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नारियल का जन्म कैसे हुआ,

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Rahul Guru

नमस्कार दोस्तों
                        नारियल का जन्म कैसे हुआ था, क्या आपने कभी सोचा या फिर जानने की कोशिश की, क्योंकि हमारे धर्मशात्रों में नारियल को एक महत्वपूर्ण फल बताया गया हैं, जिसे हम श्रीफल भी कहते हैं, नारियल का उपयोग सभी धार्मिक अनुष्ठानो में किया जाता हैं, चाहे कोई पूजा पाठ हो या यज्ञ हवन, तो आइये जानते हैं कि नारियल का जन्म कैसे हुआ,

धार्मिक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार नारियल की उत्पत्ति ब्रम्हार्षि विश्वामित्र द्वारा की गई थी, जिसकी कहानी राजा सत्यब्रत से भी जुडी हुई हैं, राजा सत्यव्रत जोकि एक महान प्रतापी और धार्मिक राजा थे, राजा सत्यव्रत ने तमाम यज्ञ हवन दान पुण्य किये, सर्वसम्पन्न होने के बाद भी उनकी इच्छा थी कि वें पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जा सकें, लेकिन स्वर्गलोक कैसे पहुंचना हैं वें यह नहीं जानते थे, राजा सत्यव्रत के ही शासनकाल में ब्रम्हर्षि विश्वमित्र हुए जोकि तपस्या करने के उद्देश्य से अपना घर परिवार छोड़कर  हिमालय कि चोटियों पर चले गए,

 बहुत समय बीत जाने पर भी वें वापस नहीं आये, तभी विश्वामित्र कि अनुपस्थिती में उनके क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा, और ब्रम्हार्षि विश्वामित्र का परिवार भूखा प्यासा इधर उधर भटकने लगा, तब राजा सत्यव्रत ने उनके परिवार का भरण पोषण किया, और देख रेख कि जिम्मेदारी ली, और लम्बे अंतराल के बाद ज़ब ब्रम्हर्षि वापस आये तब उनके परिवार ने राजा सत्यव्रत के उपकार के बारे में बताया, जिससे प्रसन्न मुनि राजा से मिलने उनके महल जा पहुंचे,

और राजा सत्यव्रत को धन्यवाद कहते हुए उनसे वरदान मांगने के लिए कहा, जिसे सुनकर राजा सत्यव्रत ने तुरंत ही अपने स्वर्गलोक जाने कि इच्छा मुनि विश्वामित्र से बताई, क्योंकि राजा सत्यव्रत जानते थे कि अगर मुनि विश्वामित्र चाहेंगे तो अपने तपोबल से उन्हें स्वर्गलोक भेज सकते हैं, और वही हुआ ब्रम्हार्षि विश्वामित्र ने तुरंत ही अपने तपोबल कि शक्ति से राजा के लिए स्वर्गलोक का मार्ग बनाया, और आशीर्वाद देकर प्रस्थान करने के लिए कहा, अब राजा सत्यव्रत कि ख़ुशी का ठिकाना न रहा और मंद मंद मुस्कुराते हुए स्वर्गलोक कि ओर निकल पड़े, लेकिन सत्यव्रत जैसे ही स्वर्ग के द्वार पर पहुंचे, वैसे ही देवराज इंद्र ने उन्हें नीचे धकेल दिया,

जिससे राजा सत्यव्रत पृथ्वी पर आ गिरे, अब निराश सत्यव्रत फिर ब्रम्हार्षि विश्वामित्र के पास पहुंचे और सारा वृतांत सुनाया, जिसे सुनकर क्रोधित विश्वामित्र स्वर्गलोक जा पहुंचे, तब गुरु वृहस्पति ने बीच बचाव किया और सुझाव दिया कि क्यों न सत्यव्रत के लिए अलग से स्वर्ग का निर्माण कराया जाय, क्योंकि पृथ्वी लोक से कोई भी मानव शशरीर स्वर्गलोक नहीं आ सकता, अतः इससे स्वर्गलोक कि मर्यादा भी भंग नहीं होगी और मुनि विश्वामित्र का वचन भी झूठा नहीं होगा,

तब देवराज इंद्र, गुरु वृहस्पति और मुनि विश्वामित्र के आदेशानुसार स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के बीच में दूसरे स्वर्गलोक का निर्माण किया गया, जिसे स्थिर रखने के लिए एक स्तंभ का निर्माण किया गया, यही स्तंभ समय आने पर एक पेड़ के रूप में बदल गया, और राजा सत्यव्रत कि मृत्यु के पश्चात् उनका ही सिर एक फल बन गया जिसे हम श्रीफल या नारियल कहते हैं,

शास्त्रों की मान्यता के अनुसार यदि आप नारियल फोड़ते या चढ़ाते हैं तो कम से कम 100 लोंगो को भोजन करना चाहिये, नहीं तो आप पाप के भागीदार होंगे, क्योंकि नारियल ही सत्यव्रत का सिर मना जाता हैं,

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट में जरूर बताएं, धन्यवाद 

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