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शनिदेव की साढ़ेसाती का प्रकोप हनुमान जी पर,

हनुमान की कहानियाँ
हनुमान और शनिदेव 
नमस्कार दोस्तों 

शनिदेव जिनका नाम सुनते ही मानव अपने बुरे वक्त की कल्पना करने लगता है क्योंकि यदि शनि देव की टेढ़ी नजर अगर किसी पर पड़ी तो साढ़े सात वर्षों तक उसे अपने बुरे कर्मों का फल भुगतना ही है, आखिर परमपिता परमात्मा ने शनिदेव को तीनों लोकों का न्यायाधीश और दंडाधिकारी नियुक्त कर रखा है, लेकिन कहा जाता है कि बजरंगबली के भक्तों को शनिदेव से डरने की आवश्यकता नहीं होती, माना जाता है कि शनिदेव हनुमान जी के प्रभाव से इतने डरते हैं कि वें हनुमान जी तो दूर की बात है वह किसी हनुमान भक्त के नजदीक भी नहीं भटकते, ऐसा ही एक प्रसंग आज मैं आपके लिए लेकर आया हूं 

पौराणिक कथा :-

                    एक बार हनुमान जी मंदरांचल पर्वत पर प्रभु श्री राम की भक्ति में ध्यान लगाए हुए बैठे थे, तभी वहां शनिदेव का आगमन होता है, हनुमान के पास पहुंचते ही शनिदेव कड़कते स्वर में कहते हैं " हनुमान जी मैं आपको सावधान करने आया हूं, क्योंकि जब से कृष्ण लीला का समापन हुआ है तभी से कलयुग का आरंभ हो चुका है, अतः इस कलयुग में कोई भी देवता इस पृथ्वी पर निवास नहीं कर सकता और जो भी इस पृथ्वी पर निवास करेगा, उस पर मेरी वक्र दृष्टि के प्रभाव से मेरी साढ़ेसाती का असर होगा, इसलिए या तो आप तत्काल इस पृथ्वी को छोड़ दो या फिर मेरी साढ़े साती का कष्ट भोगने के लिए तैयार हो जाओ,

तब हनुमान जी कहते हैं कि " कोई भी प्राणी जो श्री राम की शरण में रहता है उसे तो काल भी भयभीत नहीं कर सकता, अतः हे शनिदेव आप कहीं और जाइए, यह सुनकर शनिदेव कहते हैं " हनुमान मैं तो सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हूं, अतः मेरी साढ़ेसाती आपके ऊपर अभी से प्रभावी हो रही है इसलिए अभी मैं आपके शरीर में आ रहा हूं जो की अटल है, तब हंसते हुए बजरंगी कहते हैं " ठीक है शनिदेव आप आ जाइए, बस इतना बता दीजिए कि आप मेरे शरीर के किस हिस्से में निवास करोगे,

तब शनिदेव बड़े गर्व से कहते हैं " हनुमान जिस पर भी मेरी साढ़ेसाती का असर होता है तो मैं ढाई वर्ष उसके सिर पर बैठकर उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देता हूं, और अगले ढाई वर्ष उसके पेट में रहकर उसके शरीर को अस्वस्थ कर देता हूं, जिससे उसे तमाम प्रकार के रोग घेर लेते हैं, और अंतिम ढाई वर्ष उसके पैरों में रहकर उसे भटकाता रहता हूं पथभ्रष्ट करता रहता हूँ, अतः हनुमान सर्वप्रथम ढाई वर्ष मैं तुम्हारे सिर पर निवास करूंगा, ऐसा कहकर शनिदेव हनुमान जी के सिर पर विराजमान हो गए, 

जब शनिदेव हनुमान जी के सिर पर विराजमान हो गए तो हनुमान जी को माथे पर खुजली होने लगी, तब हनुमान जी ने एक बड़ा पर्वत उठाया और अपने सिर पर रख लिया, जिससे घबराकर शनिदेव बोले " हनुमान यह तुम क्या कर रहे हो,  तो हनुमान जी कहते हैं "आप अपना कार्य कीजिए और मुझे मेरा कार्य करने दीजिए, क्योंकि मैं भी अपने स्वभाव से विवश हूं, मैं इसी तरह अपनी खुजली मिटाता हूं, यह कहकर हनुमान जी ने एक और पर्वत अपने सिर पर रख लिया, जिससे शनिदेव दबने लगते हैं, अतः परेशान शनिदेव कहते हैं " हनुमान आप इन पर्वतों को हटाइए, मैं आप से समझौता करना चाहता हूं,

लेकिन हनुमान जी बिना सुने तीसरा पर्वत उठाकर अपने सिर पर रख लेते हैं, जिस के बोझ तले दबकर शनिदेव चिल्लाते हुए क्षमा मांगने लगते है, लेकिन हनुमान जी उनकी पुकार को अनसुना करते हुए चौथा बड़ा पर्वत भी अपने सिर पर रख लेते हैं जिससे शनिदेव हनुमान से विनती करते हुए कहते हैं " हे बजरंगी क्षमा कर दो, भविष्य में मैं आप तो क्या आपके किसी भक्त के भी नजदीक नहीं जाऊंगा, यहाँ तक की जो आपका स्मरण भी करता होगा, उसके भी समीप नहीं जाऊंगा, तब जाकर हनुमान जी ने पर्वतों को अपने सिर से हटाकर शनिदेव को पीड़ा से मुक्त किया, यही कारण है की शनिदेव हनुमान भक्तों को कष्ट नहीं दिया करते

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