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ब्रम्हर्षि उत्तंग को पेशाब पीने को क्यों कहा देवराज इंद्र ने..?


 नमस्कार दोस्तों

            मनुष्य को बड़ी सफलता या बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने के लिए उतना ही बड़ा त्याग करना पड़ता है ऐसी ही एक कथा महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में मिलती है जिसमे उत्तंग ऋषि को देवराज इंद्र पेशाब पीने के लिए कहते हैं,

पौराणिक कथा :- 

        यह कथा उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया और समस्त राज्य का कार्यभार युधिष्ठिर ने संभाल लिया तब श्री कृष्ण द्वारिका नगरी की ओर प्रस्थान करते हैं लेकिन मारवाड़ देश मे उन्हें उत्तंग ऋषि मिलते हैं जहां पर श्री कृष्ण थोड़ा विश्राम करते हैं और उत्तंग ऋषि को आध्यात्मिकता का उपदेश देते हैं, जिसे सुनकर उत्तंग ऋषि कहते हैं कि " हे मधुसूदन यदि मैं आपकी कृपा प्राप्त करने का थोड़ा सा भी अधिकारी हूं तो आप मुझे अपना विराट ईश्वरीय रूप दिखा दीजिए मुझे उसे देखने की बड़ी प्रबलता है,

तब प्रसन्न श्री कृष्ण ने उन्हें अपने विराट रूप के दर्शन कराए जो हजारों सूर्य की भांति तेजस्वी था, बड़ी-बड़ी भुजाओं वाला था जो पूरा आकाश ढक कर खड़ा हुआ था, परमात्मा के वैष्णव रूप को देखकर उत्तंग ऋषि बड़े आश्चर्यचकित हुए और स्तुति करते हुए बोले कि " प्रभु अब आप इस अविनाशी स्वरूप को समेट लें और पूर्व रूप धारण करें, तब श्री कृष्णा अपना विराट रूप समेटकर बोले " मुनि आप मुझसे कोई वर मांगिये, जिसे सुनकर उत्तंग ऋषि कहते हैं " प्रभु आपके विराट रूप का दर्शन करके मैं धन्य हो गया यही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान है मुझे और कुछ नहीं चाहिए,

तब श्री कृष्ण कहते हैं कि " मुनि मेरा दर्शन अमोघ है आपको बिना किसी विचार के मुझसे वरदान मांगना ही चाहिए,  जिसे सुनकर उत्तंग ऋषि कहते हैं कि " प्रभु यदि ऐसा है तो आप मुझे वरदान दीजिए कि मुझे यहां यथेष्ट जल प्राप्त हो सके, क्योंकि इस मरुभूमि में जल मिलना बड़ा ही दुर्लभ है, तब श्रीकृष्ण कहते हैं " महर्षि आपको जब भी जल की आवश्यकता हो तो आप मुझे सिर्फ स्मरण करिएगा, ऐसा कहकर श्री कृष्ण द्वारिका की ओर निकल पड़े,

इस घटना के पश्चात एक दिन जब उत्तंग ऋषि कहीं जा रहे थे तो उन्हें बड़ी जोरों की प्यास लगी, अतः वें पानी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे घूमते घूमते उन्हें श्री कृष्ण का वरदान याद आया तो उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया, श्रीकृष्ण का स्मरण करते ही ऋषि उत्तंग को एक चांडाल दिखाई पड़ा जो कीचड़ से सना हुआ था बिल्कुल मैला कुचैला कुत्तों से घिरा हुआ, तलवार लिए धनुष टाँगे जो अत्यंत भयानक दिख रहा था, जोकि मूत्रविसर्जन कर रहा था, अतः जब उस चांडाल ने महर्षि को देखा तो उन्हें प्यासा जानकर हंसते हुए बोला " उत्तंग प्यासे दिखाई पड़ते हो आओ और यह जल ग्रहण करो तुम्हें प्यासा देख कर मुझे तुम पर बड़ी ही दया आ रही है,

चांडाल का ऐसा व्यवहार देखकर ऋषि उत्तंग को बड़ा क्रोध आया, उन्होंने वरदान देने वाले श्री कृष्ण को कठोर वचन कहे और साथ में चांडाल को भी बहुत बुरा भला कहा, जिसे सुनकर चांडाल तुरंत वहां से अंतर्ध्यान हो गया, यह सारी घटना देखकर ऋषि उत्तंग सोचने लगे कि " यह प्रभु की कैसी लीला है वह मेरे साथ धोखा कैसे कर सकते हैं, तभी वहां भगवान श्री कृष्ण प्रकट होते हैं जिन्हें देखकर ऋषि उत्तंग ने कहा " हे मधुसूदन ब्राह्मण के लिए चांडाल का मूत्रपान करना आपकी नजर में कैसे उचित था कृपया कर मुझे बताएं,

तब मुस्कुराते हुए मधुर वचनों से श्री कृष्ण कहते हैं " महर्षि वहां जैसा रूप धारण करके वह जल आपको देना चाहिए था उसी रूप में दिया गया, दुर्भाग्यवश आप उसे समझ ना सके क्योंकि सिर्फ आपके लिए ही मैंने इंद्र से कहा था कि " तुम उत्तंग ऋषि को जल के रूप में अमृत पिलाओ, तब इंद्र ने मुझे बार-बार कहा कि " मनुष्य अमर नहीं हो सकता यह अमृत सिर्फ देवताओं के लिए है इसलिए आप उत्तंग को अमृत ना देकर कोई और वरदान दे दीजिए, किंतु जब मैंने जोर देकर कहा तब इंद्र ने कहा कि " ठीक है प्रभु यदि भृग़ुनंदन को अमृत देना आवश्यक है तो मैं उन्हें अमृत अभी जा कर देता हूं, लेकिन अमृत तो मैं उन्हें चांडाल रूप में ही प्रदान करूंगा यदि उन्होंने ले लिया तो ठीक नहीं तो मैं वापस आ जाऊंगा,

इस प्रकार की शर्त रखकर साक्षात देवराज इंद्र चांडाल रूप में आपको अमृत पिलाने आए थे, लेकिन आपने उन्हें बुरा भला कह कर भगा दिया, अतः अब मैं आपकी प्यास शांत करने के लिए दूसरा वरदान देता हूं कि  " जब जब आपको पानी पीने की इच्छा होगी तब तब इस मरुभूमि के आकाश में जल भरे मेघों की घटा घिर आएगी वह मेघ आपको मीठा जल अर्पण करेंगे और वें उत्तंग मेघ के नाम से इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध होंगे, जिसे सुनकर उत्तंग मुनि बड़े प्रसन्न हुए, यही कारण है कि आज भी रेगिस्तान की भूमि पर उत्तंग नाम वाले मेघवर्षा करते हैं, इसीलिए कहा गया है कि जो जितनी बड़ी उपलब्धि हासिल करता है उसे उतनी ही बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, 

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