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देवर्षि नारद ने उत्पन्न किए थे 50 पुत्र।

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नमस्कार दोस्तों
              एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा कि " प्रभु आपकी यह कैसी माया है जो समस्त संसार को मोहित कर देती है। कृपया कर इसका रहस्य मुझे बताएं। तब श्री हरि ने नारद की बात काटते हुए कहा कि " मुनिवर माया से आपका क्या काम है या तो सांसारिक मोह में फंसे मनुष्यों के लिए है। आप कुछ और वर मांग लो, लेकिन नारद जी भी हठी ठहरे, वें बार-बार प्रभु से माया दिखाने की जिद करने लगे। तब श्री हरि विष्णु ने उनकी बात स्वीकार कर ली और जैसे ही श्रीहरि ने नारद की उंगली पकड़ी अगले ही क्षण में दोनों श्वेतदीप नामक स्थान पर पहुंच चुके थे।

वहां विष्णु जी ने बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया हुआ था। तब श्री हरि विष्णु ने नारद से कहा कि नारद यह स्थान तीर्थस्थानों जैसा ही उत्तम माना गया है। इस नगर में प्रवेश करने से पहले स्नान कर लेना चाहिए। यह कहकर प्रभु सरोवर में स्नान करके शीघ्र ही वापस आ गये। तत्पश्चात नारद जी स्नान करने गए और जैसे ही उन्होंने सरोवर मे डुबकी लगाई तो उनका रूप दिव्यकन्या में बदल चुका था और प्रभु भी वहां से गायब हो चुके थे। अब कन्या रूपी नारद जी, कुछ समझ पाते कि तभी वहां राजा तालध्वज आ पहुंचे और सुंदर कन्या को देखकर बोले कि " हे सुंदरी तुम कौन हो कहां से आई हो,

यह सुनकर कन्या बोली कि " हे भूपति मेरा इस संसार मे कोई सगा संबंधी नहीं है। अब आप ही मेरा आश्रय हैं तब राजा तालध्वज उसे अपने महल ले और उससे विवाह कर लिया। कुछ समय पश्चात वह कन्या गर्भवती हुई और समय पूरा होने पर उसने एक तुंबी मतलब लोकी को जन्म दिया जिसने 50 दिव्य रूपी बालक थे। उन सभी बालकों को एक बहुत बड़े कुंड में डाल दिया गया जो कि घी से भरा हुआ था। ऐसा करते ही वह बालक तत्काल ही युवा अवस्था को प्राप्त हो गए।

फिर उनकी भी संतानें हुईं और माया के प्रभाव से इसी प्रकार उनकी संख्या बढ़ने लगी और कुछ ही दिनों में रानी के पुत्र और नाती पोतों की भी संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई। संख्या ज्यादा होने के कारण उन सब में सिंहासन को लेकर विवाद हो गया जो कि इतना हिंसक हो गया कि वह आपस में ही लड़ कर मरने लगे। अपनी आंखों के सामने अपने वंश का विनाश होते दे। राजा और रानी बहुत दुखी हुए। तभी वहां एक ब्राह्मण अपने दो शिष्यों के साथ आता है और शोकाकुल राजा रानी से मिलकर उन्हें समझाते हुए कहता है कि तुम सब व्यर्थ मे शोक कर रहे हो।

यह सब श्री हरि विष्णु की माया है। प्रभु की माया तो ऐसी है कि सैकड़ों, चक्रवर्ती राजा और हजारों इंद्र उसी तरह नष्ट हो जाते हैं। जैसे दीपक को तेज हवा बुझा देती है। विष्णु माया के ही प्रभाव से समस्त संसार के जीव चाहे पशु पक्षी हो या कोई मनुष्य सभी आसक्त होकर रोते गाते हैं इतना कहकर ब्राह्मण रानी का हाथ पकड़कर कहता है कि नारद जी यह विष्णु माया है जो स्वयं श्री हरि द्वारा निर्मित थी। अब तुमने  विष्णु माया देख ली है। अब स्नान करके अपने मृत पुत्र पात्रों को अर्ध्य देकर अपना कर्तव्य पूरा करो।
इतना कहकर श्रीहरि ने नारद को उसी सरोवर में स्नान कराया जिसमें स्नान करके वें कन्या बने दिया था दोबारा स्नान करने से वें अपने वास्तविक रूप में वापस आ गए, जिसे देख राजा भी आश्चर्यचकित रह गया तभी श्री हरि विष्णु ने वापस नारद की उंगली पकड़ी और अगले ही क्षण प्रभु और नारद बैकुंठ धाम में वापस आ गए। बैकुंठ धाम वापस आकर भगवान विष्णु नारद जी से बोले कि मुनिवार मेरी माया कष्ट दाई होती है। बांधने वाली होती है अतः इसीलिए मैंने ऋषि-मुनियों को इससे मुक्त रखा हुआ है। कैसी लगी आपको मेरी माया,
नारद जी प्रभु को कोई उत्तर ना दे पाए और नारायण नारायण का जाप करते हुए बैकुंठ धाम से चलते बने।

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