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श्री राम के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की पूर्वजन्म की कथा,

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नमस्कार दोस्तों
          प्रभु श्री ने जो अश्वमेघ यज्ञ किया था, और उसमे जो यज्ञ का घोड़ा छोड़ा गया था, उसके पूर्वजन्म का वर्णन तब आता हैँ, ज़ब प्रभु श्री राम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहे होते हैँ, तभी महर्षि वशिष्ठ जल को अभिमंत्रित करते हैँ और श्री रामचंद्र तथा माता सीता से भी उसे अभिमंत्रित कराते हैँ, ताकि यज्ञ अश्व (घोड़ा) को पवित्र किया जा सके, लेकिन तभी विचित्र घटना घटती हैँ,

प्रभु श्री राम यज्ञ के घोड़े से कहते हैँ, हे श्रेष्ठ इस यज्ञ मंडप मे उपस्थित सभी श्रेष्ठजनों के सामने तुम मुझे पवित्र करो, और ऐसा कहकर प्रभु श्री राम जी माता सीता सहित उस घोड़े को स्पर्श करते हैँ, इस घटना को देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग कहने लगते है कि जिस प्रभु श्री राम का मात्र नाम लेने भर से समस्त पाप नष्ट हो जाते है, वें प्रभु रामचंद्र जी ये क्या कह रहे हैं, अब यह तुच्छ पशु प्रभु श्री राम को पवित्र करेगा, लेकिन तभी प्रभु श्री राम का स्पर्श पाते ही वह घोड़ा पशुरूप का परित्याग करके तुरंत दिव्यरूप धारण कर लेता है, जिसे देखकर वहाँ उपस्थित सभी आश्चर्यचकित हो जाते हैं,

तब प्रभु श्री राम उस दिव्यरूपी पुरुष से पूंछते हैं, कि आप कौन हैं, इस पशुयोनि मे कैसे जन्म लिया, कृपया मुझे सारी बात बताने का कष्ट करें, प्रभु श्री राम की बात सुनकर दिव्यरूपी पुरुष कहता हैं, भगवन भला आपसे क्या छुपा हुआ हैं, लेकिन आप जानना ही चाहते हैं तो सुनिए, प्रभु पूर्वजन्म मे मैं एक ब्राम्हण था, लेकिन मुझसे एक भारी भूल हो गई, एक दिन सुबह -2 मैं सरयू नदी के तट पर गया और और स्नान ध्यान करके पूरे विधि विधान के साथ आपका ध्यान करने लगा, उसी समय मेरे पास बहुत से लोग आये, और इतने सारे लोंगो को देख मेरे मन मे लालच उत्पन्न हो गया, अतः उन सभी लोगो को ठगने के उद्देश्य से मैं तरह - 2 के दम्भ भरने लगा,

इत्तेफाक से उसी समय पृथ्वी पर विचरण करते हुए वहाँ मुनि दुर्वासा पहुंच गए, और मेरे सामने खड़े होकर मुझे देखने लगे, उन्हें देखकर भी मैंने उन्हें अनदेखा कर दिया, न ही मैंने उनको नमस्कार किया और न ही उनका मैंने स्वागत सत्कार किया, अब महर्षि दुर्वासा तो हैं ही क्रोधी स्वभाव के अतः मुझे झूठा प्रवचन करते देख वें क्रोधित हो उठे, और मुझे श्राप देते हुए बोले कि "रे नीच अधर्मी सरयू जैसी पवित्र नदी के तट पर रहकर भी तू झूठे दम्भ भरता हैं, तू तो पशु समान हैं, जा आज से तू पशु ही बनकर रहेगा,

मुनि दुर्वासा का श्राप सुनकर मुझे बहुत कष्ट हुआ और मैं क्षमा याचना करता हुआ उनके चरणों मे गिर पड़ा, तब ऋषि दुर्वासा बोले कि निर्बुद्धि श्राप तो वापस नहीं लिया जा सकता, अतः ज़ब प्रभु श्री राम अश्वमेघ यज्ञ करेंगे तो तू ही उस यज्ञ का अश्व (घोड़ा) बनेगा, और श्री रामचंद्र के स्पर्श से तू इस श्राप से मुक्त हो जायेगा, और दिव्यरूप धारण करके परमलोक को प्राप्त करेगा,

अतः हे प्रभु मुनि दुर्वासा का दिया श्राप मेरे लिए आशीर्वाद बन गया, जिसके कारण आज मुझे आपका स्पर्श प्राप्त हुआ, हे भगवन अब आप मुझे आज्ञा दें मेरा पृथ्वी पर समय पूरा हो गया हैं, तब उस दिव्यपुरुष ने प्रभु श्री राम के चरण धोये और उनकी प्रदक्षिणा करके विमान पर बैठकर सनातन धाम चला गया, और उधर पूरा यज्ञ मंडप प्रभु श्री राम के जयकार से गूँज उठा, 

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