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चोर ब्राह्मण कैसे बना धन का देवता कुबेर।

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नमस्कार दोस्तों
                     कुबेर के जन्म से संबंधित दो कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा जो कि जनश्रुतियों में प्रचलित है जबकि दूसरी कथा का वर्णन श्री वराह पुराण में मिलता है।

पहली कथानुसार :-
               प्राचीनकाल में गुणनिधि नामक ब्राम्हण हुआ जो कि सभी वेद शास्त्रों का ज्ञाता था। यह बहुत ही धार्मिक प्रवृति के थे। धर्म कर्म में विश्वास रखने वाले थे। लेकिन कहा गया है कि संगत से गुण होत है। संगत से गुण जात यही हुआ गुणनिधि के साथ बुरी संगत के कारण उनके अच्छे गुण समाप्त हो गये और गुड़निधि अव्वल दर्जे के जुवाड़ी और चोर बन गए। और धीरे-धीरे अपनी सारी संपत्ति जुए में हार गए। गुणनिधि की माता को पता था कि गुणनिधि बुरी संगत में फंस गया है लेकिन पुत्र मोह के कारण मैं गुणनिधि के पिता से समय रहते ना बता सकी।

नतीजा यह हुआ कि गुणनिधि का संपन्न परिवार भिक्षा मांगकर खाने लगा और गुणनिधि के पिता घर छोड़कर वन में चले गए। सारा परिवार भोजन के लिए दर बदर की ठोकरें खाने लगा। एक दिन जब गुणनिधि भोजन की तलाश में निकला तो उसे किसी ने भोजन नहीं दिया। अतः भूख से व्याकुल गुणनिधि जंगल की ओर निकल पड़ा। रास्ते में उसे कुछ ब्राह्मण दिखे जो कि भगवान को भोग लगाने के लिए सामग्री ले जा रहे थे, जिसे देख गुणनिधि की भूख और प्रबल हो गई।

अतः गुणनिधि उन ब्राह्मणों के पीछे पीछे भगवान शिव के मंदिर आ पहुंचा और जब ब्राह्मण शिव जी को भोग लगाकर भजन कीर्तन करने लगे तो गुणनिधि भोजन चुराने के उद्देश्य से वहीं बैठ गया। जब भजन कीर्तन समाप्त करके सभी ब्राह्मण सो गए तो सही समय जानकर भगवान शिव पर चढ़ाया प्रसाद लेकर भागने लगा, लेकिन तभी एक ब्राह्मण ने गुणनिधि को मंदिर से बाहर भागते देख लिया और चोर चोर कहकर चिल्लाने लगा,

जिसे सुनकर नगर रक्षकों ने उसपर बाण चला दिया। इससे गुणनिधि की मृत्यु हो गई। माना जाता है कि जिस रात गुणनिधि ने भोग सामग्री चुराई थी, वह रात शिवरात्रि थी। अनजाने में ही सही उसने शिवरात्रि के व्रत का पालन किया था। अब भोलेनाथ तो भोलेनाथ चेहरे उनका व्रत खाली कैसे जा सकता है। अतः भोलेनाथ की कृपा से गुणनिधि अगले जन्म में कलिंग का राजा बना और महान शिव भक्त भी भगवान में अटूट विश्वास होने के कारण भगवान शिव ने उसे धन का स्वामी और देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया जो कि कुबेर नाम से प्रसिद्ध हुए, इस तरह एक चोर और जुवाडी ब्राम्हण भोलेनाथ की कृपा से धन का देवता बन गया।

दूसरी कथानुसार :-
                  जोकि वराह पुराण में पाई जाती है जिसमें बताया गया है कि कुबेर पहले मात्र वायु के ही रूप में थे। परमपिता ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने शरीर धारण किया था यह बात उस समय की है, जब परम पिता ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे। तभी अचानक उनके मुख से तेज वायु निकली। वह वायु तेजी से चारों तरफ बहने लगी। तेज हवाओं के कारण चारों तरफ धूल ही धूल फैलने लगी।

तब परमपिता ब्रह्मा जी ने उस वायु को शांत करने के लिए शरीर धारण करने के लिए कहा। अतः ब्रह्मा जी के आदेशानुसार वह वायु शरीर धारण करके ब्रह्माजी के सामने आती है। जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उसे कुबेर नाम देते हैं और धन ऐश्वर्य का देवता बनने का वरदान भी देते हैं।

दोस्तों कुबेर के बारे में प्रचलित है कि उनके तीन पैर और 8 दांत हैं। शतपथ ब्राह्मण में इन्हें राक्षस बताया गया है और रावण के ही कुल गोत्र कहे गए हैं।

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