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रावण के पूर्वजन्म की कथा,

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नमस्कार दोस्तों
           क्या आप जानते हैं कि रावण राक्षस योनि मे जन्म लेने से पहले क्या था, किस कारणवश उसे राक्षस योनि मे जन्म लेना पड़ा, राक्षसयोनि मे जन्म लेने से पहले रावण वैकुण्ठ धाम मे रहा करता था, लेकिन एक भूल के कारण उसे श्राप मिला, जिसके कारण उसे तीन बार राक्षसयोनि मे जन्म लेना पड़ा, आइये जानते हैं इस कथा के बारे मे थोड़ा विस्तार से...?

       दोस्तों सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार मतलब सनकादि मुनि जोकि भगवान विष्णु के ही अवतार थे, जिनकी आयु हमेशा पांच वर्ष कि ही रहती हैं, और सदैव हरिभजन करते हुए ब्रम्हांड मे घुमते रहते हैं, एक दिन चारों कुमार ब्रम्हांड मे विचरण कर रहें थे कि उन्हें श्री हरि विष्णु के दर्शन कि लालसा उठी, और चारों सनकादि मुनि वैकुण्ठधाम कि ओर निकल पड़े, ज़ब चारों कुमार वैकुण्ठधाम पहुचे तो वहा का सौंदर्य देखकर वें आश्चर्यचकित रह गए,

ज़ब सनकादि मुनि छठवें मण्डपद्वार को पार करके जैसे ही सातवें मण्डपद्वार पर पहुचे और अंदर जाने लगे तो वहाँ उपस्थित जय और विजय नामक दो द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया यह कहकर कि यह कोई बच्चों के घूमने का स्थान नहीं हैं, तुम कही और जाओं, अब जैसा कि आप जानते हैं कि सनकादि मुनि कि आयु हमेशा पांच वर्ष की ही रहती हैं न ही घटती हैं और न ही बढ़ती हैं, अतः चारों कुमारों ने बहुत समझाया लेकिन ज़ब द्वारपाल नहीं माने, तो उन चारों कुमारो को बड़ा क्रोध आया क्योंकि किसी कि वास्तविकता उसकी उम्र या वेश भूषा से नहीं जानी जा सकती।

 अतः उन चारों कुमारों ने जय और विजय से कहा कि तुम वैकुण्ठ धाम के द्वारपाल होकर भी तुम्हारा स्वभाव सर्प के जैसा हैं, जो केवल विष ही उगलता हैं, अतः तुम वैकुण्ठ धाम मे रहने लायक नहीं हो, इसलिए तुम्हारा पतन हो जायेगा, हालाकिं चारों कुमार तत्वज्ञानी थे लेकिन उनका क्रोधित होना मात्र प्रभु कि इच्छा और संयोग था, अब अपने द्वारपालों पर संकट आया देख श्री हरी विष्णु जी तुरंत वहाँ पहुचे और चारों कुमारों को शांत कराते हुए बोले कि मुनिवर इन द्वारपालों कि तरफ से मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ,

और द्वारपाल जय और विजय से बोले कि हे द्वारपालों तुम्हे यह श्राप मेरी इच्छा से प्राप्त हुआ हैं, और यही तुम्हारी परीक्षा हैं, अगली तीन जन्मों तक तुम दोनों राक्षसयोनि मे जन्म लोगे, और हर बार तुम्हारा उद्धार करने के लिए मैं भी अवतरित होऊंगा, और तुम दोनों को मुक्ति प्रदान करूँगा,

इसी श्राप के कारण जय और विजय ने पहला जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु के रूप मे लिया, तब भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध वराहरूप मे किया और हिरण्यकश्यपु का वध नरसिंघ अवतार लेकर किया, और दूसरा जन्म रावण और कुम्भकरण के रूप लिया, तो श्री हरि विष्णु ने उनका उद्धार करने के लिए पुरुषोत्तम श्री राम के रूप मे अवतरित हुए और उन्हें मुक्ति प्रदान की, और तीसरे और अंतिम जन्म मे दोनों शिशुपाल और दन्तवक्र के रूप मे जन्मे तब परम् दयालु विष्णु जी ने उनका उद्धार लीलाधर कृष्ण के रूप मे अवतरित होकर किया, 

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