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वानरमुखी नंदी की कहानी

          नंदी का मुख वानर का 

                   कैसे बना....? 

वानरमुखी नंदी 
नमस्कार दोस्तों

अगर मैं आपसे कहूं कि शिवगणो के मुखिया नंदी का मुख वानर का था, तो आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन यह सत्य है कि नंदी का मुख बंदर का था, जिसका वर्णन स्कंद पुराण के माहेश्वरखंड-केदारनाथ खंड में किया गया है,

पौराणिक कथा :-

यह कथा उस समय की है जब रावण ने भगवान शिव की तपस्या करके उनसे ऐसे ऐसे वरदान प्राप्त कर लिए जो दूसरों के लिए अत्यंत दुर्लभ थे, रावण ने शिवजी से ज्ञान, विज्ञान, संग्राम में अजेयता तथा शिवजी की अपेक्षा दोगुने सिर प्राप्त किए, शिव जी के पांच मुख हैं इसलिए उनसे द्विमुख पाकर रावण दशानन हुआ, ब्रह्मा और शिव जी का वरदान पाकर रावण ने तीनों लोगों को अपने वश में कर लिया, जिससे घबराए देवता शिव जी से मिलने शिव लोक गए,

जहां दरवाजे पर सभी देवताओं की मुलाकात नंदी से होती है उस समय नंदी मुख वानर का था, जिसे देख देवताओं ने नंदी से पूछा कि " हे नंदीश्वर आपका मुख वानर के समान क्यों है, तब नंदी कहते हैं "एक बार रावण यहां आया और अपने पराक्रम का बढ़-चढ़कर बखान करने लगा, तब उसे मैंने कहा" भाई तुम भी शिवलिंग के पूजक और मैं भी, अतः हम दोनों एक समान है, फिर मेरे सामने यह व्यर्थ डींग क्यों हांकते हो, मेरी बात सुनकर रावण ने भी तुम्हारी भांति मेरे वानर मुख के होने का कारण पूछा...

तो मैंने उसे बताया कि यह मेरी शिव उपासना का मुंह मांगा फल है, शिवजी तो मुझे अपना स्वरूप प्रदान करो रहें थे, लेकिन मैंने उनसे यह वानर रूप ही माँगा, शिवजी बड़े दयालु हैं उन्होंने कृपा पूर्वक मेरी मांगी हुई वस्तु दे दी, जो अभिमान शून्य है जिनमें दंभ का अभाव होता है उन्हें शिव का प्रिय समझना चाहिए, जिसे सुनकर रावण बोला " नंदी मैं बुद्धिमान हूं मैंने भगवान शिव से 10 मुख मांगे, अधिक मुख होने से शिवजी की मैं अद्भुत स्तुति कर सकता हूं, तुम्हारे इस वानर मुख से क्या होगा तुम्हें किसी ने खोटी सलाह दी होगी, तुमने शिवजी से यह वानर मुख व्यर्थ में ही मांग लिया..

इस प्रकार का उपहास सुनकर मैंने रावण को श्राप देते हुए कहा कि " जब कोई महा तेजस्वी श्रेष्ठ मानव वानरों के साथ मुझे आगे करके तुम पर आक्रमण करेगा, उस समय वह तुम्हें अवश्य ही मार डालेगा, और यही हुआ था, श्री रामचंद्र ने वानरों मे हनुमान को आगे करके रावण का वध कर दिया था,

यही कारण है कि सिलादपुत्र नंदी जो भगवान शिव के अनुचर तथा 11 में रूद्र थे महाकपि हनुमान जी के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं जिनकी मदद से श्री रामचंद्र जी ने आदत अहिरावण का वध किया और धर्म की रक्षा की

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