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नर नारायण और दम्भोद्भव का युद्ध,

                                     नर और नारायण की कथा 


 नमस्कार दोस्तों
                          नर और नारायण की महिमा का वर्णन महाभारत के उद्योग पर्व में किया गया है, लेकिन उससे पहले नर और नारायण के बारे में थोड़ा जान लेते हैं, आज भी हिमालय की दो चोटियों को नर और नारायण के नाम से जाना जाता है, वामन पुराण के छठे अध्याय में कहा गया है कि "परमपिता ब्रह्मा जी ने अपने हृदय से महाराज धर्म को उत्पन्न किया था, महाराज धर्म और उनकी पत्नी मूर्ति से ही नर और नारायण का जन्म हुआ,

महाभारत की कथानुसार :-

                प्राचीन काल में दम्भोद्भव नामक राजा हुआ, जो रोज सुबह उठकर अपनी प्रजा से पूछता कि "क्या कोई ऐसा योद्धा है जो मुझे युद्ध में हरा सके जो मेरे जैसा वीर हो, और जवाब मिलता कि नहीं महाराज, वह राजा अपनी वीरता के घमंड में प्रतिदिन अपनी प्रजा से यही सवाल पूछता, एक दिन जब फिर उसने वही सवाल अपनी प्रजा से पूछा तो कुछ तपस्वी बोले कि "राजन इस पृथ्वी पर दो ऐसे वीर सत्पुरुष हैं, जिन्होंने आपके जैसे अनेकों राजाओं को संग्राम में परास्त किया है, आप उनकी बराबरी नहीं कर सकते, तब राजा ने पूछा कि "वह वीर पुरुष कहां है, कहां जन्मे और मुझे कहां मिलेंगे, तब तपस्वी बोले कि" राजन नर और नारायण नामक दो तपस्वी है जो गंधमादन पर्वत पर घोर तप कर रहे हैं, आप उनके साथ युद्ध करके अपनी वीरता साबित करो,

राजा यह बात सहन ना कर सका और तत्काल अपनी सेना के साथ गंधमादन पर्वत पर उनकी खोज प्रारंभ कर दी, बहुत समय से तपस्या करने के कारण हुआ वें दोनों मुनि बहुत ही दुर्बल हो गए थे, तब राजा उनके पास गया और उनसे उनकी कुशल मंगल पूँछी, मुनियों ने भी फल फूल से राजा का अतिथि सत्कार करके उनसे वहां आने का उद्देश्य पूछा, तब राजा ने कहा कि "मैंने आप दोनों के बारे में बहुत सुना है, सुना है आप दोनों बहुत ही वीर है शस्त्र चलाने में महारत हासिल किया हुआ है, अतः मैं आपसे युद्ध करने के लिए यहां आया हूं, इसलिए मेरी चुनौती स्वीकार करें और इसे ही मेरा अतिथि सत्कार समझे,

तब नर नारायण ने कहा कि "राजन इस आश्रम में क्रोध लोभ आदि दोष नहीं कर सकते, तो युद्ध की बात ही नहीं फिर अस्त्र-शस्त्र या फिर कुटिल बुद्धि के लोग यहां कैसे रह सकते हैं, यह पृथ्वी तमाम वीरों से भरी पड़ी हुई है, अतः तुम कहीं और जाओ, लेकिन राजा युद्ध करने की बात पर अटल रहा, नर और नारायण के बार बार कहने पर भी वह राजा नहीं माना, तब भगवान नर ने एक मुट्ठी सींक उठाई और बोले कि " दुष्ट तुझे युद्ध की बड़ी लालसा है इसलिए अपने हथियार उठा ले, और अपनी सेना को भी तैयार कर ले, मैं अभी तेरी युद्ध की लालसा शांत किए देता हूं, यह सुनकर दम्भोद्भव और उसकी सेना ने नर और नारायण पर बाणों की वर्षा प्रारंभ कर दी,

यह देख भगवान नारायण ने एक सींक को अमोघ अस्त्र के रूप में परिणित करके छोड़ा, तभी बड़ी आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, मुनि नर ने दम्भोद्भव के सभी वीर सैनिकों के आंख, नाक, कान और मुख को सींकों से भर दिया, सारा आकाश सफेद सींकों से भर गया, जिन्हें देख घबराया हुआ दम्भोद्भव नर और नारायण के चरणों में गिर पड़ा और अपने प्राणों की रक्षा के लिए गिड़गिड़ाने लगा, तब भगवान नर और नारायण दोनों बोले कि "राजन सत्पुरुषों की सेवा और धर्म का आचरण ही तुम्हारा परम कर्तव्य है, लोभ, अहंकार छोड़कर जितेन्द्रिय, क्षमाशील, मृदुभाषी और शांत होकर प्रजा का पालन करो यही एक राजा का कर्तव्य है, अतःअब तुम यहां से प्रस्थान करो, तब राजा दम्भोद्भव के प्राण बचे और नर नारायण को प्रणाम करके वह अपनी राजधानी लौट आया,

वही नर महाभारत काल में अर्जुन के रूप में जन्मे थे और नारायण भगवान कृष्ण के रूप में नर और नारायण ही अर्जुन और कृष्ण थे,

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