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नारद मुनि क्यों भटकते रहते है हमेशा,

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नमस्कार दोस्तों
             क्या आपने कभी सोचा है कि नारद मुनि किसी एक लोक में क्यों नहीं ठहरते, इस लोक से उस लोक क्यों हमेशा भटकते रहते हैं शायद नहीं, इसके पीछे एक बहुत ही रोचक कथा है, जिसमें नारद मुनि को दक्ष प्रजापति द्वारा श्राप दिया जाता है, कि तुम लोक लोकान्तरों में हमेशा भटकते रहोगे तुम्हें कहीं भी ठहरने की ठौर नहीं मिलेगी ll

कथानुसार :- जब परम पिता ब्रह्मा जी ने प्रजापति दक्ष को प्रजा की रचना का कार्यभार सौंपा, तब प्रजापति दक्ष ने पञ्चजन की पुत्री से 10000 पुत्र उत्पन्न किए, जो एक ही आचरण और स्वभाव के थे, और जब दक्ष प्रजापति ने उन्हें संतान उत्पत्ति करने का आदेश दिया, तो वह पश्चिम में सिंधु नदी के तट पर गए, रास्ते में नारायण सर नामक तीर्थ था जहां उन सभी ने सरोवर में स्नान किया, स्नान करते ही उनका अंतःकरण शुद्ध हो गया और उनकी बुद्धि भागवत धर्म में लग गई, लेकिन पिता की आज्ञा के कारण व उग्र तप में ही लगे रहे,

जब नारद मुनि ने देखा कि भगवत धर्म में रुचि होने पर भी वह प्रजा वृद्धि में लगे हुए हैं तो वह उनके पास आए और बोले कि " अरे मूर्ख हर्यश्वों तुम प्रजापति हुए तो क्या हुआ, जब तुम लोगों ने पृथ्वी का अंत ही नहीं देखा तो सृष्टि कैसे करोगे, जब तक तुम लोग सर्वज्ञ पिता के उचित उद्देश्य को समझ नहीं लोगे और देख नहीं लोगे तब तक उनकी आज्ञा अनुसार सृष्टि कैसे करोगे, हर्यश्वों जन्म से ही बुद्धिमान थे, अतः विचार करने लगे कि देवर्षि नारद का विचार तो उत्तम है यह लिंगशरीर ही जिसे साधारणतया जीव कहते हैं पृथ्वी है, और यही आत्मा का अनादि बंधन है इसका अंत देखे बिना मोक्ष के अनुपयोगी कार्यों में लगे रहने से क्या लाभ, परमेश्वर तो जागृत आदि तीनों अवस्थाओं में है वही सब का आश्रय हैं, उनका आश्रय कोई नहीं, वही सृष्टिकर्ता भी है और प्रलय कर्ता भी, यह सोचकर सभी हर्यश्वों एकमत होकर मोक्ष प्राप्ति के लिए चल पड़े,

 जब प्रजापति दक्ष को यह बात पता चली तो वह बहुत दुखी हुए तब ब्रह्माजी ने उन्हें सांत्वना दी, अतः प्रजापति दक्ष ने पुनः 1000 पुत्र उत्पन्न किये,और उनका नाम शरलाश्व रखा वह भी पिता की आज्ञा पाकर प्रजा सृष्टि के उद्देश्य से उसी सरोवर पर गए और स्नान किया, स्नान करने से उनका भी अंतः करण शुद्ध हो गया,और परब्रह्म का जाप करने लगे, वह लोग कुछ महीने जल तथा कुछ महीने वायु पीकर ही तप कर रहे थे, लेकिन आदत से मजबूर देवर्षि नारद वहां भी आ पहुंचे, और जो उपदेश उनके बड़े भाई हर्यश्वों को दिया था वही उपदेश उन्हें भी दे डाला और वहां से चलते बने, नारद मुनि के जाने के बाद शरलाश्वों ने भी सोचा कि नारद मुनि बिल्कुल सही कह रहे हैं, इसलिए वें भी अपने भाइयों की तरह मोक्ष प्राप्ति के लिए निकल पड़े,

जब दक्ष प्रजापति को पता चला कि फिर नारद ने मेरे पुत्रों की बुद्धि भ्रष्ट कर दी है, तो वह नारद के पास पहुंचे और क्रोध से भरे हुए आवेश में आकर बोले "कि नारद तुमने हमारे भोले भाले पुत्रों को भिक्षुओं का मार्ग दिखाकर मेरा अपमान किया है, अभी उन्होंने ब्रम्हचर्य से ऋषिऋण यज्ञ से देव ऋण और पुत्र उत्पत्ति करके पितृऋण नहीं उतारा था, तुमने उनके दोनों लोकों का सुख चौपट कर दिया, एक बार पहले भी तुमने मेरा अपमान किया था, तब मैंने उसे सह लिया लेकिन फिर तुमने वही कुकर्म किया, इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि " तुम लोक लोकान्तरों में भटकते रहोगे, कभी तुम्हारे लिए ठहरने की ठौर नहीं मिलेगी,

 यही कारण है कि नारद मुनि एक लोक में नहीं ठहर सकते और ना ही वें किसी लोक मे ठहरते हैंll

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