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मत्स्य अवतार की कथा.

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नमस्कार दोस्तों
               भगवान विष्णु को जगत का पालनकर्ता माना गया है, इसलिए उन्होंने ब्रह्मांड की रक्षा के लिए 10 बार अवतार लिया, जिसमें पहला अवतार था मत्स्य अवतार, मत्स्य अवतार की कथा का वर्णन भागवत पुराण, विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण में किया गया है, ब्रह्मांड के महाप्रलय से ठीक पहले परमपिता ब्रह्मा जी से हयग्रीव नामक राक्षस ने वेदों को चुरा लिया तब भगवान विष्णु ने अपना पहला अवतार लिया मत्स्य रूप में,

कथानुसार :- एक सुबह राजा सत्यव्रत मनु स्नान करके सूर्यदेव को अर्घ्य दे रहे थे तभी उनके अंजलि में एक छोटी सी मछली आ गई, जिसे देख राजा ने वापस उसे नदी में छोड़ दिया लेकिन तभी मछली बोली कि " राजन जल के बड़े जीव छोटे जीवो को मारकर खा जाते हैं निश्चित ही मुझे भी कोई बड़ा जीव खा लेगा, अतः हे राजन आप मेरे प्राणों की रक्षा करें, तब दयावश राजा सत्यव्रत मनु ने मछली को अपने जल भरे कमण्डल में डाल लिया और घर की ओर निकल पड़े,

लेकिन घर पहुंचकर राजा मनु ने देखा कि मछली का आकर कमण्डल के बराबर हो गया हैं, अतः उस मछली को निकल कर पानी से भरे एक बड़े पात्र में रख दिया, लेकिन रात भर में ही वह मछली पात्र के बराबर हो गई, दूसरे दिन मछली सत्यव्रत मनु से बोली कि " राजन आप मेरे लिए किसी बड़े स्थान का प्रबंध करें क्योंकि यह पात्र मेरे लिए छोटा पड़ रहा हैं, तब राजा सत्यव्रत ने उस मछली को एक तालाब में डलवा दिया, लेकिन अगले दिन वह मछली उस तालाब के बराबर हो गई,

यह देख राजा ने उस मछली को समुद्र में डलवा दिया, लेकिन आश्चर्य जनक रूप से समुद्र में भी मछली का आकार इतना ज्यादा बढ़ गया, कि समुद्र भी मछली के रहने के लिए छोटा पड़ गया, यह देख राजा सत्यव्रत अच्चम्भित हो गए, और समझ गए कि यह कोई सामान्य मछली नहीं हैं, जरूर ही यह कोई प्रभु कि लीला हैं, अतः सत्यव्रत आश्चर्य भरे शब्दों में बोले कि " आप कौन हैं आपका आकार जिस गति से रोज बढ़ रहा हैं, आप निश्चित ही कोई परमात्मा हैं, कृप्या कर आप मुझे बतायें कि आपने मत्स्य रूप क्यों धारण किया हुआ हैं,

तब मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने उत्तर दिया कि "राजन हयग्रीव नामक राक्षस ने वेदों को चुरा लिया हैं, जिससे सारे संसार में अन्याय और अधर्म फ़ैल गया हैं, अतः हयग्रीव के वध हेतु ही मैंने यह मत्स्य रूप धारण किया हैं, आज से सातवें दिन समुद्र अपनी सीमा से बाहर बहने लगेगा, भयंकर वर्षा से पृथ्वी जल में डूब जाएगी, तत्पश्चात विश्व का दोबारा सृजन होगा, अतः तुम एक बड़ी नाव में सप्तऋषियों के साथ औषधियों और अनाज के बीजों को इकठ्ठा करके मेरा इंतजार करना, उसी समय मैं आपको दोबारा दिखाई दूंगा, और आपको आत्मतत्व का ज्ञान प्रदान करूँगा,

तभी से सत्यव्रत श्री विष्णु का स्मरण करते हुए महाप्रलय कि प्रतीक्षा करने लगे, सातवें दिन भयंकर वर्षा प्रारम्भ हो गई, समुद्र अपनी सीमा से बाहर बहकर पृथ्वी को डुबोने लगा, जिसे देख सत्यव्रत मनु सप्तऋषियों के साथ औषधियों और अनाज के बीजों को लेकर नाव में सवार हो गए, वह नाव प्रलयरूपी सागर में तैरने लगी, सारा संसार पानी में डूब गया, चारों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा था, तभी मत्स्य रूपी भगवान प्रगट हुए और हयग्रीव नामक राक्षस को मारकर वेदों को लुप्त होने से बचाया, और ब्रम्हा जी को वापस दें दिया,

ज़ब ब्रम्हा जी नींद से उठे तो प्रलयकाल अंत समय में था, इसे ही ब्रम्ह की रात्रि के नाम से जाना जाता हैं, जो गणना के आधार पर 4320000000 सालों तक चला, हयग्रीव वध के बाद मत्स्य रूपी भगवान विष्णु नाव के पास गए, और सर्पराज वासुकि को रस्सी बनाकर नाव को अपने सींघ में बांध लिया, और सुमेरु पर्वत की ओर प्रस्थान किया, रास्ते में मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत मनु को मत्स्य पुराण सुनाया और आत्मतत्व का ज्ञान प्रदान किया, इस प्रकार उन्होंने समस्त औषधि और अन्न की नस्लों को बचा लिया और अपना पहला अवतार मत्स्य के रूप में लिया,

तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी हमें कमेंट में जरूर बताएं, धन्यवाद 

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