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भगवान कृष्ण को दुर्वासा ने श्राप क्यों दिया..? पौराणिक कथा

 

दुर्वासा

नमस्कार दोस्तों

महर्षि दुर्वासा जो कि भगवान शिव के रूद्र अवतार के अंश थे इसलिए उनका क्रोधी स्वभाव का होना स्वाभाविक था, देव हो या दानव कोई भी उनके श्राप से अछूता नहीं हैं, और एक समय ऐसा भी आया जब दुर्वासा ने स्वयं कृष्ण को भी श्राप दे डाला, अब कृष्ण तो कृष्ण ठहरे मुस्कुराते हुए उन्होंने श्राप स्वीकार भी कर लिया, 

पौराणिक कथाओं के अनुसार :-

        जब भगवान कृष्ण ने रुक्मणी का हरण करके उनसे विवाह कर लिया तो उनके मन में विचार आया कि क्यों ना अपने कुल गुरु महर्षि दुर्वासा का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया जाए, इसी उद्देश्य से भगवान कृष्ण रुक्मणी को साथ लेकर दुर्वासा के आश्रम गए और महर्षि को महल में आकर भोजन ग्रहण करके आशीर्वाद देने का निवेदन किया, तो दुर्वासा मुनि ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया, लेकिन साथ में शर्त भी रख दी कि " मैं जिस रथ से चलूंगा उस रथ को आप दोनों ही खींचगे घोड़े नहीं,

तब भगवान कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उनकी शर्त मान ली और दोनों घोड़ों को रथ से निकाल कर स्वयं और रुकमणी देवी रथ से जुत गए, वह रथ जिस भी गांव नगर से गुजरता लोग देखकर हैरान रह जाते कहते कि " देखो प्रभु की लीला जो स्वयं तीनों लोकों के पालनकर्ता है आज कैसे घोड़े की तरह रथ में जुते हुए हैं, काफी दूर आने के बाद देवी रुक्मणी को प्यास लगी तब देवी रुक्मणी की प्यास बुझाने के लिए भगवान कृष्ण ने पृथ्वी पर पैर का अंगूठा मारा जिससे वहां गंगाजल की धार उत्पन्न हो गई, तब देवी रुक्मणी और कृष्ण ने अपनी प्यास बुझाई,

लेकिन जैसे ही रथ आगे ले जाने लगे तो क्रोधित दुर्वासा मुनि ने रथ को रोकने का आदेश दिया और बोले " कि तुम दोनों ने अपनी प्यास तो बुझा ली, लेकिन मुझसे जल के लिए पूछना भी उचित नहीं समझा, तुमने मेरा अपमान किया है इसलिए मैं तुम दोनों को श्राप देता हूं, कि तुम दोनों को 12 वर्ष का वियोग सहन करना पड़ेगा और जिस जगह गंगा उत्पन्न हुई है वह स्थान बंजर हो जाएगा, तब 12 साल तक रुकमणी देवी ने भगवान विष्णु की तपस्या में बताएं, जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें श्राप से मुक्त किया, इसी श्राप के कारण यहां का पानी आज तक खारा है,

और यही वजह है कि माता रुक्मणी को द्वारिकाधीश मंदिर में भी जगह नहीं मिली और आज भी द्वारिकाधीश मंदिर के 2 किलोमीटर दूर रुकमणी जी का मंदिर साक्षात प्रमाण है इस घटना का, जोकि 12 वीं सदी का बना हुआ है, इस मंदिर में आज भी जल दान की रस्म निभाई जाती है, ताकि पितरों को जल की प्राप्ति हो और उन्हें मुक्ति मिल जाए और आज भी रुकमणी देवी के मंदिर आने वाले सभी भक्तों को यह कथा सुनाई जाती है मंदिर के पुजारियों द्वारा...? 

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