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माता सती का त्याग किया था शिव जी ने क्यों...?

 भगवान शिव ने क्यों त्याग दिया माता सती को..? 

शिव जी, माता सती, सीता माता

नमस्कार दोस्तों

अविश्वास और झूठ किसी भी रिश्ते को ज्यादा दिन टिकने नहीं देते, अंदर ही अंदर रिश्तो को खोखला कर देता है जिसे झूठ नामक हल्का हवा का झोंका भी ढहा देता है कुछ ऐसा ही हुआ भगवान शिव और सती के बीच में, माना जाता है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती ने आत्मदाह कर लिया था लेकिन अगर इस घटना का गहन अध्ययन करें और पौराणिक कथाओं से इसका संबंध देखें तो इस घटना की जिम्मेदार खुद माता सती थी, 

पौराणिक कथा के अनुसार :-

जब माता सीता का हरण रावण ने कर लिया, तब श्री राम और लक्ष्मण जी सीता जी की खोज में इधर-उधर भटकने लगे, रोते बिलखते पशु पक्षियों से पूछते दोनों भाई जंगलों और पहाड़ों में घूमने लगे, यह सारी घटना देवी सती और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर बैठे देख रहे थे, एक सवाल माता सती के मन में बार-बार उठ रहा था कि श्री राम जो कि विष्णु जी के अवतार हैं वें एक स्त्री के वियोग में जंगल में मारे मारे भटक रहे हैं ऐसा कैसे हो सकता है, वें चाहे तो रावण का विनाश क्षण मात्र में कर सकते हैं,

अतः जब माता सती से रहा न गया तो उन्होंने शिवजी से यह सवाल पूछ ही लिया, माता सती का सवाल सुनकर शिवजी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि " देवी इसमें कोई शंका नहीं कि श्री राम भगवान विष्णु के अवतार हैं लेकिन मृत्युलोक में उन्होंने एक मनुष्य रूप में अवतार लिया है अतः उन्हें साधारण मनुष्य की भाँति ही कष्ट उठाना पड़ेगा, तब सती जी कहती है कि " स्वामी भगवान विष्णु भले ही मनुष्य रूप में हों लेकिन उनके अंदर वह सभी शक्तियां और गुण तो होंगे ही तो भगवान विष्णु के पास हैं,

इसका उत्तर देते हुए शिव जी कहते हैं कि " देवी निश्चय ही श्रीराम के अंदर वें सारे गुण हैं जो स्वयं विष्णु जी के पास है लेकिन अगर उन्होंने उन शक्तियों का उपयोग इस मनुष्य तन में किया तो कौन उन्हें पुरुषोत्तम कहेगा, इसलिए वह इस समय सिर्फ साधारण मनुष्य बने हुए हैं, लेकिन माता सती भगवान शिव के इस जवाब से संतुष्ट ना हुई, क्योंकि उन्हें लगता था कि यदि श्री राम ने विष्णु जी की शक्ति और गुण होते तो वें निश्चित ही रावण का विनाश अब तक कर चुके होते, साधारण मनुष्य की भांति दर बदर की ठोकरें ना खाते, अतः माता सती ने श्री राम की परीक्षा लेने का निर्णय लिया,

और श्री राम की परीक्षा लेने की अनुमति शिवजी से मांगी, तब शिवजी उन्हें अपने आराध्य राम की परीक्षा लेने से मना कर देते हैं, लेकिन सती ने शिवजी को अनसुना कर दिया और सीता माता का रूप धारण करके सती उसी रास्ते पर बैठ गई जहां से राम और लक्ष्मण गुजरने वाले थे, अतः जब श्री राम और लक्ष्मण वहां पहुंचे तो पहले लक्ष्मण की नजर सीता रूपी माता सती पर पड़ी तो वें प्रसन्न हो गए, लेकिन जब प्रभु श्रीराम ने देखा तो उन्होंने सीता रूपी माता सती को पहचान लिया और प्रणाम करके बोले कि " माता शिवजी साथ हैं क्या..? या फिर आप अकेले ही विचरण करने निकली है,

अतः जब श्रीराम ने सती को पहचान लिया तो सती जी अपने वास्तविक रूप में आ गई और आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गयीं, माता सती जब कैलाश पर्वत वापस आई तो शिव जी ने सती से पूछा की " देवी कहां गई थी, क्या तुमने राम की परीक्षा ले ली, तब सती ने जवाब दिया कि " उन्होंने श्री राम की कोई परीक्षा नहीं ली, लेकिन जब शिवजी ने ध्यान लगाकर सच्चाई देखी तो उन्हें देवी सती पर बहुत क्रोध आया क्योंकि वें श्री राम को अपना आराध्य मानते थे और उनके आराध्य की पत्नी का रूप धारण किया था देवी सती ने, जिसे शिव जी ने अपने आराध्य का अपमान समझा और सती का मन ही मन त्याग कर दिया, क्योंकि शिवजी को अहसास हुआ कि वह सती को अब अपनी धर्मपत्नी नहीं मान सकते और ना ही उनका त्याग कर सकते हैं, 

अतः कुछ समय पश्चात जब देवी सती को लगा कि शिवजी की कृपा दृष्टि उनके ऊपर पहले जैसी नहीं रही, तो उन्होंने ब्रह्मा जी से इसका कारण पूछा तो ब्रह्मा जी ने बताया कि " श्री राम की परीक्षा की घटना शिवजी को ज्ञात है, आप ने जिस क्षण सीता का रूप धारण किया उसी क्षण से शिवजी ने मन ही मन आपका त्याग कर दिया था, अतः जब दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया, तो क्रोधित सती ने उसी यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था,

अतः हम कह सकते हैं कि इस घटना की जिम्मेदार स्वयं माता सती थी, दक्ष का यज्ञ मात्र एक बहाना था माता सती को अपने इस शरीर का त्याग करके दूसरा शरीर को जो धारण करना था, बाद में वही माता सती माता पार्वती के रूप जन्मी, 

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