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हनुमान जी की माता को श्राप दिया था मुनि दुर्वासा ने.

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नमस्कार दोस्तों
            महार्षि दुर्वासा जिनका नाम सुनते ही सबसे पहले मन मे कोई छवि आती है तो वो है एक क्रोधी मुनि की, जो पुरे संसार में अपने क्रोध के लिए जाने जाते थे, हालांकि वें भगवान शिव के 11 वें अवतार भी माने गए है, उनके क्रोध से हनुमान जी की माता भी नहीं बच पायीं थी, उन्हें भी भुगतना पड़ा था महार्षि दुर्वासा के श्राप का फल,

कथानुसार :-
            एक बार देवराज इंद्र अपनी देव सभा मे बैठे हुए थे, तभी वहाँ ऋषि दुर्वासा का आगमन होता है, तब इंद्र उनका स्वागत सत्कार करते है, और आसान ग्रहण करने को कहकर आने का कारण पूंछते है, देवराज इंद्र और मुनि दुर्वासा के मध्य बातचीत हो रही होती है,  तभी वहाँ से पुंजिकस्थली नामक अप्सरा बार बार अंदर बाहर आ जा रही थी,

जिससे उनका ध्यान भंग हो रहा था,  यह देख मुनि दुर्वासा को बड़ा क्रोध आया और क्रोधित मुनि दुर्वासा ने पुंजिकस्थली अप्सरा को श्राप दे दिया कि "तू जो इस तरह बंदरों कि भाँति अंदर बाहर हो रही, इसलिए तू वानरी रूप मे पृथ्वीलोक मे जन्म लेगी, श्राप से पुंजिकस्थली को बहुत दुःख हुआ उसने मुनि दुर्वासा से बहुत क्षमा याचना की,

तब मुनि बोले की अब तो श्राप दे दिया है जोकि विफल नहीं हो सकता,  हाँ मै तुझे इच्छानुसार रूप धारण करने का वरदान भी देता हूँ, जिससे तू जो रूप धारण करना चाहेगी कर सकेगी, उसी के कुछ वर्ष पश्चात् वह अप्सरा वानरराज विरज की पत्नी के गर्भ से जन्मी जिसका नाम अंजनी रखा, आगे चलकर उसी वानरी अंजना का विवाह महप्रतापी वानरराज केशरी के साथ हुआ, उसी के कुछ वर्ष पश्चात् अंजनी से हनुमान जी का जन्म हुआ, ज्योतिषशास्त्र के अनुसार हनुमान जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा दिन मंगलवार तथा चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग मे हुआ था, हनुमान जी को अंजनीपुत्र के साथ पवनपुत्र भी कहा गया है,

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