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वराह अवतार की कहानी,

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नमस्कार दोस्तों
                   वराह अवतार की कथा से संबंधित दो कथाएं जनमानस में प्रचलित हैं पहली कथा का वर्णन भागवत पुराण के 13 अध्याय में मिलता है l

भागवत कथानुसार :-
                 जब परम पिता ब्रह्मा सृष्टि का सृजन कर रहे थे,  तब उन्होंने देखा कि पृथ्वी तो अथाह जल में डूबी हुई है और पृथ्वी के बगैर सृष्टि का सृजन करना नामुमकिन है, ब्रह्मा जी बहुत देर तक सोचते रहे कि पृथ्वी को इस अथाह जल से बाहर कैसे निकाला जाए ब्रह्मा जी इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि तभी उनकी नाक की छेद से अंगूठे के बराबर आकार का एक वाराह निकला और आकाश में जाकर खड़ा हुआ,

 ब्रह्मा जी के देखते-देखते वह वराह शिशु पल भर में ही हाथी के समान विशाल बन गया जिसे देख ब्रह्माजी सोचने लगे कि इस सुवर रूप में यह कौन सा दिव्य प्राणी यहां प्रगट हुआ है यह मेरी ही नाक से निकला था किंतु क्षणभर में पहाड़ के समान हो गया यह अवश्य ही विष्णु भगवान की लीला है ब्रह्मा जी यह सोच ही रहे थे कि वह जोर-जोर से गर्जना करने लगा और बड़ी तेजी से जल के भीतर प्रवेश कर गया जब वह जल के भीतर घुस रहे थे तो उनकी आंखों से तेज निकल रहा था और सूअर का रूप धारण करने के कारण वह पृथ्वी का पता सूंघ सूंघ कर लगाने लगे,

 रसातल में पहुंचने के बाद वराह अवतार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को देखा फिर पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर धारण करके जल से बाहर ले आने लगे लेकिन तभी वहां महापराक्रमी हिरण्याक्ष ने उन पर आक्रमण कर दिया जिससे प्रभु क्रोध चक्र के समान तीक्ष्ण हो गया और उन्होंने उसे अपनी लीला से ही मार डाला जैसे एक शेर हाथी को मार डालता है उस समय भगवान का पूरा शरीर रक्त से लाल हो गया मानो किसी लाल मिट्टी के टीले में टक्कर मारकर आए हो और पृथ्वी को जल से बाहर निकाल कर अपने खुरों से जल को स्थित करके उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दी,

तब ब्रह्माजी समेत सभी देवी देवताओं ने वराह अवतार की स्तुति और वंदना की !

दूसरी कथानुसार :-
              हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु नामक दो राक्षस हुए जिन्होंने ब्रम्हदेव से वरदान प्राप्त कर लिया कि उन्हें युद्ध में कोई भी पराजित ना कर सके और ना ही कोई मार सके वरदान पाकर वह दोनों अपने आपको अमर समझने लगे और भगवान विष्णु के समकक्ष अपने आप को समझने लगे और तीनों लोगों को जीतने की लालसा में वह युद्ध करने के लिए इंद्रलोक की तरफ निकल पड़े जब यह बात इंद्र को पता चली तो मैं इंद्रलोक छोड़कर भाग खड़े हुए,

जब दोनों राक्षसों को इंद्रलोक में कोई ना मिला तो हिरण्याक्ष वरुण की राजधानी विभावरी नगरी जा पहुंचा और बोला कि वरुण देव आपने दैत्यों को हराकर राजसूय यज्ञ किया था अब आप को मुझे युद्ध में पराजित करना पड़ेगा आइए और मुझसे युद्ध कीजिए दैत्य की बात सुनकर वरुण को क्रोध तो बहुत आया लेकिन लेकिन वह ब्रह्मा जी का वरदान जानते थे अतः शांत भाव से बोले कि हिरण्याक्ष तुम महाप्रतापी शूरवीर हो अतः तीनों लोकों में भगवान विष्णु के अलावा किसी में इतना सामर्थ्य नहीं है कि वह तुमसे युद्ध कर सकें इसलिए तुम उन्हीं के पास जाओ वही तुम्हारी युद्ध की लालसा शांत कर सकते हैं,

वरुण की बात सुनकर हिरण्याक्ष देवर्षि नारद के पास गया और नारायण कहां मिलेंगे पूछा देवर्षि नारद भी नारायण का पता बताते हुए बोले कि हे राक्षसराज नारायण इस समय वराह रूप धारण करके पृथ्वी को रसातल से निकालने के लिए गए हुए हैं अब नारायण का पता जानकर हिरण्याक्ष रसातल में भी जा पहुंचा वहां उसने वराह भगवान को अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को धारण करके ले जाते हुए देखा तब उस अधर्मी दैत्य ने भगवान वराह से कहा कि अरे जंगली मूर्ख पशु तू इस पृथ्वी को कहां लिए जा रहा है इस पृथ्वी को ब्रह्मा जी ने हमें दे दिया है रे नीच पशु तू पृथ्वी को यहां से नहीं ले जा सकता तू दैत्य और दानवों का शत्रु हैं इसलिए आज तू मेरे हाथों नहीं बचेगा,

वह कभी भगवान को निर्लज्ज कहता कभी कायर तो कभी छलिया लेकिन भगवान वराह मुस्कुराते हुए पृथ्वी को रसातल से बाहर निकालकर समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया उधर राक्षस हिरण्याक्ष भगवान वराह को अपशब्द बोले जा रहा था तभी भगवान बोल पड़े कि मूर्ख दैत्य बातें ही करेगा कि युद्ध भी करेगा यह सुनकर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के ऊपर टूट पड़ा भगवान वराह और हिरण्याक्ष के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ गया दैत्य ने भगवान के ऊपर गदा त्रिशूल और तमाम प्रकार के दिव्य अस्त्रों से भगवान पर आक्रमण करने लगा अपनी माया का प्रयोग करके कभी हड्डियों की वर्षा कराता तो कभी रक्त की वर्षा कभी गायब हो जाता तो कभी प्रगट हो जाता,

लेकिन भगवान विष्णु कहां विचलित होने वाले वें उस राक्षस की सभी माया को काट देते जब भगवान विष्णु उस राक्षस को बहुत देर तक छकाते रहे तो उन्होंने उस राक्षस की कनपटी पर एक जोर से लात मारी जिससे उसकी आंखें बाहर निकल आई और वह निश्तेज होकर पृथ्वी पर पहाड़ के समान जा गिरा और भगवान वराह ने उसका वध कर दिया हिरण्याक्ष पर विजय प्राप्त करते ही भगवान वराह ने एक जोरदार गर्जना की जिससे तीनों लोक कांप उठे,

हिरण्याक्ष के बध से खुश सभी देवी देवताओं ने भगवान वराह पर फूलों की वर्षा प्रारंभ कर दी,

तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी हमें कमेंट में जरूर बताये धन्यवाद 

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