि दधीचि के पास भेजा, महर्षि दधीचि का कंकाल लाने के लिए ताकि उनकी हड्डियों का बज्र बनाकर वृत्तासुर का वध किया जा सके, तब श्री हरि विष्णु के आदेशानुसार सभी देवता महर्षि दधीचि के पास गए, उस समय महर्षि दधीचि की पत्नी जल लाने के लिए गई हुई थी इसी बीच महर्षि दधीचि ने अपने प्राण त्यागे और उनकी हड्डियों का ढांचा लेकर सभी देवता विश्वकर्मा के पास चले गए, जब महर्षि दधीचि की पत्नी जल लेकर आश्रम में वापस आई तो पति को ना देख कर उन्होंने अग्निदेव से पूछा कि मेरे पति कहां है, तब अग्निदेव ने महर्षि दधीचि के त्याग की सारी बात बताई, पति की मृत्यु की खबर सुनकर गभस्तिनी मूर्छित हो गई जब होश में आई तो पति की बची हुई लोम और त्वचा के साथ चिता में प्रवेश करने का निर्णय ले लिया,

लेकिन उस समय वह गर्भवती थी तब गभस्तिनी ने अपना पेट चीरकर गर्भस्थ बालक को बाहर निकाला, और बोली कि मेरे गर्भ का यह बालक माता पिता हीन है ना कोई भाई है और ना ही कोई सगा संबंधी, अतः संपूर्ण भूतगण औषधियां और लोकपाल इसकी रक्षा करें, यह कहकर गभस्तिनी ने बालक को पीपल पेड़ के नीचे रख दिया और अग्नि को प्रणाम करके चिता में प्रवेश कर गई, तब सभी वनस्पतियों और औषधियों ने मिलकर अपने राजा सोम से उत्तम अमृत लिया और उस बालक को पिलाया, अमृत पीकर वह बालक बढ़ने लगा पीपल के वृक्ष ने उसका पालन किया था इसलिए वह पिप्पलाद नाम से प्रसिद्ध हुआ,

बड़ा होकर उसने पीपल के वृक्ष से पूछा कि सामान्यतया देखा जाता है कि मनुष्य से मनुष्य, पशु से पशु तथा पक्षी से पक्षी उत्पन्न होते हैं लेकिन मैं पीपल से मनुष्य रूप में कैसे उत्पन्न हुआ, पिप्पलाद की बात सुनकर वृक्षों ने उसके पिता दधीचि और माता की मृत्यु का सारा वर्णन सुनाया, जिसे सुनकर पिप्पलाद बड़ा क्रोधित हुआ और बोला कि " जो भी मेरे पिता और माता की मृत्यु के जिम्मेदार है मैं भी उसका वध कर करूँगा, क्रोध अग्नि में जलता पिप्पलाद भगवान शिव के पास पहुंचा और बोला कि "हे प्रभु मुझे शत्रुओं का नाश करने वाली कोई शक्ति दीजिए,
पिप्पलाद के इतना कहते ही भगवान शिव के नेत्रों से एक घोड़ी के समान भयंकर कृत्या प्रकट हुई जो संपूर्ण जीवों के विनाश के लिए अपने गर्भ में भयंकर अग्नि छिपाए हुई थी, मृत्यु के समान वह महारुद्रा उत्पन्न होते ही पिप्पलाद से बोली कि" बताओ मुझे क्या करना है, तब पिप्पलाद बोले कि" समस्त देवता मेरे शत्रु हैं इसलिए जाओ उन्हें खा जाओ, तब वह कृत्या देवलोक की तरफ दौड़ी जिसे देख सभी देवता घबरा गए और महादेव की शरण में गए और रक्षा करने को कहा,

तब सभी देवता सहित स्वयं महादेव पिप्पलाद के पास आए और बोले कि " बेटा देवताओं का नाश कर भी दिया जाए तो तुम्हारे माता-पिता वापस तो आ  नहीं जाएंगे,  तुम्हारे पिता ने देवताओं और समस्त लोकों के हित के लिए ही अपने प्राण त्यागे थे, जिस कारण आज तीनों लोक और देवता सुखी है तुम उन्हीं के पुत्र हो क्रोध का त्याग करके इन्हें अभय दान दो, तब महादेव के कहने पर पिप्पलाद ने सभी देवताओं को क्षमा प्रदान किया, जिससे प्रसन्न सभी देवताओं ने पिप्पलाद से वर मांगने के लिए कहा तब पिप्पलाद ने कहा कि " उन्होंने अपने माता पिता को कभी नहीं देखा अतः मैं अब उनके दर्शन करना चाहता हूं, तब देवताओं ने पिप्पलाद को महर्षि दधीचि और उनकी माता गभस्तिनी के साक्षात दर्शन करवाएं, 

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