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भूत-प्रेत क्या खाते हैं..?


 नमस्कार दोस्तों

        प्रेत क्या खाते हैं कैसा होता है प्रेतों का भोजन क्योंकि हम लगभग सभी जीवो के भोजन के बारे में जानते हैं लेकिन क्या आपने कभी विचार किया कि प्रेतों का भोजन क्या होता है कहां पाते हैं भोजन या फिर क्या-क्या खाते हैं प्रेतात्मा मित्रों इस कथा का वर्णन स्कंद पुराण के नागरखंड में मिलता है l

पौराणिक कथा :-

प्राचीन काल में विदुरथ नामक हैहयवंशी चक्रवर्ती राजा हुए जो शिकार करने के बहुत शौकीन थे, इसी क्रम में एक बार वें अपनी सेना सहित एक भयंकर जंगल में शिकार खेलने के लिए गए जहां उन्होंने तमाम जंगली पशुओं को मारा, लेकिन उनमें से एक जानवर को बाण तो लगा लेकिन वह जमीन पर न गिर कर जंगल में इधर उधर भागने लगा, यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह जानवर इतने विषैले बाण से बच कैसे गया, अतः  कुतूहल वश राजा उस जानवर के पीछे पीछे घोड़ा दौड़ाने लगे इस प्रकार वें अपनी सेना को पीछे छोड़कर दूसरे जंगल में प्रवेश कर गए, 

जो कि कांटेदार वृक्षों से भरा हुआ और पथरीली भूमि वाला था, वहां पहुंचकर राजा को भूख प्यास सताने लगी है तो भूखे प्यासे राजा अपने घोड़े को पीट-पीटकर हांकने लगे, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब घोड़े ने भी भूख प्यास से दम तोड़ दिया, अब राजा उस भयंकर जंगल में पैदल ही चलने लगे लेकिन भूख प्यास से व्याकुल होने के कारण उनकी भी शक्ति क्षीण हो गई और वह भी लड़खड़ा कर गिर पड़े, इतने में ही राजा के पास आकाश मार्ग से तीन भयंकर प्रेत आते हैं जिन्हें देखकर डरे हुए राजा बड़े क्रोध में बोलते हैं, " कौन हो तुम लोग मैं भूख प्यार से व्याकुल राजा भी विदुरथ हूं अनजाने में इस वन में आ पहुंचा हूं, 

तब उन तीनों में से सबसे बड़ा प्रेत हाथ जोड़कर कहता है " राजन हम तीनों प्रेत इसी वन में रहते हैं हम अपने घृणित कर्म के कारण यह महान दुख सहन रहे हैं मेरा नाम मांसाद है, दूसरे साथी का नाम विदैवत है और तीसरे साथी का नाम कृतघ्न है, हे राजन परमात्मा ने हमें जिस घृणित कर्म के कारण यहां प्रेत योनि दी है अब उसके बारे में सुनो, " राजन हम तीनों वैदेशपुर में देवरात नामक महात्मा ब्राम्हण के घर में पैदा हुए, हमने नास्तिक होकर धर्म का सदा ही उल्लंघन किया था, सदैव पराई स्त्रियों के मोह में फंसे रहे, सदा ही मांस का भोजन किया था, इसलिए मेरे कर्मानुसार मेरा नाम मांसाद पड़ा,

राजन या दूसरा प्रेत जो तुम्हारे सामने खड़ा है इसने सदा ही बिना देवताओं को अर्पण किए भोजन ग्रहण किया, उसी कर्म के फल अनुसार इसे प्रेत योनि प्राप्त हुई और वेद शास्त्रों के विपरीत चलने के कारण इसका नाम विदैवत पड़ा और जिस महापापी ने सदैव कृतघ्नता या विश्वासघात किया हो उसे कृतघ्न कहा जाता है, तब राजा कहते हैं " इस पृथ्वी पर समस्त जीव आहार पर ही निर्भर होते हैं अतः तुम लोगों को यहां कौन सा भोजन प्राप्त होता है सो मुझे बताओ,

तब मांसाद कहता है " राजन जिस घर में कभी झाड़ू नहीं लगता, जो घर कभी गोबर इत्यादि से लीपा नहीं जाता, जहां भोजन के समय स्त्रियों में झगड़ा हो वहां प्रेत भोजन करते हैं, बलिवैश्वदेव किए बिना और भोजन से पहले आग्रासन गोग्रासन आदि अर्पित किए बिना भोजन किया जाता है, उसमें भी प्रेत भोजन करते हैं, जिस घर में फूटे बर्तन का त्याग नहीं किया जाता और जहां वेद मंत्रों की ध्वनि नहीं होती, वहां प्रेत भोजन करते हैं,

जो श्राद्ध दक्षिणा से रहित शास्त्रोक्त विधि से हीन होता है, और जिस घर मे मासिक ग्रस्त स्त्री की नजर भोजन पर पड़ जाती है, उस श्रद्धा और भोजन पर हमारा अधिकार होता है, जो अन्न, मूत्र, हड्डी मवाद और कफ आदि से संयुक्त हो गया हो, जिसे नीच जाति के मनुष्यों ने छू लिया हो, उस पर भी हम प्रेतों का अधिकार होता है, जो मानव असहिष्णु, चुगली खाने वाला, गुरु की सैय्या पर सोने वाला, दूसरों का कष्ट देखकर प्रसन्न होने वाला हो, जो वेदों की निंदा करता है, ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर मांस खाता है जीव से हिंसा करता है, वह प्रेत होता है जो मनुष्य विनय शील और दोष रहित पत्नी का त्याग करता है, जो देवता स्त्री और गुरु का धन लेकर वापस नहीं देता है, वह प्रेत होता है,

राजन हम जल से भरे जलाशयों को देख तो सकते हैं, लेकिन यदि हम उसके समीप भी गए तो हमारे ऊपर अत्तष्ट मुद्गरो की मार पड़ती है, हम भूख से कितना भी व्याकुल हो, किंतु रसोई से कुछ नहीं ले सकते, फल से लदे वृक्षों को हम देख तो सकते हैं किंतु उनका सेवन नहीं कर सकते,

और क्या क्या कहूं राजन प्रेत योनि अधम देवयोनि कहलाती है, जिसके बस 3 गुण होते हैं पूर्व जन्म का स्मरण, आकाश में उड़ने की शक्ति, धर्म और अधर्म का निश्चय, इसके अलावा इस योनि में सब दोष ही दोष है

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