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द्रोपती के पूर्वजन्म की कथा

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नमस्कार
             दोस्तों द्रोपती के पूर्वजन्म की कथा का वर्णन महाभारत में भी हैं और भविष्यपुराण में भी, आज मै आपको दोनों कथाओं के बारे में बताऊंगा,

भविष्यपुराण के अनुसार :-
                    यह उस समय की घटना हैं, ज़ब पांडव कौरव से जुएं में अपना सारा राजपाट हार जाते हैं, और मृगचर्म धारण करके वन जा रहे होते हैं, तब नगर के श्रेष्ठ लोग भी उनके साथ चल पड़ते हैं, जिसे देख युधिष्ठिर सोच में पड़ जाते हैं कि निर्जन वन में खुद के भोजन कि व्यवस्था करना ही बड़े मुश्किल का कार्य हैं, फिर मै इन सभी श्रेष्ठ लोगों को भोजन कैसे कराऊंगा, यही सोचते हुए युधिष्ठिर मुनि मैत्रेय के पास जाते हैं और सारी व्यथा सुनते हैं, जिसे सुन मुनि मैत्रेय कहते हैं कि धर्मराज मै आपको एक प्राचीन बात बताता हूँ जोकि मैंने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा था ध्यान से सुनो,

किसी समय में एक तपोवन में एक दरिद्रा ब्रम्हाणी रहती थी, वह इस दशा में भी प्रतिदिन श्रेष्ठजनो का पूजन किया करती थी, एक बार ऋषि वशिष्ठ उसकी कुटीया में पहुंचे, ब्रम्हाणी ने उनका भी स्वागत सत्कार किया, ब्राम्हणी कि निश्वार्थ श्रद्धा देखकर ऋषि वशिष्ठ अत्यंत प्रसन्न हुए, और वर मांगने के लिए कहा, तब ब्रम्हाणी ने कहा कि हे मुनि मुझे कोई ऐसी विधि बताने कि कृपा करें जिससे मै पति कि प्रिय, पुत्रवती, सौभाग्यवती, धनाढ्य और इस संसार में प्रशंसा कि योग्य बन जाऊ,

तब वशिष्ठ ने कहा कि हे सुब्रते तुम मिट्टी कि हांडी में मूंग और चावल से बने पदार्थ भरकर चन्दन से चर्चित करके जलपात्र और घी का पात्र रखे, पुष्प, दीप, नैवेघ से उसका पूजन करे और उस पात्र को श्रेष्ठ पुरुष को दान कर दें, यह दान रविवार, संक्राति, चतुर्थी, अष्ट्मी, एकादशी और तृतीया को करना चाहिये, ऐसा करने से तुम्हे वह सब प्राप्त होगा जैसा तुम चाहती हो, ऋषि वशिष्ठ कि बात मानकर वह ब्रम्हाणी रोज स्थालीपात्र दान करने लगी,

अतः हे पार्थ उसी पुण्य के प्रभाव से वही ब्रम्हाणी द्रोपती के रूप में इस जन्म में तुम्हारी पत्नी हुई हैं, और दान देने में द्रोपती का हाथ कभी खाली नहीं रहेगा, क्योंकि यह द्रोपती सती, शची, स्वाहा, सावित्री, अरुंधती, और लक्ष्मी के रूप में जहाँ भी रहती हैं वहाँ कौन सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता हैं, अगर यह द्रोपती अपनी स्थाली से अन्न दान दें तो सम्पूर्ण जगत को तृप्त करा सकती हैं फिर आप इन थोड़े श्रेष्ठ नगरवासियों कि क्यों चिंता करते हो,

महाभारत के अनुसार :-
           एक अन्य कथा जोकि महाभारत के आदिपर्व में उल्लेखित हैं, जिसमे व्यास जी बताते हैं कि द्रोपती पूर्वजन्म में एक ऋषि कन्या थी जिसके श्रेष्ठ कर्मो के अनुसार उसे कोई अपनी पत्नी स्वीकार नहीं कर रहा था, तब उसने भगवान कि घोर तपस्या शुरु कर दी,

जिससे प्रसन्न भोलेनाथ ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा, तब वह कन्या बोली कि" हे प्रभु मै सर्वगुण संपन्न पति चाहती हूँ,
1 :- मुझे ऐसा पति चाहिये जो धर्म कि रह पर चलता हो,
2 :- मुझे ऐसा पति चाहिये जोकि हनुमान जी जैसा शक्तिशाली हो,
3 :- मुझे ऐसा पति चाहिये जो विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी हो,
4 :- ऐसा पति चाहिये जो पुरे संसार में सबसे सुन्दर हो,
5 :- आप मुझे ऐसा पति दो जो सबसे ज्यादा सहनशील हो,

यह सुनकर शिवजी ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए, अब उस कन्या ने अनजाने में पांच बार पति का वरदान माँगा था इसलिए उसने द्रोपती के रूप में जन्म लिया और पांडवों कि पत्नी बनी,

तो दोस्तों कथा कैसी लगी कमेंट करके अवश्य बतायें, धन्यवाद 

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