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भीष्म को वाणों की सैय्या पर क्यों लेटना पड़ा,

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भीष्म
नमस्कार दोस्तों
                    पितामह भीष्म महाभारत के एक ऐसे पात्र जो कि अपने ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा और बाहुबल के लिए विख्यात थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन राज्य की सेवा में समर्पित कर दिया, जबकि वह चाहते तो राज गद्दी पर बैठ सकते थे। लेकिन उन्होंने जीवन पर्यंत अपने वचन का पालन किया। लेकिन फिर भी उन्हें बाणों की शैया पर लेटना पड़ा। आखिर क्यों...?

कथानुसार :-
        जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजेता बने तो सभी पांडव कृष्ण सहित भीष्म से आशीर्वाद लेने वहां पहुंचे जहां पर पितामह बाणों की शैया पर लेटे हुए थे। और जब सभी पितामह भीष्म से मिलकर लौटने लगे तो पितामह भीष्म ने भगवान कृष्ण को रोक लिया और बाकी सभी को वहां से जाने का आदेश दिया। पितामह ने श्री कृष्ण को पास बुलाया और बोले कि " हे मधुसूदन आप तो सर्वव्यापी हैं। आप ही सृष्टि के पालनकर्ता है। कृपया कर बताएं कि मैं अपने कौन से कर्म के कारण इस प्रकार बाणों की शैया पर असहाय कष्ट भोग रहा हूं।

जिसे सुन भगवान श्रीकृष्ण बोले कि " हे पितामह आप तो खुद ज्ञानी है। क्या आपको अपने पूर्व जन्म के कर्म याद नहीं है तब भीष्म बोले कि " मुझे अपने पिछले 100 जन्मों के कर्म याद है जिसमें मैंने कभी भी कोई बुरा कर्म नहीं किया, तब श्री कृष्ण कहते हैं कि " हे पितामह आप बिल्कुल सही कह रहे हैं लेकिन क्या आपको अपना 101वां जन्म याद है जिसे सुनकर भीष्म बड़े आश्चर्यचकित हुए क्योंकि उन्हें सौ जन्म के कर्म याद थे तो कैसे उन्हें अपना 101वां जन्म याद नहीं, तब भीष्म बोले कि " हे मधुसूदन कृपा कर मुझे बताएं कि 101वें जन्मे मैंने कौन सा घृणित कार्य किया था। जिस कारण मेरी यह दुर्दशा हुई,

तब श्रीकृष्ण बोले की " ध्यान से सुनो पितामह आप 101 में जन्म में भी एक राजकुमार थे और आपको शिकार खेलने का बड़ा शौक था। एक बार आप एक जंगल से गुजर रहे थे तो एक पेड़ की छांव में आप विश्राम करने के लिए रुके और कुछ समय बाद जब आप चलने के लिए तैयार हुए तो ऊपर से एक करकटा मतलब कई पैर वाला जानवर आपके घोड़े की गर्दन पर गिरा जिसे आपने अपने तीनों से उठाकर पीछे फेंक दिया और वहां से चले गए।

लेकिन जब आपने उस करकटा को पीछे फेंका तो तो वह करकटा पीठ के बल बेर की कटीली झाड़ियों में जा गिरा और बेर के अनगिनत कांटे उसकी पीठ में धंस गए, वह करकटा उस कटीली झाड़ियों से जितना भी निकलने की कोशिश करता, वह काटे उसे उतना ही ज्यादा कष्ट देते। वह करकटा 18 दिनों तक उसी अवस्था में जीवित रहा और वह रात दिन ईश्वर से यही प्रार्थना करता रहा कि जिस प्रकार तड़प तड़प पर मैं मृत्यु को प्राप्त कर रहा हूं, ठीक उसी प्रकार तुम्हारी भी मृत्यु हो।

लेकिन उस जन्म में आपके पुण्य कर्म इतने प्रबल थे कि वह पाप फलित ही नहीं हो पाया। यह सुनकर पितामह ने सवाल किया कि " मधुसूदन अगर वह पाप उस जन्म में फलित नहीं हुआ तो इस जन्म में क्यों हुआ, यह सुन श्री कृष्ण बोले कि " पितामह जब दुर्योधन ने भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण करवाया था, तब यदि आप चाहते तो उसे रोक सकते थे, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। जिस कारण आपका सारा पुण्य क्षीण हो गया और 101 वें जन्म के पाप को फलित होने का मौका मिल गया। क्योंकि कर्म का फल कभी ना कभी तो मिलता ही है।

महाभारत का युद्ध 18 दिन तक चला था जिसमें से 10 दिन तक पितामह भीष्म ने युद्ध किया। पितामह के युद्ध कौशल से परेशान पांडवों को स्वयं भीष्म ने अपनी मृत्यु का उपाय बताया था।
भीष्म पितामह 58 दिन तक बाणों की शैया पर रहे लेकिन इच्छा मृत्यु का वरदान होने के कारण उन्होंने अपने प्राण नहीं त्यागे और सूर्य के उत्तरायण होनेेेे पर तथा मकर संक्रांति के दिन अपनी इच्छानुसार उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे।

माना जाता है कि जिस समय महाभारत का युद्ध चल रहा था उस समय अर्जुन की आयु 55 वर्ष श्री कृष्ण की आयु 83 वर्ष और पितामह भीष्म की आयु 150 वर्ष के लगभग थी, 

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