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शिवजी की तीसरी पत्नी चित्रलेखा की कहानी...?

भगवान शिव की तीसरी पत्नी की कहानी..?
Lord shiva
 नमस्कार दोस्तों

        भगवान शिव की तीसरी पत्नी चित्रलेखा थी यह सुनने में जितना अजीब है यह कथा उतनी ही रोचक है क्योंकि अब तक हम भगवान शिव की दो ही पत्नियों बारे में जानते थे माता सती और माता पार्वती के बारे में....? लेकिन उनकी तीसरी पत्नी चित्रलेखा के बारे में शायद ही कोई जानता हो, जिस का संपूर्ण वर्णन स्कंदपुराण के माहेश्वरखंड-कुमारिकाखंड में किया गया है,

पौराणिक कथा :-

    एक बार नारद जी अर्जुन को सभी तीर्थों के महत्व के बारे में बता रहे थे, जिसमें उन्होंने स्तंभतीर्थ का भी वर्णन किया, जिससे संबंधित नारद जी ने अर्जुन को एक कथा सुनाई जो कुछ इस प्रकार थी..? नारद जी कहते हैं अर्जुन प्राचीन काल में शतशृङ्ग नामक राजा के 8 पुत्र और एक कन्या थी, सभी आठों पुत्र तो सामान्य थे लेकिन जो कन्या थी उसका मुख बकरी का था, और ऐसा होने का एक महान कारण था जिसे मैं बताता हूं ध्यान से सुनो..?

महीसागर के तट पर जो स्तंभतीर्थ है उससे सीमावर्ती दुर्गम प्रदेश में एक दिन एक बकरी अपने झुंड से भटक कर चली आयी, जो कि बहुत प्यासी थी तालाब के किनारे झाड़ियों की लताओं का जाल सा बन गया था, वह बकरी तालाब के किनारे जैसे ही आई वह उन लताओं में फंस गई जिस कारण उसकी मृत्यु हो गई, कुछ समय पश्चात उसके शरीर का सिर से नीचे का भाग टूटकर महीसागर संगम में गिर पड़ा, लेकिन उसका सिर झाड़ियों में ही फंसा रहा, सौभाग्य से उस दिन शनैश्वर तथा अमावस्या का भी योग था,

अतः जो शरीर उस बकरी का महिसागर के जल में गिरा था, उस तीर्थ के प्रभाव से वह बकरी सिंगल देश के राजा शतशृङ्ग की पुत्री हुई लेकिन उसका मुख बकरी का ही रहा, बाकी सभी अंग अत्यंत सुंदर थे जिसे देख पूरा राजपरिवार अत्यंत दुखी हुआ, लेकिन परमात्मा की इच्छा समझकर राजा उसका पालन-पोषण करने लगे, समय बीतने के साथ वह कन्या युवावस्था को प्राप्त हुई तो एक दिन उसने दर्पण में अपना मुख देखा, दर्पण देखते ही उसे अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो गया,

तब अपने माता पता को सारी घटना बताकर वह कन्या स्तंभतीर्थ पहुंची और लताओं के जाल में फंसे अपने पूर्व जन्म के सिर को ढूंढकर उसका दाह संस्कार करके हड्डियों को महीसागर में फेंक दिया, तब उस तीर्थ के प्रभाव से उस कन्या का मुख चंद्रमा के समान कांतिमान हो गया, जिसे देखकर सारे देवता दानव राजा से उस कन्या के साथ विवाह की जिद करने लगे, तब उस कन्या ने विवाह करने से मना कर दिया और शिव की तपस्या करने वन में चली गई, एक वर्ष पश्चात कन्या की तपस्या से प्रसन्न न शिवजी ने कन्या को साक्षात दर्शन दिए और वर मांगने के लिए कहा,

तब उस कन्या ने कहा कि " प्रभु यदि आप वर देना ही चाहते हैं तो इस तीर्थ में आप सर्वदा निवास करें, तब शिवजी ने एवंमस्तु कहकर प्रार्थना स्वीकार कर ली, और कन्या ने जहां बकरी के सिर का दाह किया था वही वर्करेश नामक शिवलिंग की स्थापना की, इस समाचार को सुनकर स्वास्तिक नागराज उस कन्या को देखने के लिए पाताल लोक से पृथ्वी लोक पर आया, सिर के बाल आते समय जहां से पृथ्वी फाड़कर नागराज बाहर आया था, वहां स्वास्तिक नामक कुआं बन गया जिसे गंगा जी ने अपने जल से भर दिया,

वहां शिवलिंग स्थापित देख शिव जी ने पुनः वरदान दिया कि जिनके शव का दाह यहां होगा और उनकी अस्थियां महीसंगम में विसर्जित होगी, वह दीर्घकाल तक स्वर्ग लोक में निवास करके पुनः इस लोक में लौटने पर वैभव पूर्ण प्रतापी राजा होंगे, ऐसा वरदान पाकर वह कन्या पुनः अपने माता-पिता के पास आई और सारा वृतात बताया, जिसे सुनकर कन्या के परिवार के सभी सदस्यों ने उस तीर्थ की यात्रा की, और तीर्थ में स्नान दान करके सिंघल देश वापस लौट आए, इसके पश्चात राजा शतशृङ्ग ने संपूर्ण राज्य को 9 खंडों में बराबर बांट दिया, 8 खंड तो पुत्रों को दिए और 9वा खंड अपनी पुत्री को देकर, स्वयं उत्तर दिशा में पर्वत पर जाकर तपस्या करते हुए स्वर्ग लोक को प्राप्त हो गए, 

इधर वह कन्या स्तंभ तीर्थ में रहकर तपस्या करने लगी, कुछ वर्षों के पश्चात कन्या के आठों भाइयों से 9-9 पुत्र उत्पन्न हुए जो बुद्धिमान और पराक्रमी थे, एक दिन वह सब के सब उस कुमारी के पास आकर बोले" बुआ आप हमारी कुलदेवी हो, हम पर कृपा करो हम लोग 72 भाई हैं और हमारे पास 8 खंड है अतः तुम स्वयं ही इस का बंटवारा कर के हम लोगों को दो, जिससे हम लोगों में आपसी फूट ना, उन सभी के ऐसा कहने पर उस कन्या ने अपने हिस्से के राज्य का भी बराबर बराबर बंटवारा कर दिया, और स्वयं महीसंगम के गुप्त क्षेत्र में रहकर शिव का पूजन करती हुई महान व्रत का पालन करने लगी, वह कन्या 6 कुंडो और संगम में स्नान करती हुई तीर्थ में रहने लगी,

उसके कुछ समय बाद जब कार्तिकेय का बनवाया मंदिर पुराना हो गया, तो उस कन्या ने उस मंदिर के स्थान पर स्वर्ण मंदिर का निर्माण कराया, जिससे प्रसन्न शिव जी कुमारेश्वर लिंग में साक्षात प्रकट होकर बोले "हे भद्रे तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं तुमने इस जीर्ण मंदिर का उद्धार किया है, इसलिए अब मैं तुम्हारे नाम से जाना जाऊंगा है, भद्रे अब तुम्हारा अंत काल समीप आ गया है जिस स्त्री ने आजीवन पति का वरण नहीं किया है अर्थात अविवाहित रही हो उसे स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, " इसलिए तुम मुझे अपने पति रूप में ग्रहण करो,

शिवजी के ऐसा कहने पर उस कन्या ने शिवजी को अपना पति स्वीकार किया और उनके साथ रूद्र लोक चली गई, जहां पर पार्वती ने उन्हें हृदय से लगाया और बोली " हे शुभे तुमने पृथ्वी को हिस्से में बराबर बांट कर चित्रलिखित सा कर दिया है इसलिए आज से तुम चित्रलेखा नाम से प्रसिद्ध होगी, अब तुम मेरी सखी बनकर यहां प्रसन्नता पूर्वक निवास करो,

निष्कर्ष :- अतः हम कह सकते हैं कि भगवान शिव की तीसरी पत्नी का नाम चित्रलेखा था, 

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