Breaking News

विश्व के पहले सन्यासी.. सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार

https://www.rahulguru.com
नमस्कार दोस्तों
                    विश्व के पहले सन्यासी कौन थे, क्या आप जानते हैं, वह कोई और नहीं बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार थे, जिनकी आयु हमेशा 5 वर्ष की ही रहती हैं, न घटती हैं न बढ़ती हैं, आइये जानते हैं इसके बारे में थोड़ा सा विस्तार से...?

कथानुसार :-
              आदिकाल में ज़ब ब्रम्हाजी पद्यम पर विराजमान होकर भगवान विष्णु जी की नाभि से उत्पन्न हुए, और अपने पास किसी को न पाकर, तथा समस्त संसार में जल ही जल देखा, तो वें सोचने लगे कि वें कौन हैं, उनके जन्म लेने का उद्देश्य क्या हैं, उन्हें किसने उत्पन्न किया, यह जानने के लिए उन्होंने घोर तप किया, जिससे प्रसन्न श्री हरी विष्णु जी ने उन्हें दर्शन दिए, और उनके स्वरूप का बोध कराते हुए, सृष्टि के निर्माण का निर्देश देकर अंतर्ध्यान हो गए,

तब ब्रम्हा जी ने पुनः 100 वर्षो तक तपस्या की, और 14 लोकों की रचना की तथा सप्त प्राकृतिक सर्ग बनाये जोकि (1) महत्तत्व (2) अहंकार (3)तन्मात्राएँ (4) इन्द्रियाँ (5) इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता (6) पञ्चपर्वा (7) अविद्या (तम,  मोह, महामोह, तामिस्त्र, और अन्धतामिस्त्र) तथा 3 वैकृतिक सर्ग बनाये, (1) स्वाथर (2) तिर्यक (3) मनुष्य को पैदा किया, लेकिन इन सभी चीजों को उत्पन्न करने के बाद भी ब्रम्हा जी का मन अशांत रहा, तो फिर उन्होंने विष्णु जी का ध्यान किया और चार पुत्र उत्पन्न किये,

अतः ब्रम्हा जी ने ज़ब भगवान विष्णु को याद किया, तो स्वयं भगवान विष्णु ने ही सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार इन चारों के रूप में अवतार लिया, जिनकी आयु 5 वर्ष की थी, और वे हमेशा ही 5 वर्ष के रहे, अब ज़ब ब्रम्हा जी ने इन्हे उत्पन्न करके निर्देश दिए की जाओ और प्रजाबृद्धि करो, तब चारों ऋषि कुमारो ने यह कहकर इंकार कर दिया कि श्री हरि विष्णु कि आराधना के आलावा इन्हे कोई अन्य कार्य उचित नहीं लगता, अतः हम केवल हरि भजन ही करेंगे अन्य कोई कार्य नहीं, यह कहकर चारों वहाँ से चले गए,

वे जहां भी जाते एक साथ जाते, और वें हमेशा हरि भक्ति में लीन रहते, चारों भाइयों ने एक साथ ही शास्त्रों का अध्ययन किया, उसके कुछ समय पश्चात् भगवान विष्णु ने हंसावतार धारण करके उन चारों ऋषि कुमारों को ब्रम्हज्ञान कि शिक्षा दी, जिसके पश्चात् इन चारों कुमारों ने अपना पहला उपदेश देवर्षि नारद को दिया, जिसके बाद नारद से अन्य ऋषियों ने प्राप्त किया, वास्तव में चारों वेद इन्ही चारों कुमारों का स्वरूप हैं, और यही चारों ऋषि ही वेद सामान माने गए हैं, क्योंकि आदिकाल में प्रलय के समय जो वेद लुप्त हो गए थे, उन वेदों को इन्ही चारों ऋषि कुमारों ने हंसावतार से प्राप्त किया,

इन्हे आत्मतत्व का सम्पूर्ण ज्ञान था, यही चार कुमार सनातन धर्म के प्रवर्तक आचार्य बने, और सनकादि नाम से प्रसिद्द हुए, सनकादि नाम से प्रसिद्द चारों कुमारों के नाम का अलग अलग अर्थ है, जैसे सनक (पुरातन) सनन्दन (हर्षित) सनातन (जीवन) तथा सनत्कुमार (चिर तरुण ) इन सभी के नाम सन शब्द हैं और इनके चार अलग -2 प्रत्याय भी हैं, बुद्धि के अहंकार से मुक्ति का उपाय सनकादि से अभिनिहित हैं, जैसे चैतन्य ही शाश्वत हैं, चैतन्य मनुष्य के शरीर में चार अवस्था में विद्यमान होता हैं, जिसे जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय या प्राज्ञ कहते है, इन चार अवस्था मे रहने के कारणवश चैतन्य मनुष्य को सनक सनन्दन सनातन और सनत्कुमार कहा जाता है, और ब्रम्हचर्य का पालन करने के कारण इन्हे ब्राम्हण कहा गया, जिनकी आयु हमेशा पांच वर्ष कि रहती है, न ही कम होती है, न ही उससे ज्यादा,

आपको यह लेख कैसा लगा, हमें कमेंट करके जरूर बतायें,                                                धन्यवाद 

1 टिप्पणी: