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देवराज इंद्र का गुरु एक राक्षस था, पौराणिक कथा

devtaon me raja indra
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प्राचीन काल में दैत्यराज पहलाद हुये, जिन्होंने अपने शील के सहारे इंद्र का राज्य ले लिया और तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया, तब इंद्र बृहस्पति जी के पास जाते हैं और उनसे फिर से ऐश्वर्य प्राप्ति का उपाय पूछते हैं, तब बृहस्पति जी इंद्र को शुक्र के पास जाने की सलाह देते हैं, और जब इंद्र शुक्राचार्य के पास जाते हैं तो शुक्राचार्य कहते हैं कि "इसका विशेष ज्ञान आपको पहलाद ही बता सकता है, तब खुश होकर इंद्र ब्राह्मण का वेश बनाते हैं और पहलाद के पास जाकर कहते हैं कि" राजन में श्रेय प्राप्ति का उपाय जानना चाहता हूं आप मुझे बताने का कष्ट करें,

तब पहलाद कहता है कि "ब्राह्मण अभी तो मेरे पास समय नहीं है अतः इसके बारे में मैं आपको बाद में उपदेश दूंगा, तब इंद्र रूपी ब्राह्मण कहता है कि "ठीक है महाराज आपको जब समय मिलेगा मैं आप से उपदेश लेना चाहता हूं, अतः इंद्र रूपी ब्राह्मण प्रहलाद की सेवा में लग गया, एक दिन ब्राम्हण ने सवाल किया कि" राजन तीनों लोकों का उत्तम लोक आपको कैसे प्राप्त हुआ बताने का कष्ट करें, तब प्रहलाद ने कहा कि " सुनो मैं राजा हूं लेकिन मुझे इसका तनिक भी अभिमान नहीं है, मैं किसी का भी दोष नहीं देखता, धर्म में मन लगाता हूं, क्रोध को जीतकर मन को काबू में रख कर इंद्रियों को भी सदा काबू में रखता हूं, अपने से बड़े और गुरुजनों का आदर करता हूं, उनकी बातें सुनता हूं और वैसा ही आचरण करता हूं, इसलिए जैसे चंद्रमा नक्षत्रों पर शासन करता है वैसे ही मैं भी तीनों लोकों पर राज करता हूं, शुक्राचार्य का नीतिशास्त्र ही इस भूमंडल का अमृत है और यही मेरी श्रेय प्राप्ति का उपाय है,

उपदेश पाकर भी वह ब्राम्हण प्रहलाद की सेवा में लगा रहा, जिससे प्रसन्न पहलाद ने एक दिन कहा कि" सुनो ब्राह्मण तुमने मेरी गुरु के समान सेवा की है अतः तुम्हारी जो इच्छा है मांग लो मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा, तब ब्राह्मण प्रसन्न होकर बोला कि" महाराज यदि आप सचमुच मुझ पर प्रसन्न है तो मुझे आपका ही शील ग्रहण करने की इच्छा है, इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए, यह सुनकर पहलाद समझ गया कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं है लेकिन फिर भी वरदान दे दिया, वरदान पाकर ब्राह्मण वेषधारी इंद्र तो चले गए, लेकिन प्रहलाद को बड़ी चिंता हुई कि अब क्या करना चाहिए,

 वह सोच ही रहे थे कि तभी उनके शरीर से एक तेज प्रकट हुआ, जिसे देख पहलाद ने पूछा तुम कौन हो उत्तर मिला कि" मैं शील हूं तुमने मेरा त्याग कर दिया इसलिए मैं जा रहा हूं, यह कहकर वह अदृश्य हो गया और जाकर इंद्र में समा गया, इधर सील के अदृश्य होते ही पहलाद के शरीर से एक दूसरा तेज प्रकट हुआ, तब पहलाद ने उससे भी पूछा कि" तुम कौन हो, उसने जवाब दिया कि "मैं धर्म हूँ जहां सील नहीं वहां मैं भी नहीं रह सकता, यह कहकर हुआ तेज भी अदृश्य हो गया, तभी तीसरा तेज प्रकट हुआ उससे भी पहलाद ने पूछा कि " तुम कौन हो, उसने जवाब दिया कि "मैं सत्य हूं और धर्म के पीछे जा रहा हूं,

 सत्य के जाने के बाद एक महाबली तेज प्रकट हुआ, पूछने पर उसने कहा कि" मैं सदाचार हूं जहां सत्य का वास होता है वहीं पर मैं भी जा रहा हूं अन्यत्र कहीं नहीं, यह कहकर वह भी चला गया इसके बाद एक महाकाल तेज प्रकट हुआ, तब पहलाद ने उससे भी पूछा कि "भाई आप कौन हो, तो वह बोला कि "मैं बल हूं जहां सदाचार गया है वहां मैं भी जा रहा हूं वह भी चला गया, इन सबके बाद पहलाद के शरीर से एक प्रभामई देवी प्रकट हुई, पहलाद के पूछने पर उन्होंने बताया कि "मैं लक्ष्मी हूं तुमने मेरा त्याग कर दिया है इसलिए मैं यहां से जा रही हूं, क्योंकि जहां शील, सदाचार और धर्म रहता है वहीं मेरा भी वास होता है, तब पहलाद ने पूछा कि " देवी सभी मुझे छोड़ कर चले गए, लेकिन किसी ने नहीं बताया कि मैं कहां जा रहा हूं, कम से कम आप ही बता दीजिए आप कहां और किसके पास जा रही हैं

 तब लक्ष्मी जी बोली कि हे दैत्यराज तुमने जिसे उपदेश दिया था, असल मे वह ब्राम्हण रूप में साक्षात इंद्र थे,  हे धर्मात्मा तुमने शील के द्वारा ही तीनों लोकों पर विजय पाई थी, जिसे जानकर इंद्र वे तुम्हारे शील का अपहरण कर लिया, धर्म, सत्य, सदाचार, बल और स्वयं मै लक्ष्मी सभी शील के ही आधार पर रहते हैं, सील ही सब की जड़ है यह कहकर सत्य, शील, सदाचार, धर्म और लक्ष्मी सभी देवराज इंद्र के पास चले गए, और देवराज इंद्र को फिर से तीनों लोगों का राज्य प्राप्त हो गया

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