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रावण ने ऋषियों की हड्डियों से बनाया पहाड़, रामायण

         
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                 ऋष्यमूक पर्वत यह वही पर्वत है जहां पर वानरराज बालि भी जाने से डरता था, और ज़ब बाली अपने भाई सुग्रीव के खून का प्यासा बन बैठा था तब सुग्रीव ने इसी ऋष्यमूक पर्वत को अपना निवास स्थान बनाया था, क्योंकि सुग्रीव जानता था कि ज़ब वानरराज बालि और राक्षस दुदुम्भी का युद्ध हुआ, तो बालि ने दुदुम्भी को मारकर उसके शरीर को एक योजना दूर फेंक दिया, और हवा मे उड़ते मृत दुदुम्भी के खून की कुछ छीटें मातंग ऋषि के आश्रम मे जा गिरी जोकि ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित था,

             अतः मातंग ऋषि ने ज़ब तपोबल से मालूम किया की यह कृत्य बालि का किया हुआ है, तब उन्होंने बालि को श्राप दे दिया की यदि भविष्य मे बालि ऋष्यमूक पर्वत के 1 योजन के क्षेत्र मे आयेगा तो उसकी मृत्यु निश्चित है, इसलिए बालि ऋष्यमूक पर्वत का नाम सुनकर ही भयभीत हो जाता था,

ऋष्यमूक पर्वत का नाम ऋष्यमूक कैसे पड़ा :-
                   त्रेतायुग मे ऋष्यमूक पर्वत पर ऋक्षराज नामक एक विशालकाय वानर रहा करता था, एक बार उससे किसी ने पूछा की " हे ऋक्षराज इस पर्वत नाम ऋष्यमूक पर्वत कैसे पड़ा, तब ऋक्षराज ने कहा, रावण ने ज़ब ब्रम्हाजी से वरदान प्राप्त करके पृथ्वी पर उत्पात मचाना प्रारम्भ किया, और ऋषि मुनियों के यज्ञ हवन मे बाधा उत्पन्न करने लगा, तो उसके द्वारा सताए गए कई ऋषिगण एक समूह बनाकर इस पर्वत पर इकठ्ठा हुए, और मूक (मौन) रहकर रावण का विरोध करने लगे,

इसी दौरान ज़ब रावण विश्व विजय के उद्देश्य से उधर से जा रहा था, तो उसने देखा की लाखों की संख्या मे ऋषि उस पर्वत पर इकठ्ठा थे, अतः ज़ब रावण ने अपने मंत्री से पूँछा की इतने सारे महात्मा ऋषि यहां क्यों इकठ्ठा हुए हैं, तो मंत्री ने बताया की "हे राक्षसराज यह सारे ऋषि मूक (मौन) रहकर आपका विरोध करने के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैँ, यह सुनकर रावण को बहुत क्रोध आया और क्रोधित रावण ने सभी ऋषियों को मार डालने का आदेश दे दिया, और रावण की आज्ञा पाकर समस्त राक्षस उन ऋषियों पर टूट पड़े, उन्ही ऋषियों के हड्डियों और अवशेषों से यह पहाड़ बन गया, 

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