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जब शिवजी हारे शनिदेव से, पौराणिक कथा

 शनिदेव से क्यों हारे भगवान शिव....? 

Lord Shiva

नमस्कार दोस्तों

शनिदेव जिन्हें परमपिता परमात्मा ने तीनों लोको का न्यायाधीश नियुक्त किया है जिनकी वक्र दृष्टि से ना तो कोई देव बचा है ना ही कोई दानव, जिस पर भी शनि देव ने अपनी तिरछी नजर डाली वह चाहे भगवान शिव ही क्यों ना हो उनको शनिदेव के प्रकोप का सामना करना ही पड़ा है, ऐसी ही एक कथा शिवपुराण में मिलती है जिसमें बताया गया है, कि कैसे शिवजी शनिदेव की वक्र दृष्टि पड़ने के कारण डर गए थे, जबकि शनिदेव शिवजी को अपना गुरु मानते थे,

पौराणिक कथा :-

एक बार शनिदेव कैलाश पर्वत पर शिव जी से मिलने गए और प्रणाम करके बोले कि " प्रभु मैं आपसे क्षमा याचना करने आया हूं, क्योंकि कल मेरी वक्र दृष्टि आप पर सवा पहर के लिए पड़ने वाली है, मेरी ग्रह चाल के मुताबिक मैं कल आपकी राशि में प्रवेश कर लूंगा इसलिए मैं आपसे पहले ही क्षमा याचना करता हूं, शिवजी बोले वत्स मैं तो आपका गुरु हूं और तुम अपने ही गुरु पर अपनी वक्रदृष्टि डालोगे, यह कितना न्यायोचित है,

तब शनि देव कहते हैं कि प्रभु आपने ही मुझे तीनों लोको का न्यायाधीश नियुक्त किया है, और आपही मुझे अपने कर्म से विमुख होने पर विवश कर रहे हैं, यह मुझसे ना हो पाएगा, यह कहकर शनिदेव वहां से चले जाते हैं, शनिदेव के जाने के बाद शिवजी शनि की दृष्टि से बचने का उपाय सोचने लगते हैं, अतः अगले दिन शिवजी शनि की दृष्टि से बचने के लिए पृथ्वीलोक आ जाते हैं और हाथी का रूप धारण करके जंगल में इधर-उधर घूमने लगते हैं,

और जब सवा पहर बीत गया तो शिवजी ने सोचा कि शनिदेव के कहे अनुसार अब तो सवा पहर बीत चुका है अतः अब शनि की दृष्टि का प्रभाव मुझ पर नहीं पड़ सकता, यही सोचकर शिव जी कैलाश पर्वत वापस आ जाते हैं, लेकिन प्रसन्नचित्त शिवजी जैसी ही कैलाश पर्वत पर पहुंचते हैं तो देखते हैं कि शनिदेव वहां पर पहले से ही मौजूद होते हैं, अतः शनिदेव को वहां देख कर हंसते हुए शिव जी कहते हैं कि " शनिदेव देखो तुम्हारी वक्र दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, आखिर तुम्हारी नजरों से मैं कैसे बच गया,

जिसे सुनकर हंसते हुए शनिदेव कहते हैं कि " प्रभु मेरी दृष्टि से आज तक ना तो कोई देव बचा है और ना ही कोई दानव, और आप भी आज मेरी नजरों से नहीं बच पाए हैं, यह सुनकर शिवजी आश्चर्यचकित हो जाते हैं, और कहते हैं कि वह कैसे शनिदेव क्योंकि आज तो सारा दिन मैं मदमस्त हाथी का रूप धारण करके वन में इधर-उधर विचरण कर रहा था, तब शनिदेव ने कहा कि " प्रभु मेरी वक्रदृष्टि के कारण ही सवा पहर के लिए आपको देवयानी छोड़कर पशु योनि में जाना पड़ा, यह घटना मेरी दृष्टि के प्रभाव से ही घटित हुई, तब शिवजी ने शनिदेव की न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर गले से लगा लिया,

अतः हम कह सकते हैं की लाख कोशिशों के बाद भी शिवजी को हारना ही पड़ा शनिदेव से, आखिर तीनों लोगों के न्यायाधीश हैं शनिदेव जी

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